लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 27 जुलाई 2011

पर्दा प्रथा: विडंबना या कुछ और---------मिथिलेश दुबे

अपने देश में महिलाओं को (खासकर उत्तर भारत में ज्यादा) पर्दे में रखने का रिवाज है । इसके पीछे का कारण शायद ही कोई स्पष्ट कर पाये फिर भी ये सवाल तो कौंधता ही है कि आखिर क्यों ? मनुष्यों में समान होने के बावजूद भी महिलाओ‍ को ढककर या छिपाकर रखने के पीछे का क्या कारण हो सकता है ? ये सवाल हमारे समाज में अक्सर ही किया जाता रहा है, कुछ विद्वानों का मानना है कि पर्दा प्रथा समाज के लिये बहुत ही आवश्यक है इसके पीछे के कारण के बारे में उनका कहना है कि इस प्रथा से पुरूष कामुकता को वश में किया जा सकता है । लेकिन इस जवाब के संदर्भ में ये सवाल भी खड़ा होता है कि क्या पुरूष की कामुकता इतनी बढ़ गयी है कि उसे अपने ही समकक्ष महिला साथी को कैदियों की तरह रखना पड़ रहा है? तो क्या ये माना जाये कि पर्दा प्रथा से दूराचार रोका जा सकता है ? जहाँ तक मेरा मानना है कि ऐसा सोचना व्यर्थ ही होगा क्योंकि दुनियां में जितने भी गलत काम होते हैं वे चोरी छिपे ही होते हैं । तो इस परिपेक्ष्य में ऐसा सोचना मुर्खता मात्र ही होगा । तन ढकने या पर्दा करने से पुरूषों की या किसी अन्य की प्रवृत्ति या सोच पर अंकुश लगाया जा सकता है ? शायद आपका जवाब नहीं होगा। आपको ये जानकर हैरानी होगी जिन देशों, प्रदेशों या जातियों में पर्दा प्रथा की प्रचलन ज्यादा है वहाँ दुराचार जैसे मामलें सबसे ज्यादा प्रकाश में आते है । इससे ये बात तो साफ हो जाती है कि दुराचार रोकने के मामले में पर्दे का रिवाज का कोई संबंध नहीं है। आज समाज को जरुरत तन को ढकने की नहीं मन को ढकने की जरुरत ज्यादा है । फिर भी कुछ लोग अनाचार की रोकथाम के लिए पर्दा प्रथा को जरुरी समझते है तो इस व्यवस्था को नर पर लागू करने की जरुरत ज्यादा है क्योंकि नारी की अपेक्षा नर ज्यादा उच्छंखल होता है ।नारी की अपेक्षा पुरुष ज्यादा स्वछंद घूमता है ऐसी दशा में उसके पतित होने की आशंका ज्यादा है। महिलाएं तो ज्यादातर घरेलू कामों में व्यस्त रहती हैं और घर में ही रहती हैं, पुरुष काम के चलते बाहर होते हैं इसलिए पर्दे की जरुरत उन्हें ज्यादा है।

इस प्रथा के चलते हम अपने प्रिय संबंधिनी को बेहद निरीह स्थिति में ढकेल देते हैं जिससे वह अपनी योग्यता, क्षमता और के वजूद को भी खो देती है। प्रतिभा संपन्न होने के बावजूद वह नारी अपने परिवार के लिए व अपने हित के लिए कुछ भी नहीं कर पाती और आज की भारभूत स्थिति में अपंग मात्र ही बनकर रह गयी है । इस बात को जितनी जल्दी गंभीरतापूर्वक सोचा जाए जाएगा उतना ही स्पष्ट होता जाएगा कि इस पर्दा प्रथा कुछ और नहीं अपनी कुल्हाणी से अपने ही पैरों को अनवरत रूप से काटने चले जाना है । आज जब हम प्रगति पथ पर बढ रहे हैं, देश विकास कर रहा है ऐसी स्थिति में पर्दा जैसी विडंबनाओ को अपनाने का आग्रह करना, जोर देने का मतलब समझ ही नहीं आता। कारण चाहे जो भी हो इस प्रथा से स्त्री अपने क्षमता को खोती है तथा वह खुद को असहाय समझने लगती है तथा खुद को कायर, निर्बल और भीरूता की कतार में खड़ी पाती है। पर्दे में रखकर उसे कमजोर और अविश्वषनीय होने का अहसास कराया जाता है। पर्दा प्रथा हमारे देश या संस्कृति में कभी भी प्रचलित नहीं रही है । प्राचीनकाल में स्त्रियां सभी क्षेत्रों में काम करती थी और उन्हे विद्याध्ययन योग्यता अभिवर्धन और अपनी प्रतिभा से समाज को लाभ पहुंचाने की खुली छूट थी, उन्हें कहीं किसी प्रतिबंध में नहीं रहना पड़ता था। भारत में पर्दा प्रथा का आगमन विदेशी आक्रमणकारियों के साथ हुआ। सर्वविदित है कि पर्दा प्रथा पहले मुस्लिम दशों मे शरू हुआ था। इस घातक परंपरा को समूल नष्ट करने के लिए किसी स्त्री का घूंघट खुलवा देना पर्दा न करने के लिए तैयार कर देना भर पर्याप्त नहीं है। कितना अच्छा होत कि वर्तमान भारत का समाज अपने घरों के अन्दर से इस बनावटी परदा को हटा कर उस भीषण भूल का प्रतिरोध करे, जिसके कारण हमारे घर ही देवियां एक न एक रोग से पीड़ित रहती हैं । घर के बाहर की दुनियां से अनजान रहकर घूटती रहती हैं ।

कितने ही लोगों का भ्रम अब भी नहीं मिटा कि परदा छोड देने से स्त्रियां स्वतंत्र हो जाती हैं, किंतु यह उनका भ्रम ही नहीं अंधविश्वास है। गुजरात महाराष्ट्र, मद्रास की स्त्रियों ने परदाक न कर कौन से शील धर्म को नष्ट किया है ? वरन यों कहिए कि भारत के नारी धर्म का वास्तविक मान आन इन्ही प्रान्तों ने रख लिया, आज स्त्री अपरहण, बलात्कार की जितनी घटनाएं अपने देश मे घटित होती है क्या उनसे शतांश घटनाएं परदा हटाने वाने देशों में हुआ है। नारी का शोषण उन प्रदेशों में ज्यादा हो रहा है जहां परदा प्रथा हो धर्म तथा संस्कुति से जाड़कर जबरदस्ती इस कुप्रथा को थोपा जा रहा है। यह तो माना हुआ सिद्धांत है कि जो वस्तु जितनी छिपा कर रखी जाएगी बाहरी परिस्थियां उसे प्रकाश में लाने के लिए उतनी ही विशेष उत्कंठा दिखाएगी और भीतरी परिस्थिति उसे छिपाने के लिए उतनी ही संकीर्ण और निर्बल होती रहेगी। ऐसे प्रथा के निर्वहन का बोझ हम अक्सर पुत्रवधू पर डालते हैं, हमे ध्यान रखना चाहिए कि पुत्रवधू बुटी के समान होती है । अब समय आ गया है जब पर्दा प्रथा जैसी कुरीति को हटाए जाए । नर और नारी दोनों एक ही मानव समाज के अभिन्न अंग है। दानो का कर्तव्य और एक हैं । नियत प्रतिबंध और कानून दानों के प्रति एक जेसे होने चाहिए। यदि पर्दा प्रथा शील सदाचार की रक्षा के लिए है तो उसे नर पर लागू किया जाना चाहिए कयोंकि दूराचार में पुरूष हमशा आगे रहता है। यदि यह पुरूष के लिए आवश्यक नही है तो नारी पर भी इस प्रकार का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए अवांछनीय हैं। मेरा पर्दा प्रथा के विरोध करने का ये मतलब कतई नहीं है की असंगत कपड़े पहनने की छूट दी जाये मेरा। वस्त्रेणेव वासया मन्मता शुचिम् ऋगवेद 1।140।1 हम उत्तम वस्त्र से गोपनीय अंगो को ढक देते हैं।

जब पशु पक्षी पर्दा नहीं करते, मुंह नही ढकते उनमे ऐसी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो मानव में आजादी का हरण इस तरह क्यों हो रहा है?

