
8/29/2011 09:44:00 pm

Shikha Kaushik
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जोरदार तूफ़ान शुरू हो चुका था .साठ वर्षीय सूरज सिंह तेजी से घर की ओर ही आ रहा था.धूल उड़ने के कारण आँख भी ठीक से नहीं खुल पा रही थी .घर कुछ ही दूर रह गया था.तूफ़ान इतना तेज था कि पीछे को धक्का दे रहा था.सूरज सिंह को घर का द्वार धुंधला सा नज़र आया और उसके बाहर आंधी से जूझता हुआ नीम का पेड़ .सूरज सिंह अभी पेड़ के करीब पहुंचा ही था कि सालों पुराना पेड़ भड़भड़ाता हुआ उस पर ही गिर पड़ा .सूरज सिंह की आवाज गले में ही अटक गयी .बड़ी मुश्किल से दबे दबे ही वह केवल इतना पूछ पाया -''अहसानफरामोश पेड़ तुझे पिछले कितने ही सालों से सुबह शाम पानी से सींचता रहा और तूने मुझे ही दबा डाला .''उसे लगा जैसे पेड़ भी जवाब दे रहा है -''मूर्ख ! अहसानफरामोश मैं नहीं तू है .याद कर तूने कैसे बेइज्जत कर अपने पिता को घर से निकाल दिया था ?उन्होंने भी तो तुझे बचपन से लेकर जवानी तक खूब लाड़- प्यार और अपने खून की गाड़ी कमाई से सींचा था पर तूने अंतिम दिनों में उन्हें घर से निकाल दिया .तेरे कारण सड़कों पर भटक-भटक कर मरना उन्हें जितना भारी पड़ा था उससे ज्यादा भारी नहीं हूँ मैं दुष्ट !'' तूफ़ान थमने पर लोगों ने जब सूरज सिंह को पेड़ के नीचे से निकाला तब तक उसके प्राण -पखेरू उड़ चुके थे .
शिखा कौशिक

6/28/2011 10:06:00 am

शिखा कौशिक
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''धोखा ''-एक लघु कथा

''चलो घर से भागकर शादी कर लेते हैं !'' रोहित के यह कहते ही ज्योति का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा.भावनाओं और क्रोध दोनों को संयमित करते हुए ज्योति कड़े शब्दों में बोली ''वाह !रोहित क्या यही तरीका है अपने सपनों को पूरा करने का ?अगर मेरे माता-पिता समाज के उलाहने सह भी लेंगे तो क्या मैं खुद को कभी माफ़ कर पाऊँगी उन्हें धोखा देने के लिए और ....मेरा भाई ...वो तो जहर ही खा लेगा .'' ......''तो फिर वे मेरे और तुम्हारे विवाह को राजी क्यों नहीं होते ?रोहित झुंझलाते हुए बोला ....''ये प्रश्न तो मैं भी तुम से कर सकती हूँ ...आखिर तुम्हारे माता-पिता क्यों तैयार नहीं हैं और ..........फिर तुम कैसे उनकी खिलाफत करकर ये विवाह करना चाहते हो?आखिर एक ऐसी लड़की को वे कभी ''बहु'' का सम्मान कैसे दे पाएंगे जो अपने माता-पिता की इज्जत को मिटटी में मिलाकर घर से भागी हो .'' ज्योति के प्रश्न के उत्तर में रोहित उदास होता हुआ बोला ''तो क्या अपनी प्रेम-कहानी का अंत समझूं ?''.....''नहीं अब तो यह कहानी शुरू हुई है .हमें न घर से भागना है और न घुटने टेकने हैं .हमें बस अपने परिवार से धोखा नहीं करना है .''आँखों से आश्वस्त करती ज्योति ने अपना पर्स उठाया और रोहित से विदा ली .अभी ज्योति को गए एक घंटा ही हुआ था की रोहित के मोबाईल पर उसकी कॉल आई .सुनकर रोहित हक्का-बक्का रह गया .उसने पास खड़ी अपनी बाइक स्टार्ट की और ज्योति के घर की ओर दौड़ा दी .ज्योति के घर पहुँचते ही बाहर खड़ी एम्बुलेंस देखकर उसके हाथ-पैर सुन्न पड़ने लगे .ज्योति को घर के अन्दर से उसके पिता व् भाई किसी तरह सहारा देकर एम्बुलेंस तक ला रहे थे .रोहित ने बाइक वहीँ छोड़ी और उसी ओर बढ़ लिया .ज्योति के करीब पहुँचते ही वो सबकी परवाह छोड़ कर उसे झंकझोरते हुए बोला ''ज्योति ये तुमने क्या किया ?तुम तो किसी को धोखा नहीं देना चाहती थी फिर जहर खाकर मुझे क्यों धोखा दिया ?...ज्योति थोडा होश में आते हुए बोली ....''रोहित मैंने तो सबका मान रखना चाहा था ......पर...मेरे माता-पिता ने ही मुझे धोखा दे दिया ...ये मेरे मना करने पर भी मेरा रिश्ता कहीं ओर तय कर आये .....मैं उस नए बंधन को भी धोखे में नहीं रखना चाहती थी ...और ..इसीलिए ये जहर ......'''यह कहते -कहते ज्योति निष्प्राण हो बुझ गयी .
शिखा कौशिक