"कौन हो ,क्या चाहिए ?"उसने दरवाज़े को थोडा सा खोलकर झिरी से झांकते हुए पूछा था .
"मुसाफिर हूँ ,रात भर ठहरना चाहता हूँ ."
"कौन हिंदू हो क्या ?"
"नहीं "
"सिक्ख तो दीखते नहीं. फिर तो जरूर ईसाई होंगे ,है ना ."
"मै ईसाई भी नहीं हूँ "
"तो मुसलमान ?"
"जी नहीं "
"क्या मतलब ? तो कौन हो तुम?" वह झल्लाया था.
" इंसान "
"क्या कहा इंसान ?"
तभी किचन से आवाज़ आई थी " कौन है जी ,दरवाज़े पर ?"
उसने भडाक से दरवाज़ा बंद करते हुए कहा था " कोई सिरफिरा पागल है , साला "
3/27/2011 03:20:00 pm
प्रदीप नील वसिष्ठ
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8 टिप्पणियाँ:
तभी कोई इन्सान नहीं बन पाता, अच्छी पोस्ट, कृपया पूरी पोस्ट प्रकाशित किया करें. केवल लिंक छोड़ने से पाठकों को परेशानी होती है. इस बार मैंने कर दिया है उम्मीद है आप सहयोग करेंगे.
aaj ke insan pagal hi hote hain kyonki sahi to galat hote hain.
आज कल इंसान हैं ही कहाँ ? अच्छी लघुकथा
अच्छी लघुकथा
kaha rah gaya insan....
saty bolna pap hai. yah to kadva sach hai. kaha hai insan .
kaha rah gaya insan....
आज के मानव की सच्चाई को बताती बहुत अच्छी लघुकथा !
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