रविवार, 8 मई 2011

बच्चे की मदर

कई दिनों से घर जाने की तैयारी चल रही थी और अब तो होली बस दो ही दिन दूर था। हमेशा की तरह इस बार भी घर जाने को लेकर मन बहुत ही उत्साहित था । भले ही अब घर जाने के बीच का अंतराल कम हो गया हो लेकिन घर पर एक अलग तरह का ही सुख मिलता है। घर पर न तो काम का बोझ और न ही खाना बनाने की चिंता, बर्तन और कपड़े धोना जो मुझे सबसे ज्यादा दुष्कर लगता है उससे भी छुटकारा मिल जाता है। घर पर बार-बार खाने को लेकर मम्मी का आग्रह उनका प्यार अच्छा लगता है। नहीं तो जब बाहर होते हैं तो खाना खा लें समय पे बड़ी बात है अब ये बात और है कि ये सारे सुख कुछ दिन के ही होते हैं। जब से लखनऊ हूं महीनें दो महीनें में एक चक्कर घर का तो हो ही जाता है। इस बार होली होने के कारण घर जाने का उत्साह दो गुना था। सुबह 7 बजे की ट्रेन थी, साढ़े छः के आस पास स्टेशन पहुंचा। मैं स्टेशन पर अभी ठिक से खड़ा ही हुआ अगले क्षण जो भी देखा मेरी ऑखें खुली की खुली ही रह गईं। जिस ट्रेन से मुझे जाना था वह अभी आउटर पर ही थी, लेकिन ये क्या लोग तो आउटर से ही ट्रेन पर बैठना शुरू कर दिये। थोड़ी देर तक स्थिति समझने में लगा रहा, उसके बाद मैं भी ट्रेन की तरफ भागा। अन्दर जाने के बाद जो स्थिति सामने थी उससे हतप्रभ था । पहली बार इस ट्रेन में इतनी भीड़ थी जबकि गाड़ी अभी आउटर पर ही थी। खैर इतनी भीड़ होने के बावजूद खिड़की के पास वाली सीट ढूंढने में लगा था।

डब्बे में काफी देर तक टहलने के बाद जब ये कनर्फम हो गया कि आज तो खिड़की वाली सीट मिलने से , सीटों की मारा मारी देखकर अब तो सीट मिल जाए यही प्राथमिकता शेष थी। काफी मशक्कत करने के बाद अन्ततः सीट मिल ही गई। हॉं इस बार खिड़की वाली सीट नही मिली। मेरे सामने वाले बर्थ पर भी इतनी जगह थी कि एक लोग उसपर बैठ सकते थे। कुछ देर बाद गाड़ी आउटर से प्लेटफार्म पर आ खड़ी हुई। अब काफी राहत महसूस कर रहा था , बैग को रखकर अब थोड़ा आराम के मूड में था। मुझे क्या पता कि मेरा ध्यान कुछ ही देर में भंग होने वाला है। ट्रेन का हार्न हो चुका था , गाड़ी अब चलने को ही थी तभी भागमभाग की स्थिति में एक महिला का मेरे वाले डब्बे में प्रवेश होता है, लोगों की नजरें उस रास्ते की ओर थी जिस ओर से वे सरपट कदम चले आ रहे थे । मैं भी बाट जोहने लगा , मैंने भी सोचा कौन आ रहा देख ही लिया जाए । अभी गर्दन उचका ही रहा था कि वह सुंदर मैडम मेरे पास आ पहुंची और जरा हटने के लिए कहा मैं डर के मारे बगल हो गया और मैडम जी मेरे सामने वाली खाली सीट बैठ गईं । मैडम का चेहरा सौम्य था ,पहनावे से बडे़ घर की लग रही थीं , ब्लू जींस पर ब्लैक टी शर्ट फब रहा था। अभी मैं पहनावे से उनको पढ़ने की कोशिश कर ही रहा था कि बच्चे के राने की आवाज आई , ऊपर सर उठा के देखा तो उनके गोदी में छोटा बच्चा जो करिब पॉंच छे महीनें का लग रहा था । अब तक मैडम जी अपने सीट पर बैठ चुकी थीं, मेरे सामने वाले सीट पर। बच्चा अभी सो रहा था। गाड़ी अब अपने पुरे स्पीड से भाग रही थी। कुछ देर चलने के बाद स्पीड थोड़ी कम हुई , मेरा अनुमान सही निकला , अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकने वाली थी।

बच्चे ने झटके से दूध का बोतल गिरा दिया और दोबारा से रोने लगा। ये सब देखकर बगल में बैठी आंटीने दोबारा अपनी खामोशी तोड़ी, बेटी अपना दूध पिला दो कहते-कहते न जाने क्यों खामोश हो गईं। मैं बहुत देर तक उस खामोशी और चेहरे पर आई सिकन का कारण ढूंढ़ता रहा।


मेरे बगल में बैठे भाई साहब इसी स्टॉप पर उतरने के लिए तैयारी करने लगें, गाड़ी रुकती है भाई साहब उतर जाते हैं । तभी किसी ने मुझसे कहा बेटा जरा साईड हो जाओ ,देखा तो एक महिला साड़ी में जो मेरे दादी की उम्र की लग रहीं थी, एक छोटे बैग के साथ मेरे बगल वाली खाली सीट पर बैंठ गईं । कुछ देर के स्टोपेज के बाद ट्रेन दोबारा से चल पड़ी । सामने वाली मैडम के गोदी में उनका बच्चा सोते हुए बड़ा ही प्यारा लग रहा था। बगल में बैठी महिला ने मुझसे बेटा कहॉं तक जाओगे , मैंने कहा मैं तो वाराणसी तक जाऊंगा ,आप ? आंटी जी ने कहा कि मैं तो प्रतापगढ़ तक जाऊंगी , इस पर मैंने हूं कहते हुए गर्दन हिलाया ।
ट्रेन के कोलाहल के बीच सामनें वाले सीट पर अपनी मां के गोदी में आंचल ना सही किसी प्लास्टिक नुमा लीवास में दुनिया दारी से परे सो रहा मासूम सा बच्चा अचानक उठा और रोने से सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। कुछ देर तक मां के पुचकारने से वह चुप तो हुआ लेकिन बहुत देर तक शांत न रहा , रोना चलता रहा। ये सब देख बगल में बैठी आंटी से रहा न गया और उन्होंने बच्चे को दूध पिलाने का इशारा किया। कुछ देर तक सोचने के बाद मैडम ने दूध का पोटली बच्चे के मुंह में लगा दिया। बच्चे ने झटके से दूध का बोतल गिरा दिया और दोबारा से रोने लगा। ये सब देखकर बगल में बैठी आटी ने दोबारा अपनी खामोशी तोड़ी, बेटी अपना दूध पिला दो कहते-कहते न जाने क्यों खामोश हो गईं। मैं बहुत देर तक उस खामोशी और चेहरे पर आई सिकन का कारण ढूंढ़ता रहा।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

आज भी सपने में मिलती है मिस चमको .

 ( सन्दर्भ :- फिल्म चश्मे बद्दूर के रीमेक की खबर) देखा जाए तो हर साल अपने में कुछ ख़ास लिए होता है .1981 का साल भी कुछ इसी तरह का था . अमिताभ बच्चन का शिखर समय चल रहा था . उनकी दो सुपर हिट फिल्मे ' लावारिस ' और 'नसीब ' धूम मचा रही थी . जीतेन्द्र को दक्षिण भारत का सहारा मिल चुका था . अगली क्लास के दर्शक उनकी' मवाली ' 'तोहफा ' और 'हिम्मतवाला ' के गानों को गुनगुना कर थिरक रहे थे . अपर्णा सेन'' 36 चोरंगी लेन'' के जरिये भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम दिला रही थी , ऐसे में अजीबोगरीब नाम वाली एक फिल्म ने सिनेमा घरो में दस्तक दी . इस फिल्म का नाम था चश्मे -बद्दूर . यह दौर अमिताभ की एक्शन और श्री देवी -जीतेन्द्र के ता - थैया टाइप के नाच गानों का था .इसी दौरान जुबली कुमार (राजेंद्र कुमार ) '' लव स्टोरी '' से देश को एक युवा और ताजगी भरी भरा चेहरा कुमार गौरव के रूप में दे चुके थे . चश्मे -बद्दूर के साथ एक ही प्लस पॉइंट था , इसकी निर्देशिका सई परांजपे का नाम . सई इसके पूर्व नेशनल अवार्ड जीत चुकी फिल्म '' स्पर्श '' को निर्देशित कर अपनी पहचान बना चुकी थी .
दूरदर्शन की प्रोडूसर और डायरेक्टर रही साईं स्वयं एक अच्छी लेखिका रही है . बच्चो के लिए लिखी उनकी छे से ज्यादा किताबे राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरूस्कार से सराही गई है . चश्मे बद्दूर की कहानी स्वयं सई ने ही लिखी थी .
रोमांटिक कहानी में कामेडी का तड़का नई बात नहीं थी . परन्तु सई की प्रस्तुति में ताजगी थी . राकेश बेदी , फारुख शेख , रवि बासवानी , सईद जाफरी और दीप्ती नवल .कुल मिलकर पूरी कास्ट उर्जावान और बेहतरीन थी . कहानी कहने का ढंग और अभिनय दोनों ही उम्दा स्तर का था . शायद यही कारण है की आज तीस साल बाद भी फिल्म और उसके पात्र हमारे आस पास के ,अपने से लगते है और फिल्म --एक दम ताज़ी .
चूँकि कहानी और डायरेक्शन दोनों पर सई की पकड़ थी, लिहाजा कुछ सीन यादगार बन गए थे . ख़ास तौर पर रवि बासवानी का फ्लेश बेक में जाने वाला सीन , फारुक और दीप्ति की पहली मुलाक़ात का सीन , . राकेश बेदी के साथ दीप्ती के नौका विहार का द्रश्य और नदी में भेंसों के नहाने वाला सीन ,..

मेने शुरुआत में कुछ फिल्मो और हस्तियों के नामो जिक्र किया था .ख़ास वजह थी सिर्फ यह रेखांकित करना कि आज तीस बरस बाद भी चश्मे बद्दूर एक पूरी पीडी की यादों में ताजा है . जबकि इस लम्बे अरसे में कई बड़ी फिल्मे आई और गुमनामी में खो गई . माना की चश्मे -बद्दूर क्लासिक्स की श्रेणी में नहीं आती परन्तु जिसके बारे में सोंच कर ही आपके चेहरे पर मुस्कान आजाये उस फिल्म में कुछ ख़ास तो होगा.
चश्मे बद्दूर के रिमेक का बीड़ा डेविड धवन ने उठाया है. वेसे साल भर पहले भी इसके रिमेक और अधिकार वियोकाम 18 के खरीदने और ओनिर के निर्देशन की बात चली थी .डेविड ने गोविंदा के साथ कामेडी फिल्मो की झड़ी लगाईं है परन्तु सई के लेवल पर पहुचना उनके बस में नहीं है . हांलाकि बरसो पहले डेविड सई की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म में सहायक रह चुके है .
भले ही फिल्म रोमांटिक कामेडी थी ,परन्तु संगीत और गीत आज भी लोगो की जुबान पर है . . राजकमल का संगीत और यशुदास की आवाज भुलाए न भुलाई जा सकती है . '' काली घोड़ी द्वार खड़ी....'' '' कहाँ से आये बदरा ''.....आज भी बारिश के दिनों में अपने आप याद आजाता है . '' इस नदी को तुम मेरा आइना मान लो ''...बेमिसाल है . रेडिओ पर सुनते वक्त यह गीत रोमेंटिक लगता है और देखते वक्त कामेडी .
लगे हाथ ---चश्मे बद्दूर में रेखा और अमिताभ ने एक छोटी सी रोमांटिक भूमिका की थी .




गुरुवार, 31 मार्च 2011

महाभारत 2011 {प्रथम} की विजेता शिखा कौशिक और शालिनी कौशिक

 इस घोषणा को मैं मोमेंटो के साथ करना चाहता था. पर आवश्यक था, 
क्यों ...? पहले इसे पढ़े. ......
४  जजों में  दो ने भाग नहीं लिया, दो जजों को फैसला देना था जो आपस में लेखन के  चिर प्रतिद्वंदी है.. दोनों जजों के विचार कभी मेल नहीं खाते. अगर किसी पोस्ट पर खाए भी तो कुछ न कुछ विरोधाभास अवस्य रहा. डॉ. अनवर जमाल खान और डॉ. श्याम गुप्ता. 

सबसे पहले जवाब आया डॉ. गुप्ता जी का........ 
प्रिय हरीश जी----                           
                      प्रेम -महाभारत...फ़ैसला....( डा श्याम गुप्त )
           बहुत सुन्दर सुन्दर , विचाररपूर्ण, तार्किकता, भावना से भरपूर व  ग्यान के आलोक से प्रकाशित आलेख लिखे गये । प्रेम पर इतने अच्छे कथनों को पढवाने के लिये  हरीश जी तो  बधाई के पात्र हैं  ही, सभी प्रतियोगी भी बधाई के पात्र हैं।
              प्रियन्का, अमित तिवारी, अवनीश व मन्गल यादव सभी ने बहुत अच्छा लिखा परन्तु  आलेख वास्तव में सिर्फ़ कथोपकथन नहीं होते बिना उदाहरणों के उनमें स्पष्टता व वैचारिक संगतता नहीं आपाती ,वे एक नीरस वर्णन की भांति लगते हैं।  अत्यंत संक्षिप्त आलेख भी सिर्फ़ रटे रटाये कथन या स्वकथन मात्र लगते हैं । अधिकांश ने दिये हुए शीर्षक का भी प्रयोग नहीं किया।  सौरभ दुबे जी का आलेख भी अत्यन्त सुन्दर बन पडा है परंतु सिर्फ़ विवरणात्मकता तक ही सीमित रहने के कारण मेरे विचार से तीसरे स्थान तक आपाया ।
          मुझे मुख्य प्रतियोगिता  शालिनी व शिखा जी के आलेखों में प्रतीत हुई एवं द्वन्द्वात्मक स्थिति में दोनों में निर्णय करना कठिन था। दोनों आलेख श्रेष्ठ व उच्चकोटि के हैं । जहां शालिनी जी के आलेख में वैग्यानिक तार्किकता व साहित्यिक्ता व उद्धरणों के सौन्दर्य का भरपूर संयोजन है वहीं शिखा जी के आलेख में भी साहित्यिक तार्किकता, उच्चकोटि के उद्धरण-सुषमा, वैचारिकता, दर्शन, वैग्यानिकता,सामाजिक विग्यान जीवन से जुडे वक्तव्यों का सौन्दर्य भी परिलक्षित है । अतः मुझे वह अधिक समीचीन जान पडा । अतः शिखाजी का आलेख में सबसे ऊपर रखता हूं । इस प्रकार मेरे विचार से  प्रथम तीन आलेख इस प्रकार हैं....
    प्रथम---शिखा कौशिक जी..
    द्वितीय...शालिनी कौशिक जी
    त्रितीय....सौरभ दुबे जी ...

                                                          ---डा श्याम गुप्त...
-----------------------------------------------------------------
अब डॉ. अनवर जमाल साहब........ 
प्यारे भाई हरीश जी ! मैंने आपके द्वारा भेजे गए सात लेख पढ़े और उन्हें मोटे तौर पर दो चीज़ों को आधार बनाकर परखा ।
1. लेख की भाषा शैली कैसी है ?
2. लेख अपमेरा फ़ैसला : शालिनी कौशिक जी का लेख सर्वश्रेष्ठ है
ने विषय को कितना स्पष्ट कर पाया है ?
पहले बिन्दु को मैंने भाषा-शैली का शीर्षक दिया और दूसरे बिन्दु को भाव का। अब मैं आपको सातों लेख के बारे में बताता हूं कि मैंने उन्हें अपनी नज़र में कैसा पाया ?
सभी लेख अच्छे हैं और प्रेम के किसी न किसी कोण को सामने रखते हैं और अच्छे लगते हैं। सभी प्रशंसा के हक़दार हैं लेकिन बात प्रतियोगिता की है तो किसी न किसी को तो श्रेष्ठ कहना निर्णायक की मजबूरी है। लिहाज़ा मैंने पाया कि सभी लेखकों की भाषा-शैली सुबोध है और पाठक उनके मंतव्य को आसानी से समझ सकता है।
लेकिन जब मैंने भाव की दृष्टि से लेखों को परखा तो वे दो हिस्सों में बंट गए-
पहले हिस्से में तो शिखा कौशिक जी , प्रियंका राठौर जी, अमित तिवारी जी और अवनीश कुमार जी के लेख आते हैं
और
दूसरे हिस्से में शालिनी कौशिक जी, मंगल यादव और सौरभ दुबे के लेख आते हैं।
पहले हिस्से में जो लेख आते हैं वे भाव की दृष्टि से मध्यम हैं जबकि दूसरे हिस्से में जो लेख आते हैं वे भाव की दृष्टि से उत्तम हैं ।
अब मुझे इन तीन उत्तम लेखों में से एक श्रेष्ठ को चुनना था तो मैंने देखा कि शालिनी कौशिक जी ने अपने लेख में न सिर्फ़ विषय को पूरी तरह खोलकर बयान किया है बल्कि अपने लेख में साहित्यिक तर्कों के साथ वैज्ञानिक अन्वेषण का समावेश भी किया है जिससे उसकी उपयोगिता भी बढ़ गई है और वह सामयिक समस्याओं का एक हल भी पेश करता है।
मेरा निर्णय आपके विचारार्थ सादर प्रेषित है।
इज़्ज़त अफ़ज़ाई के लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार हूं।
---------------------------------------------------------
मैं दुविधा में था, भाई रियल्टी शो में भी वोट का जमाना है तो हमने भी वोट के लिए सभी के पास भेजा पर किसी का जवाब नहीं आया. फिर आज हमने डॉ. गुप्ता जी की पोस्ट पढ़ी. आप भी देंखे....

दो प्रेरक विचार....डा श्याम गुप्त.....

और हमने फैसला ले लिया ...

वास्तव में जजों के समक्ष क्या स्थिति होगी आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं. इस मंच की नीव प्रेम पर रखी गयी थी. और उसी प्रेम देन थी की  इतने अल्पसमय में लोग हमारे इतने समर्थक हो गए. उसी भावना का ख्याल रखते हुए हम दोनों जजों का सम्मान करते हैं. और महाभारत २०११ प्रथम का विजेता बहन शिखा और शालिनी कौशिक को घोषित करते हैं. और बाकी सभी प्रतिभागियों को उपविजेता. ताकि हमारे परिवार में द्वेष या ईर्ष्या नहीं. प्रेम का पग बढे...

अनवर भाई को को जिम्मेदारी और मुझे एक माह की छुट्टी.

सीधी और खरी बात.

हम पूरे परिवार सहित इस समय काफी तनाव में है. मेरे २५ वर्षीय भतीजे उपेन्द्र सिंह को छः माह पूर्व मुह में कैंसर हुआ था.. टाटा मेमोरियल मुंबई में आप्रेसन के बाद इलाहबाद में सेंकैया भी हुई.. अब दुबारा लीवर और फेफड़े में संक्रमण है. टाटा मेमोरियल से जवाब हो गया, दो अप्रैल को वह वापस आ रहा है अब उसे लेकर हम रामदेव के आश्रम हरिद्वार जायेंगे. इस बीच "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" से कई दिन दूर रहना पड़ेगा. मंच की सारी जिम्मेदारी मिथिलेश द्विवेदी. और हमारे युवा सहयोगी योगेन्द्र पाल पर.. साथ ही महाभारत की जिम्मेदारी बड़े भाई डॉ. अनवर जमाल के मजबूत कंधे पर. महाभारत २०११ द्वितीय का विषय. निर्णायक मंडल, फैसला व घोषणा सब. अनवर भाई आपको याद होगा मैंने कहा था इस मंच का कोई अध्यक्ष नहीं होगा. हमारा मकसद कुछ और है. हम प्रति माह जिम्मेदारिया बदलेंगे. यह पहली शुरुवात है. अनवर भाई आप इंकार भी करेंगे तो मैं एक माह बाद ही पढूंगा. पर मैं जनता हु आप हार नहीं मानते और फ्रेश होकर भी आ गए हैं. मेरे लिए दुआ करिए. प्रणाम, खुदा हाफिज़.........  आपका भाई हरीश सिंह. {योगेन्द्र जी मंच का नियम तोड़ने के लिए हम माफ़ी चाहते हैं. आप सम्भाले .............

सूचना ---- आप सभी विजेता व उपविजेता. शिखा कौशिक, शालिनी कौशिक, सौरभ दुबे, प्रियंका राठौर, अमित जी, अवनीश व मंगल जी. यदि आप पोस्ट मांगने का पता भेंज दे तो आपका प्रमाण पत्र भेज दिया जायेगा, बाकी पोस्ट पर प्रकाशित होगा ही. अपना पता हमें. editor.bhadohinews@gmail.com  पर भेंजे. 

शनिवार, 26 मार्च 2011

क्या आप हमारी तरफ देखेंगे मि. टेड टर्नर ...

 मुझे आश्चर्य है कि टेड टर्नर को भारत में अपनी -सिर्फ क्लासिक 'ब्लेक एंड व्हाइट फिल्म दिखने वाली चेनल TNT के भारतीय संस्करण को लांच करने का ख्याल अभी तक क्यों नहीं आया ? टेड टर्नर 'टाइम वार्नर इंक' CNN न्यूज चेनल, और 'वार्नर ब्रदर ' के भी मालिक है. यूँ तो TNT पिछले पंद्रह सालो से भारत में(अमेरिकन क्लासिक)फिल्मे प्रसारित कर रहा है, परन्तु जिस तरह से उन्होंने TNT के 'स्पेनिश ' और 'तुर्की' संस्करण जारी किये है और कई यूरोपीयन संस्करणों पर काम जारी है वेसी ही गुंजाइश भारत में भी है .
भारत में प्रति वर्ष एक हजार से ज्यादा फिल्मे बनती है और पहली बोलती फिल्म आलम -आरा से लेकर 'ब्लेक एंड व्हाइट फिल्मो के पुरे दौर में बेहतरीन क्लासिक और यादगार फिल्मे बनी है.परन्तु उचित रख रखाव के आभाव में अधिकाँश फिल्मो के प्रिंट नष्ट होने का कगार पर है. फिल्मो के प्रिंट की अधिकतम उम्र 70 -80 बरस होती है, गर उन्हें दो डिग्री सेल्सियस और चोवीस डिग्री आन्द्रता में संरक्षित किया जाए तब .
दूसरी तरफ पुराने संगीत को संरक्षित करने में ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़े है. यह काम कम खर्च में बगेर कोई आन्दोलन किये संपन्न हो रहा है. इसे सहेजने में राष्ट्रीय रेडियो स्टेशन के अलावा निजी स्टूडियो ने भी विशेष रूचि दिखाई और समय समय पर ओल्ड -इस -गोल्ड नाम से संगीत जारी कर काफी धन कमाया है .
इस तथ्य से इनकार नहीं है कि पुरानी और क्लासिक फिल्मो के प्रिंट को डिजिटल करने का काम काफी खर्चीला है , परन्तु टेड टर्नर जेसे मीडिया सम्राट के लिए यह काम आसान है.उन्होंने अमेरिका में 1939 से लेकर ब्लेक एंड व्हाईट दौर कि अधिकाँश फिल्मो को सहेज कर अपने टेलीविजन पर प्रसारित किया है और कुछ फिल्मो को रंगीन करने की आलोचना भी झेली है.
हमारे देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों ने भी पिछले कुछ समय से फिल्मो को व्यापार के रूप में लेना शुरू किया है . अनिल अम्बानी ग्रुप , सन टीवी , आदि विशेष रूप से सक्रिय है , परन्तु इनका भी रुझान फिल्म निर्माण और फिल्मो के लिए वित्त उपलब्ध करने तक ही है .कुछ लोग अवश्य टेलीविजन चेनल शुरू कर चुके है परन्तु वे मनोरंजक चेनल और न्यूज चेनल पर ही अटके हुए है
भारत के फिल्म प्रेमी दुआ ही कर सकते है कि टेड टर्नर का ध्यान इस तरफ जाए ..या हमारे अनिल अम्बानी , सुभास चन्द्रा या दयानिधि मारन को कुछ नया करने का जूनून आये .
(टेड टर्नर की मशहूर अभिनेत्री पत्नी जेन फोंडा ने अस्सी के दशक में योग के माध्यम से अपना 'काया-कल्प ' किया था. अपना फिटनेस विडियो जारी करने वाली वे पहली स्टार थी. भारत में उनका अनुसरण कर निख़रने वाली सर्वप्रथम अभिनेत्री रेखा थी )

गुरुवार, 17 मार्च 2011

खुद से ही लड़ते हुए समाज के लोग---(कुमारेन्द्र)

आजकल तो अब अपने से ही लड़ते रहते हैं, ये किसी भी शायराना अंदाज में कही हुई पंक्तियां मालूम हो सकती हैं पर ऐसा आजकल लगभग उन सभी के साथ हो रहा है जो दिल से देशहित में विचार करते रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि देशहित में विचार करने वालों की संख्या में कमी आ गई है अथवा लोगों ने इस ओर विचार करना बन्द कर दिया है। दरअसल हुआ यह है कि देशहित से मुख्य आजकल स्वार्थ हो गया है। इस स्वार्थ के कारण लोगों ने देशहित के स्थान पर स्वहित को तवज्जो देना शुरू कर दिया है।


अपने आपसे लड़ने की बात अनायास नहीं उभरी, समाज में चल रही विचित्र-विचित्र स्थितियों के बाद लगा कि व्यक्ति स्वयं से ही लड़ने में लगा हुआ है। इस तरह के हालात सरकारों के द्वारा पैदा किये गये हैं और इन हालातों का शिकार समाज का व्यक्ति ही हो रहा है। देश के विकास की बात करता है वह आदमी जो सारा दिन अपने कार्यालय में खटने के बाद शाम को घर के सदस्यों के खाने-पीने की व्यवस्था करता है। मंहगाई की मार, सामानों की अनुपलब्धता, हर एक कदम के साथ रिश्वतखोरी जैसे हालात उसे अपने से ही लड़ने को मजबूर करते हैं।

हो सकता है कि बहुत से लोगों को इसमें शायराना अंदाज के साथ एक प्रकार की फिलोसॉफी दिखाई पड़े पर यह किसी प्रकार का दर्शन नहीं वरन् आज की कटु सत्यता है। आदमी हर कदम पर प्रताड़ित हो रहा है और मुंह ताकने का काम करता है सरकार की ओर, सरकार के नुमाइंदों की ओर। इसके बाद उसे पता चलता है कि सरकार और उसके तमाम सारे अवयव सिर्फ और सिर्फ स्वहित में लगे हैं तो एक अम आदमी के पास हताशा और निराशा के अलावा कुछ बचता नहीं है। ऐसी हताशा और निराशा यदि नक्सलवाद को पैदा करता है तो व्यक्ति को व्यक्ति से लड़ाती है।

व्यक्ति का व्यक्ति से लड़ने का यही रूप जब सामने नहीं आता है तो आदमी अपने से ही लड़ने लग जाता है। उसकी यह लड़ाई उस हताशा का ही परिणाम होती है जो उसे किसी न किसी रूप में आये दिन परेशान करती है। घर के अन्दर रोजमर्रा की वस्तुओं से लेकर भौतिकतावादी सामानों में गिने जाने वाली वस्तुओं को देखें तो लगता है कि ये सब अब उनके लिए ही हैं जिनके पास सत्ता है अथवा उनके लिए जो किसी न किसी रूप में सत्ता के आसपास मंडरा रहे हैं।

हमारे तमाम सारे समाजशास्त्री, राजनीतिक विश्लेषक, विदेशनीति के जानकार किसी भी घटना के लिए एशियाई देशों के हालातों की व्याख्या कर उसका भारतीय संदर्भों में विश्लेषण करने लगते हैं पर अभी हाल में विश्व स्तर पर घटित हुईं सत्ता परिवर्तन की स्थितियों का भारतीय संदर्भ में किसी ने अध्ययन करने की आवश्यता महसूस नहीं की। इसका कारण क्या समझा जाये, या तो भारतीय इस प्रकार के परिवर्तन को लाने की क्षमता नहीं रखते हैं अथवा हमारे तमाम विश्लेषक विश्व स्तर की इन घटनाओं को पढ़ने और समझने में नाकाम रहे हैं।

याद रखना होगा कि देश जिस प्रकार से नक्सलवाद के हालातों से जूझ रहा है; आये दिन आरक्षण के नाम पर जाटों के हिंसात्मक प्रदर्शन से, विध्वंसात्मक प्रदर्शन से दो-चार होता है; वर्ग-संघर्ष के नाम पर आये दिन हत्याओं को होते देखा जा रहा है; इज्जत के नाम पर महिलाओं की इज्जत से खेलकर उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता हो; जनता के धन को मूर्तियों, पार्कों में खपा दिया जाता हो; ईमानदारी और मासूमियत के नाम पर करोड़ों के घोटालों का पता प्रधानमंत्री को रहता हो; बड़े से बड़ा भ्रष्टाचारी सिर्फ इस कारण से छूट जाता है कि उसके विरुद्ध पाये गये सबूत इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं; गरीबों से भरे इस देश मे अब घोटालों की भरमार करोड़ों के मूल्य में पहुंच गई हो; जहां दाल, चावल, रोटी, सब्जी मंहगी और सिम, कम्प्यूटर, मोबाइल सस्ते हों वहां के हालातों के विस्फोटक होने को कौन टाल सकता है? यह और बात है कि संतोषम् परम् सुखम् की जो घुट्टी हम भारतीयों को बचपन से ही पिलाई जाती रही है, उसके असर को कम होने में अभी भी सालों लगेंगे। इसके साथ ही यह भी स्मरण रखना होगा कि जैसे ही इस घुट्टी ने असर दिखाना कम अथवा बन्द किया उस दिन............!!!!

शेष अभी बहुत कुछ समय के गर्भ में है, अब तो अपने से लड़ते हुए मन करता है कि छोड़ कर इस तरह की शब्दों की कारीगरी कुछ दूसरी तरह की कारीगरी शुरू कर दी जाये। शायद उसी से कुछ परिणाम निकलना शुरू हो क्योंकि समाज के दुश्मन अब शब्दों की तलवार से भयभीत नहीं होते और मरते भी नहीं; आखिर उनकी शर्म-लिहाज जो मर चुकी है।

---------------------------
चित्र गूगल छवियों से साभार

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

नारी स्वतंत्रता के मायने-------- मिथिलेश

वर्तमान युगमें सब ओर स्वतन्त्राकी आकाक्षां जाग्रत हो गयी है । नारी ह्रदयमें भी इसका होना स्वाभावीक है । इसमे सन्देह नहीं कि स्वतन्त्रता परम धर्म है और नर तथा नारी दोनों ही स्वतन्त्र होना भी चाहिए । यह भी परम सत्य है कि दोंनो जबतक स्वतन्त्र नहीं होंगे , तबतक यथार्त प्रेम भी नहीं होगा । परन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि दोंनो की स्वतन्त्रताके क्षेत्र तथामार्ग एक हैं या दो ? सच्ची बात यह हैं की नर और नारीका शारीरिक और मानसिक संघटन नैसर्गिक दृष्टिसे कदापि एक-सा नहीं हैं । तो दोंनो की स्वतन्त्रा कें मार्ग भी निश्चय ही दो हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्रमें अपने मार्ग से चलकर ही स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं । यही स्वधर्म है। जब तक स्वधर्म नहीं समझा जायेगा तबतक कल्याणकी आशा नहीं है । स्त्री घर की रानी है ,साम्रागी है ,घरमें उसका एकछत्र राज्य चलता है , पर वह गर की रानी स्नेहमयी माता और आदर्श गृहिणीके ही रुप में । नारीका यह सनातन मातृत्व ही उसका स्वरुप है । वह मानवता की नित्यमाता है । भगवान राम - कृष्ण , भीष्म-युधिष्ठिर , कर्ण , अर्जु, बुद्ध, महावीर , शंकर , रामानुज , गांधी आदि जगतके सभी बड़े- पुरुषको नारीने ही ने सृजन किया और बनाया है । उसका जीवन क्षणिक वैषयिक आनन्दके लिए नहीं , वह तो जगत् को प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाली स्नेहमयी जननी है । उसमे प्रधानता है प्राणोंकी ह्रदयकी और पुरुषमें प्रधानता है शरीर की।
इसीलिए पुरुषकी स्वतन्त्राका क्षेत्र है शरीर और नारीकी स्वतन्त्रा क्षेत्र है प्राण- ह्रदय़ ! नारी शरीरसे चाहे दुर्बल हो , परन्तु प्राणसे वह पुरुष अपेक्षा सदा ही अत्यन्त सबल है। इसीलिए पुरुष उतने त्यागकी कल्पना नहीं कर सकता , जितना त्याग नारी सहज ही कर सकती है , अर्थात पुरुष और स्त्री सभी क्षेत्रोंमें समान भावसे स्वतन्त्र नहीं है । कोई जोश में आकर चाहे यह न स्वीकार करें , परन्तु होशमें आनेपर तो यह तय ही मानना पड़ेगा कि नारी देहके क्षेत्र में कभी पूर्णतया स्वाधीन नहीं हो सकती । प्रकृति ने उसके मन , प्राण और अवयवोंकी रचना ही ऐसी की है । नारी अपने एक विशिष्ट क्षेत्र में रह कर प्रकारान्तरसे सारे जग की सेवा करती है । यदी नारी अपनी इस विशिष्टता को भूल जाये तो जगत् का विनाश जल्द ही संभव है ।
जिन पाश्चात देशोंमें नारी स्वतन्त्रा के गान गाये जा रहे है वहाँ भी स्त्रियाँ पुरुषकों भांती निर्भिक रुप से विचरण नहीं कर पाती । नारी में मातृत्व है , गर्भ धारण करना ही पड़ता है । प्रकृति नें पुरष को इस दायित्व से मुक्त रखा है । इसलिए स्वतन्त्रा स्वाधिनता सर्वत्र सुरक्षित नहीं है, नारी अपने इस दायित्व से बच नहीं सकती ,जो बचना चाहती हैं , उसमे विकृतरुपसे इसका उदय होता है । यूरोपमें नारी स्वतन्त्र है , पर वहाँ की स्त्रियाँ क्या इस दायित्व से बचती है ? क्या वासनाओं पर उनका नियत्रंण है ? वे चाहे विवाह करे या ना करे परन्तु पुरुष संसर्ग किये बिना रही नहीं सकती । इग्लैंड़ में बीस वर्षकी आयुवाली कुमारीयों में चालीस प्रतिशत विवाहके पहले ही गर्भवती पायी जाती है , क्या देश का ऐसा नैतिक पतन कहीं देखने कि मिल सकता है ?? क्या ऐसी स्वतन्त्रा भारतीय महिलायें चाहती है ?? विदेशियोंका पारिवारिक जिवन भी नष्ट होता जा रहा है ।
लोग कहते है कि वहां की महिलायें शिक्षित हुई उनका विकास हुआ है । इसमें इतना तो सत्य है कि वहाँ स्त्रियोंमें अक्षर-ज्ञानका पर्याप्त विस्तार है ,परन्तु इतने मात्र से कोई सुशिक्षित और विकसित हो जाये , ऐसा नहीं माना जा सकता ।

अस्वतन्त्रा भवेत्रान्त्ररी सलज्जा स्मितभाषिणी ।
अनालस्या सदा स्त्रिग्धा मितवाग्लोभवर्जिता ।। (उत्तराखण्ड ८-२)

"नारी को स्वच्छन्दतासे शून्य , लज्जायुक्त , मन्द मुदकानहीन वाणी बोलनेवाली , सदा प्रेम पूर्वक भाषण करने वाली और लोभसे हीन होनी चाहिए "।
वास्तव में शिक्षा वह है जो मनुष्यमें उसके स्वधर्मानुकूल कर्तव्य जाग्रत करके उसे कर्तव्यका पूरा पालन करने योग्य बना दें। प्रकृति के विरुद्ध शिक्षासे कोई लाभ नहीं हो सकता है ये भी सत्य है । इस युग में जो
शिक्षा महिलाओं को दी जा रही है क्या उनका स्वधर्मोचित विकास हुआ है ?? एक बड़ा सवाल हो सकता है ।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्दिमवाप्रोती न सुखं न परां गतिम् ।

"जो मुनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह सुख को कभी प्राप्त नहीं कर सकता ।
"
सच पूछिये तो सैकड़ो वर्षोसे चली आ रही है यूरोपकी शिक्षाने वहाँ कितनी महान् प्रतिभाशालिनि जगत की नैसर्गिक रक्षा करने वाली महिलाओं को उतपन्न किया है ? बल्कि यह प्रत्यक्ष है कि इस शिक्षासे वहाँ नारियों में गृहणीत्व तथा मातृत्व हास हुआ है । अमेरिका में 77 प्रतिशत महिलायें घर के कामों मे असफल होती है , । 60 प्रतिशन महिलायें ज्यादा उम्र हो जाने के कारण वैवाहिक योग्यता खो देती हैं । विवाह की उम्र साधारतः 16 से 20 वर्ष की मानी जाती है , इसके बाद ज्यों-ज्यो उम्र बढ़ती जाती है त्यों-त्यों विवाह की योग्यता भी कम होती जाती है । इसी का परिणाम है कि वहाँ स्वेक्षाचार , अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे हैं । अविवाहिता माताओंकी संख्या क्रमशः बढती जा रही है । घर का सुख किसी को नहीं । बिमारी तथा बुढापे में कौन किसकी सेवा करें ? वहां की शिक्षिता स्त्रियो में लगभग 50 प्रतिशत कुमारी रहना पड़ता है । क्या यही बहुमुखी विकास है ?????

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

ब्रह्म हत्या से बडा़ पाप कन्या भ्रूण हत्या...................शिव शंकर



जिसकी सेवाए त्याग एवं ममता की छॉंव में पलकर पूरा परिवार विकसित होता है, उसके आगमन पर पूरे परिवार में मायूसी एवं शोक के वातावरण का व्याप्त हो जाना विडंबनापूर्ण अचरज ही है। कन्या - जन्म के साथ ही उस पर अन्याय एवं अत्याचार का सिलसिला शूरू हो जाता है। अपने जन्म के परिणामों एवं जटिलताओ से अनभिज्ञ उस नन्हीं - सी जान के जन्म से पूर्व या बाद में उपेक्षा , यहॉं तक कि हत्या भी कर दी जाती है।

लोगो में बढती पुत्र- लालसा और खतरनाक गति से लगातार घटता स्त्री, पुरूष अनुपात आज पूरे देश के समाजशास्त्रियोए, जनसंख्या विशेषज्ञों , योजनाकारो तथा समाजिक चिंतकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। जहॉ एक हजार पुरूषों में इतनी ही मातृशक्ति की आवश्यकता पडती है, वही अब कन्या - भ्रूण हत्या एवं जन्म के बाद बालिकाओं की हत्या ने स्थिति को विकट बना दिया है। आज लोगो में पहले से ही लिंग जानने से भ्रूण हत्या में इजाफा हो रहा है। लोग पता लगा कर कन्या भ्रूण को नष्ट कर देते है। गर्भपात करना बहुत बडा कुकर्म और पाप है। शास्त्र में भी कहा गया है कि गर्भपात अनुचित है, संस्कृति में इस संदर्भ में एक श्लोक है ।
यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातनेए प्रायश्चितं न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते श्श्
ब्रह्म हत्या से जो पाप लगता है, उससे दुगुना पाप गर्भपात से लगता है। इसका कोई प्रायश्चित नहीं है

आज भी प्रत्येक नगर एवं महानगर में प्रतिदिन भ्रूण हत्या हो रही है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि समाजसेवी संस्था, और वैधानिक प्रावधान भी इस क्रुर पद्धति को रोकने में अक्षम है। किसी जमाने में बालिकाओ को पैदा होते ही मारे जाने और अपशकुन समझे जाने का अभिशाप झेलना पडता था, लेकिन वर्ममान में भी लोगो मे कन्या को जन्म से पहले या जन्म के बाद भी मारने में कोइ भी परिवर्तन नहीं आया है। लोग इस तरह बालिकाओ को जन्म से पहले नष्ट करते रहे तो मनुष्य जाति का विनाश जल्द ही निश्चित है। कन्या भ्रूण हत्या इतने तेजी के साथ हो रहा है कि वर्तमान मे स्त्री - पुरूष अनुपात भी कई राज्यो में भिन्न भिन्न स्थिति में पाये जा रहे है।

आज स्त्रियो का अनुपात दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है जो आगे चलकर मनुष्य जाति के लिए विनाश का कारण बनेगीं। अभी जल्द ही भारत सरकार द्धारा कराये जनगणना 2010- 2011 के अनुसार स्त्री- पुरूष अनुपात का आकडा जो पेश किया गया वो चिन्ता का विषय बना हुआ है। भारत में लिंगानुपात पुरूषो के मुकाबले स्त्रियो का कम है। ये अनुपात कम होने का सबसे बडा कारण बडे पैमाने पर हो रहे कन्या भ्रूण हत्या है ।

भारत में 1000 पुरूषो के मुकाबले महिलाये 933 है, ग्रामीण स्तर पर 946 और नगरीय महिला अनुपात 900 है। ये आकडा तो पूरे भारत का था। राज्यो में स्त्रियो के सबसे अधिक अनुपात वाला राज्य केरल 1058 है। स्त्रियों के सबसे कम अनुपात वाला राज्य हरियाणा 861 है। संघ राज्य क्षेत्रो में सबसे अधिक अनुपात पाण्डिचेरी का 1001 है और सबसे कम दमन और दीव का 710 है।
संघ राज्य क्षेत्रो के जिलो में सबसे अधिक माहे (पाण्डिचेरी) 1147 और सबसे कम दमन का 591 है।

इन आकडो को देख कर हम अनुमान लगा सकते है कि भारत में महिलाओं का अनुपात किस प्रकार घटता जा रहा है।
अगर सरकार जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाती है तो देश में बहुत गहन समस्या उत्पन हो सकती है। कई राज्यों में कन्या के जन्म को लेकर कई भ्रांतिया है जैसे- तमिलनाडु के मदुरै जिले के एक गॉंव में कल्लर जाति के लोग घर में कन्या के जन्म को अभिशाप मानते हैं। इसलिए जन्म के तीन दिन के अन्दर ही उसे एक जहरीले पौधे का दूध पिलाकर या फिर उसके नथुनों में रूई भरकर मार डालते हैं। भारतीय बाल कल्याण परिषद् द्धारा चलाई जा रही संस्था की रिपोर्ट के अनुसार इस समुदाय के लोग नवजात बच्ची को इस तरह मारते है , कि पुलिस भी उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कर पाती ।
जन्म लेते ही कन्या के भेदभाव की यह मानसिकता सिर्फ असभ्य , अशिक्षित एवं पिछडे लोगो की नहीं है, बल्कि कन्या अवमूल्यन का यह प्रदूषण सभ्य, शिक्षित एवं संभ्रांत कहे जाने वाले लोगो में भी सामान्य रूप से पाया जाता है। शहरों के तथाकथित विकसित एवं जागरूकता वाले माहौल में भी इस आदिम बर्बता ने कन्या भ्रूणों की हत्या का रूप ले लिया है। इसे नैतिक पतन की पराकाष्ठा ही कह सकते है कि जीवन रक्षा की शपथ लेने वाले चिकित्सक ही कन्या भ्रूणों के हत्यारे बने बैठे है।


अस्तित्व पर संकट के अतिरिक्त बालिकाओ को पोषणए स्वास्थए शिक्षा आदि हर क्षेत्र में भेदभाव का शिकार होना पडता है।वास्तव में अभिभावकों की संकीर्ण मानसिकता एवं समाज की अंध परंपराएं ही वे मूल कारण हैं जो पुत्र एवं पुत्री में भेद भाव करने हेतू बाध्य करते हैं। हमारे रीति - रिवाजों एवं समाजिक व्यवस्था के कारण भी बेटा और बेटी के प्रति सोच में दरार पैदा हुई है।
अधिकांश माता - पिता समझते है कि बेटा जीवनपर्यंत उनके साथ रहेगा उनका सहारा बनेगा । हलांकि आज के समय में पुत्र को बुढापे का लाठी मानना एक धोखा ही है। लडकियों के विवाह में दहेज की समस्या के कारण भी माता - पिता कन्या जन्म के स्वागत नहीं कर पाते । समाज में वंश - परंपरा का पोषक लडको को ही माना जाता है। ऐसे में पुत्र कामना ने मानव मन को इतनी गहराई तक कुंठीत कर दिया है कि कन्या संतान की कामना या जन्म दोनो अब अनेपेक्षित माना जाने लगा हैं।

भारत सरकार ने एक राष्टीय कार्य योजना बनाई है, जिसका मुख्य उद्देश्य पारिवारिक एवं समाजिक परिवेश में बालिकाओं के प्रति सामानतापूर्ण व्यवहार को बढावा देना है। सरकारी कार्यक्रमों गैर सरकारी संगठनों के प्रयास एवं मीडिया के प्रचार - प्रसार से कुछ हद तक जनमानस में बदलाव अवश्य आया है , परंतु निम्न मध्यम वर्ग एवं गरीब परिवारो में अभी भी लैंगिक भेद भाव जारी है। जहॉं बालिकाओ का जीवन पारिवारिक उपेक्षा , असुविधा एवं प्रोत्साहनरहित वातावरण में व्यतीत होता है। जहॉं उनका शरीर प्रधान होता है, मन नहीं। समर्पण मुख्य होता है, इच्छा नहीं। बंदिश प्रमुख है, स्वतंत्रता नहीं।


बदलते हुए वातावरण के साथ अब ऐसी मान्याताओ से उपर उठना होगा। बालिकाओं के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। अब तक किये गए शोषण और उपेक्षा के बाद भी जहॉं भी उन्हे मौका मिला है वे सदा अग्रणी रही हैं। इक्कीसवीं सदी नारी वर्चस्व का संदेश लेकर आई हैं।अगर हम अब भी सचेत नहीं हुए तो हमें इसकी कीमत चुकानी पडेगी । अगर हम अपनी सोच नही बदले तो फिर भविष्य में हमें राष्ट्पति प्रतिभा पाटिल , लोक सभा अध्यक्ष मीरा कुमार और मायावती जैसी सफल महिला हस्तियों से वंचित होना पडेगा। इस लिए समाज में फैले कन्या भ्रूण हत्या जैसे पाप को रोकने के लिए जल्द से जल्द सफल प्रयास करना चाहिए ।

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

लडकियों के शिक्षा के अधिकार का सच ... ..... ( शिव शंकर)


भारत में ६ से १४ साल तक के बच्चो के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का कानून भले ही लागू हो चुका हो, लेकिन इस आयु वर्ग की लडकियों में से ५० प्रतिशत तो हर साल स्कुलो से ड्राप- आउट हो जाति है। जाहिर है,इस तरह से देश की आधि लडकियां कानून से बेदखल होती रहेगी। यह आकडा मोटे तैर पर दो सवाल पैदा करते है। पहला यह कि इस आयु वर्ग के १९२ मिलियन बच्चों में से आधी लडकिया स्कुलो से ड्राप-आउट क्यो हो जाती है ? दूसरा यह है कि इस आयु वर्ग के आधी लडकिया अगर स्कुलो से ड्राप- आउट हो जाती है तो एक बडे परिद्श्य में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून का क्या अर्थ रह जाता है ?
इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन(१९९६) की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि दुनिया भर में ३३ मिलियन लडकिया काम पर जाती है,जबकि काम पर जाने वाले लडको की संख्या ४१ मिलियन है। लेकिन इन आकडो मे पूरे समय घरेलू काम काजो मे जूटी रहने वाली लडकियो कि संख्या नहीं जोडी गई थी ।

इसी तरह नेशनल कमीशन फाँर प्रोटेक्शन आँफ चिल्ड्रेन्स राइटस की एक रिपोर्ट में भी बताया गया है कि भारत मे ६ से १४ साल तक कि अधिकतर लडकियो को हर रोज औसतन ८ घंटे से भी अधिक समय केवल अपने घर के छोटे बच्चो को संभालने मे बिताना पडता है। सरकारी आकडो मे भी दर्शाया गया है कि ६ से १० साल तक कि २५ प्रतिशत और १० से १३ साल तक की ५० प्रतिशत (ठीक दूगनी) से भी अधिक लडकियो को हर साल स्कुलो से ड्राप- आउट हो जाना पडता है।

एक सरकारी सर्वेक्षण (२००८) के दौरान ४२ प्रतिशत लडकियों ने बताया कि वह स्कुल इस लिए छोड देती है कि क्योंकि उनके माता-पिता उन्हे घर संभालने और छोटे भाई बहनों की देखभाल करने के लिए कहते है,आखिरी जनगणना के मुताबिक ,२२.९१ करोड महिलाएं निरक्षर है,एशिया में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है।
एन्युअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट (२००८) के मुताबिक ,शहरी और ग्रामीण इलाके की महिलाओं और पुरुषों के बीच साक्षरता दर क्रमशः ५१.१ प्रतिशत और ६८.४ प्रतिशत दर्ज हैं।

क्राई के एक रिपोर्ट के अनुसार,५ से ९ साल तक की ५३ प्रतिशत भारतीय लडकिया पढना नहीं जानती, इनमे से अधिकतर रोटी के चक्कर मे घर या बाहर काम करती है। ग्रामीण इलाकों में १५ प्रतिशत लडकियों की शादी १३ साल की उम्र में ही कर दी जाति है। इनमें से तकरीबन ५२ प्रतिशत लडकियां १५ से १९ साल की उम्र मे गर्भवती हो जाती है। इन कम उम्र की लडकियों से ७३ प्रतिशत (सबसे अधिक) बच्चे पैदा होते है। फिलहाल इन बच्चो में ६७ प्रतिशत (आधे से अधिक) कुपोषण के शिकार है। लडकियों के लिए सरकार भले हि सशक्तिकरण के लिए शिक्षा जैसे नारे देना जितना आसान है,लक्ष्य तक पहुंचना उतना ही कठीन।

दूसरी तरफ कानून मे मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कह देने भर से अधिकार नहीं मिल जाएगा, बलिक यह भी देखना होगा कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के अनुकूल ।खास तौर से लडकियो के लिए ,भारत में शिक्षा की बुनियादी संरचना है भी या नहीं ।आज ६ से १४ साल तक के तकरीबन २० करोड भारतीय बच्चो की प्राथमिक शिक्षा के लिए पर्याप्य स्कूल ,कमरे , प्रशिक्षित शिक्षक और गुणवतायुक्त सुविधाएं नहीं है, देश की ४० प्रतिशत बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं और इसी से जुडा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ४६ प्रतिशत सरकारी स्कूलो में लडकियों के लिए शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है।

मुख्य तौर पर सामाजिक धारणाओं,घरेलू कामकाजो और प्राथमिक शिक्षा में बुनियादि व्यवस्था के अभाव के चलते एक अजीब सी विडंबना हमारे सामने हैकि देश की आधी लडकियों के पास अधिकार तो हैं,मगर बगैर शिक्षा के । इसलिए इससे जुडे अधिकारो के दायरे में लडकियों की शिक्षा को केंद्रीय महत्व देने की जरुरत है, माना कि यह लडकिया अपने घर से लेकर छोटे बच्चों को संभालने तक के बहुत सारे कामों से भी काफी कुछ सीखती है। लेकिन अगर यह लडकियां केवल इन्ही कामों में रात- दिन उलझी रहती है ,भारी शारीरिक और मानसिक दबावों के बीच जीती हैं,पढाई के लिए थोडा सा समय नहीं निकाल पाती हैं और एक स्थिति के बाद स्कुल से ड्राप्आउट हो जाती है तो यह देश की आधी आबादी के भविष्य के साथ खिलवाड ही हुआ।

आज समय की मांग है कि लडकियों के पिछडेपन को उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनके खिलाफ मौजूद परिस्थतियो के रुप में देखा जाए। अगर लडकी है तो उसे ऐसे ही रहना चाहिए ,जैसे बातें उनके विकाश के रास्ते में बाधा बनती हैं। लडकियों की अलग पहचान बनाने के लिए जरुरी है कि उनकी पहचान न उभर पाने के पीछे छिपे कारणो की खोजबीन और भारतीय शिक्षा पद्दती ,शिक्षकों की कार्यप्रणाली एवं पाठ्यक्रमों की पुनर्समीक्षा की जाए ,लडकियों की शिक्षा से जुडी हुई इन तमाम बाधाओं को सोचे- समझे और तोडे बगैर शिक्षा के अधिकार का बुनियादी मकसद पूरा नहीं हो सकता है ।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

मनोरंजन बनाम अश्लीलता---------मिथिलेश

बाजारवाद वर्तमान समय में सर्वोपरी है । हमें सिर्फ लाभ होना चाहिए चाहे उसके बदले नैतिकता ही क्यों ना दाव पर हो । पूंजीवाद का ऐसा दौर भी आयेगा कभी सोचा ना था । मनोरंजन की शुरुआत की गई मानवजीवन से नीरसता दूर करने के लिए , बाद में इसका स्वरुप थोड़ा बदला । मनोरंजन के साथ.साथ इसका प्रयोग संदेश वाहक के रुप में भी किया जाने लगा । कहानी, नाटक कथा आदि इसके प्रमुख स्त्रोत रहे । धीरे-धीरे विज्ञान ने प्रगति की जिसके चलते सूचना तंत्र का मोह रुपी मकड़जाल घर-घर में पहुँच गया । विज्ञान की प्रगति प्रशस्ति के योग्य है, जिसकी प्रशंसा अवश्य होनी चाहिए लेकिन तब जब वह प्रगति हमारे सांस्कृतिक व पारिवारिक मूल्यों को विकास के पथ की ओर ले जाए ना कि पतन की ओर । आज मनोरंजन के नाम पर घर-घर में अश्लीलता परोसी जा रही है। 1982 में एशियाड के दौरान बड़े-बड़े स्टेडियम बने। उन्ही के साथ भारत में रंगीन टेलीविजन आने लगे। पहले इनके दाम ज्यादा थे किंतु प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने की वजह से इनके दामों में अपार कमी आई और इनकी पहुँच घर-घर में हो गई । शुरूआती दौर में मात्र दो चैनल आते थे और रामायण,महाभारत जैसे महाग्रंथों पर आधारित धारावाहिको का प्रसारण होता था, तब मैं बहुत छोटा था, लोग बताते हैं कि जिस समय रामायण या महाभारत का प्रसारण होता था सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था , क्या हिंदू क्या मुस्लिम क्या ईसाई सब इंतजार में लगे रहते थे कि कब रामायण शुरु हो ।

एक वह युग था और एक आज का दौर हैं । आज धारावाहिक, सिनेमा वह सब दिखा रहा है जो हमारे संस्कृति के विरुद्ध है । धारावहिकों, फिल्मों में खुले यौन संबंध , विवाह से पूर्व यौन संतुष्टि इन सबकी वकालत की जा रही है। सारा समाज ही गंदा नजर आ रहा है। अब जब भारत विकास के पथ पर अग्रसर है जाहिर सी बात है विकास का दौर हर क्षेत्र में चलेगा। अभी हाल ही में एक फ़िल्म आई नो वन किल्ड जेसिका फिल्म ने सारे रिर्काड तोड़ दिए फूहड़ता के। पहले फिल्मों में जब गालियां या कुछ अनुचित शब्दों का प्रयोग होता था तब बीप की आवाज आती थी लेकिन अब ये सूक्ष्म पर्दा भी ना रहा। हमारी युवा पीढ़ी अक्सर इन फिल्मों की नकल करने की कोशिश में रहती है । मनोरंजन के नाम पर टीवी और फिल्मों के माध्यम से जो कुछ परोसा जा रहा है उसपर स्वस्थ चिंतन अतिआश्यक हो गया है । आज की नवजात पीढ़ी समय से पहले जवान हो रही है , उसे हिंसा , अश्लीलता तथा फंटासी में ही चरम आनंद मिल रहा है। पिछले दिनों कई ऐसी घटनाएं घटी जो फिल्मों से प्रेरणा स्वरुप की गई । हमारा देश अपने संस्कृति अपने संस्कारो के लिए जाना जाता है। हमारे यहॉं की संस्कृति परिवारवाद पर टीकी है लेकिन पाश्चात्य सभ्यता के चोचलों ने इसे बाजारवाद ला बिठाया है । जहॉं टीवी पर धरावाहिको और रिएलिटी शो के माध्यम से सुंदरियों की खोज की जी रही है वहीं फिल्मों के माध्यम से लड़कियां पटाने के तौर तरीके सिखाए जा रहे हैं। वाजारवाद चारो तरफ छाया है , सेक्स ही सब कुछ रह गया बाकी सब गौण ।
कुकल्पनाओं पर आधारित धारावाहिकों, फिल्मों को तवज्जों दी जा रही है । धारावाहिको में महिलाओं को कुचक्र रचते हुए दर्शाया जा रहा है, फिल्मों में गालियां बकते हुए, जिससे नारी की भाव-संवेदना समर्पण की गरिमा एक ओर एवं विघटनकारी स्वरुप दूसरी ओर हावी हो रहा है। मनोरंजन के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा उससे हमें हैरानी नही होनी चाहिए कि अगर हम अपनी भारतीयता की पहचान खो दे । जरुरी है अश्लीलता को पाबंद किया जाए तथा ललित कलाओं को फिर से पुनर्जीवित कि जाए, टीवी और फिल्मों के माध्यम से सामाजिक नवचेतना का संचार किया जाए।

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

मन के हारे हार हे,मन के जिते जीत


                                                  वैसे तो यह दोहा कविर दास ने लिखा था ,कि
                  “मन के हारे हार हे मन के जिते जीत ,कहे कविर गुरु पाईये मन हि के परपित"
मै यह कहना चाहता हू कि आज कि युवा पिढी जीवन मे कुछ भी खोना नही चाहती,वो बस पाना चाहता है,अगर वो कुछ खोता है तो वो उसे दुबारा पाने कि कोशीस नही करति,ओर वो दुसरे रास्तो पर भटक जाते है,
मै अपने बारे मे बताता हू मै डियु के एक कालेज मे पढता हू ,कुछ दिनो पहले यही मेरि भी सोच थी,ओर मै भी यही सोच रहा था कि मेरा कैरियर बरबाद हो गया ओर मै कमरे मे अपने आपको रखने लगा,बात कुछ एसी थी कि ,एक बार मै फेल हो गया था ओर दुसरे साल जब मैने दुबारा एडमिशन करवाया तो उसके कुछ महिने बाद हि मेरा  एक्सीडेंट हो गया,एक बार फिर मेरा पढाई खराब हो गई,मैने सोचा कि मेरा जीवन बरबाद हो गया,उन दो सालो कि तुलना मैने अपने पूरे जीवन से कर दीया,इससे पहले मैने अपने जीवन मे कुछ खोया नही था, अब मेरे अन्दर हीन भावना आने लगी ओर मै खुद को बहूत कमजोर सोचने लगा,ओर अपनी तुलना दुसरे से करने लगा,उस समय मै यह सोच रहा था कि कब मै काबिल इन्सान बनुंगा ओर सफलता कब पाउंगा धिरे-धिरे मै अब अपने दुखो को भूलकर अपनी लाईफ मे वापस आ गया हू,उस समय मै किसी भी काम करने कि क्षमता मेरे अन्दर नही थी,पहले मै किसी भी काम को चाहे कर पाऊ या न कर पाऊ मै बोलता था कि मै इसे कर लूंगा,लेकिन अब मेरे अन्दर यह क्षमता आ गई हैं,अब मै बोल सकता हू कि मै यह काम कर लूंगा,अब मै कर रहा हू पूरे जोश के साथ,मैने यह प्रेरणा कुछ महान हस्तियों  के जीवन से पाया,मै आपको इन महान हस्तियों  के बारे मे बताता  हू,
अब्राहम लिंकन -------------
       इनका जन्म १२ फरवरि १८०९ मे हूआ था,ये १८१६ सन मे इनडियना चले गये ओर अपना जवानी वही गूजारी,जब ये ९ साल के थे तो तभी इनके माँ का देहान्त हो गया था,यह अपनी सौतेली माँ के यह बहूत खुश थे जो इनको पढाति थी,ये बहूत गरीब थे,एक बार आपने अपने मिञ से किताब मांगा था,ओर वो किताब ओस मे भिग गया तो उनके मिञ ने उनसे उस किताब कि दाम मांगा,उनके पास पैसे नही थे देने के लिये तब उन्होंने उसके खेत मे काम करके उस किताब का दाम अदा किया,वह किताबो से प्यार करते थे,लेकिन उसके पास पढने के लिये किताब नही था,उनकि माँ उनको कोयले कि राख से पढाति थी,आपने २१ साल कि उमर मे बिजनेस ओर २२ साल मे चुनाव हार गये,आपने अपना बिजनेस फिर सुरु किया ओर २४ साल मे एक बार फिर से  बिजनेस मे माँत खा गये,इसके एक साल बाद हि इनकि पत्नी का देहान्त हो गया ओर इनका माँनसिक संतुलन कुछ हिल गया,३४ साल मे आपने कांग्रेस के चुनाव ओर ४५ साल मे सिनेट के चुनाव मे हार देखनि पणि, 47वें साल में वह उपराष्ट्रपति बनते-बनते रह गये,५२ साल कि उमर मे अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गये,अगर ये अपनी असफलताओंये देखकर पिछे मुण जाते या ये अपनी किस्मत समझकर हार माँन लेते,अगर ये चाहते तो अपनी वकालत फिर से सुरु कर सकते थे पर आपने एसा कुछ नही किया ओर लडते रहे हार तो केवल सफर का भटकाव है, अंत नही, ऐसे हि बहूत से लोगो ने ज़िंदगी मे  सफर  तय किया है,जैसे लाल बहादुर शास्त्री इनको हि देख लिजिये ये पढने के लिये नदी पार करके स्कूल जाते थे ,इनके पास नाव से जाने के लिये पैसे नही होते थे,आपने भी काफी संघर्ष  किया ओर एक दिन ये भारत के प्रधानमंत्री बने
थामस एडिसन को कौन नही जानता आपने बिजलि का आविष्कार किया था,ये बस तीन महिने स्कूल गये थे,आपने दस हजार बलबो का आविष्कार किया सब मे इनको असफलताओं मिलि,लेकिन ये हार नही माँने ओर ये अपने पथ पर लगे रहे आखिर आपनेएक दिन सफलता पा हि लिया,उन्होंने अपने बरबाद हूये समय को बहूत किमति कहा ओर कहा हमाँरि सारि गलतिया जल के राख हो गई।
ओर बिजलि के आविष्कार के बाद आपने तिन हि हपतो के बाद हि फोनोग्राफ का आविष्कार कर दिया
इसी तरह बिथेवोन को  कहा गया था कि उनमे संगीत देने कि प्रतिभा  नही है,लेकिन उन्होंने संगीत कि कुछ उत्तम  रचना दिया
एसे ही अगर हम इतिहास को  पढते है तो हमे ये पता चलता है कि हर सफलता कि भूमीका असफलताओं से सुरु हूई है,इतनि असफलताओं के बाद भी उन्होंने अपने  लगन को नही छोडा ,ओर सफलता को पा ही लिया
हममे से कुछ लोगो अपने जीवन मे अपनी असफलताओं पर एक बार या दो बार कोशिस करते है,ओर बोलते है कि हमने पूरीकोशिस कर लिया लेकिन कुछ हासिल नही हूआ,एक बात बताना चाहता हू कि असफलताओं हमे पिछे नही,आगे बढाती है,असफलताओं हमे सीख देति है,ओर  अपनी असफलताओं से सीखते हूये आगे बढते हैं,अगर हम सब कामयाबि चाहते है तो हमे अपनी असफलताओं से सीख लेनि पडेगि,
हममे ओर उनमे फर्क सिर्फ़ इतना है कि वो अपनी असफलताओं के बाद जोश, हिम्मत के साथ उठ खड़े हूये ओर हम वो जोश ला नही पाते
                    ” नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा है कि”
                                 ”संसार मे कुछ भी असम्भव नही है”
   अगर इन्सान लक्ष्य बना ले कि मुझे वो पाना है,चाहे जितना भी तूफान आये उसे विचलित नही होना चाहिये
जैसे अर्जुन का लक्ष्य था चिड़िया कि आख मे तिर माँरना,तो उनहे केवल चिड़िया का आख दिखाई दे रहा था,उसी तरह हमे भी अपने लक्ष्य पर फोकस करना चाहिये।
                                                                                                                                          
                                                                   

Add to Google Reader or Homepage

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | cna certification