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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

महाभारत—२--- भ्रष्टाचार का वास्तविक दोषी कौन ? --डा श्याम गुप्त....

                   महाभारत--- भ्रष्टाचार का वास्तविक दोषी कौन ? 

         भ्रष्टाचार ऊपर से आता है’-- “अफ़सर भ्रष्ट हैं”-- ’सब चोर हैं’-- 'व्यवस्था सडगल गयी है-आदमी कैसे जिये?'—'सारा तन्त्र ही भ्रष्टाचारी है-आदमी क्या करे''शासन भ्रष्ट हैनेता भ्रष्ट हैं' —'राजनीति पतित होगयी है' 'सब वोट बैंक की खातिर' — ’सभी भ्रष्ट हैं तो हम क्या करें’--’बडा भ्रष्टाचार है साहब’ ’विना रिश्वत के कोई काम ही नहीं हो्ता’ ---------।
         ये वाक्य, जुमले आजकल खूब कहे, सुने, लिखे, पढे जा रहे हैं प्रत्येक स्तर पर गरीब से गरीब, अमीर से अमीर, अनपढ से विज्ञ तक, ऊपर से नीचे तक जन जन में, सभी की वाणी में, अन्तस में समाये हुए हैं तो आखिर भ्रष्ट है कौन ? कहां छुपा है भ्रष्टाचार ? कहां कैसे उसे ढूंढा जाय ?
         चलिये पहले ढूंढते हैं उसेराजनीति में, नेताओं में पहले शासन-प्रशासन-बाबुओं में तो कुछ-कुछ चलता था पर नेताओं में नहीं, नेताओं का शासनप्रशासन में अधिक वर्चस्व नहीं होता था। अब नेता कोई धरती से बाहरी व्यक्ति--एलियन -तो हैं नहीं, आप-हम में से ही आते हैं नेताओं का वर्चस्व किसने बढायापहले तो आप/ हम ने अपना कार्य कराने के लिये, अपनी सुख-सुविधाओं के लिये, पडौसी को दबाने के लिये, सिफ़ारिस कराना आरम्भ किया अपने घर-दफ़्तर के राज, नेताओं को बताये। उन्हें अपनी महत्ता का ज्ञान हुआ तो काम के बदले सुविधायें लेना प्रारम्भ हुआ, फ़िर शेर के मुंह खून लग गया और पैसे/सुविधाशुल्क/ रिश्वत के लिये काम होना प्रारम्भ होगया फ़िर विधायकों, मन्त्रियों, राजनैतिक पार्टियों में,   -गुण: गुणेषु वर्तते (मीमांसा)  के नियमानुसार-यह भ्रष्टाचार— अपने परिवार, भ्रष्टाचार को उत्तरोत्तर वृद्धि कराता गया
          शासन-प्रशासन-अफ़सरों-बाबुओं पर सबसे अधिक भ्रष्टाचार का आरोप लगता है। वे भी मनुष्य हैं , आप /हम ही हैं ।एक बाबू-अफ़सर अपने दफ़्तर में रिश्वत लेता है और वही अन्य सारे दफ़्तरों में देता है पहले हम/आप अपने बिजली-पानी-घर आदि का बिल कम कराने, झूठे मेडीकल बिल पास करान्र, अन्धे को पास कराने, मकान का गलत नक्शा पास कराने , अच्छी जगह शहर में पोस्टिन्ग कराने ...के लिये सिफ़ारिस, राजनैतिक दबाव ऊपर से पैसे देते हैं..और फ़िर वही शेर के मुंह लगा खून आपका खून चूसता है यही स्थिति चिकित्सा, इन्जीनियरिन्ग, ठेकेदारी,--हर दफ़्तर ,सन्स्थान मे है आप/ हम ही अपनी अनावश्यक मांगों, इच्छाओं के लिये सुविधा-शुल्क देते है फ़िर वही शेर के मुंह खून.....
             मीडिया वाले भी मनुष्य हैं, आप /हम में से आप अपनी छोटी-छोटी, झूठी-सच्ची खबरें, विज्ञापन, प्रशन्सा, व्यर्थ के आलेख, साहित्य( पारिश्रमिक हेतु भी ) अखबार में छपवाने के लिये जान-पहचान, सिफ़ारिफ़ आदि में आसमान के कुलाबे मिलाते हैं फ़िर सुविधा-शुल्क... फ़िर बिना पैसे के कोई विज्ञापन छपता है , आलेख, प्रशन्सा, परिचय जबकि हजारों विज्ञापन आदि चाहे वे सेक्स के हों, या कालगर्लों के फ़ोन नं , देश-समाज विरोधी, अप-संस्कृति  वाहक---सुरा, कन्चन कामिनी के बल पर सब छपते है और अनाचार-अनाचरण से भ्रष्टाचार-चक्र....प्रारम्भ
          साहित्य भी तो आप/हम ही लिखते हैं, कूडा-करकट साहित्य के लेखन-प्रचार-प्रसार के लिये सिफ़ारिस-बल,-धन-बल का प्रयोग, फ़िर अप-साहित्य का प्रचलन और उत्तम साहित्य के अभाव की कमी में भ्रष्ट-आचरणदुराचरण-भ्रष्टाचार का चक्र चलने लगता है। क्योंकि अच्छे साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिये भी वही सिफ़ारिस या धन-बल परम्परा चलने लगती है, और प्रशन्सा, पुरस्कार अनुदान आदि भी भ्रष्टाचार के अन्ग बन जाते हैं।,.... और कला-संसार का क्या कहेंकौन शीला की ज़वानी को देखता/ लूटता है, कौन मुन्नी को बद्नाम करके नचाता है? आप-हम ही कौन कहता है हीरोइन को नन्गा होने के लियेअपना स्वार्थ, पैसे -नाम की चाह ही
         और व्यापार जगत में जो सरकारी नहीं है...कौन नकली वस्तुयें बनाता-बेचता है, कम तौलता है, झूठ बोलता है, सेल्स-टेक्स, इन्कम टेक्स की चोरी करता है आप और हम ही न। और धर्म, मज़हब -में भी तो आप हम ही हैं। अपनी अज्ञानता, लोभ, लालच के वशीभूत हम आप ही अपनी अनावश्यक लालसाओं, इच्छाओं, कामनाओ की पूर्ति-हित न्डितों, मौलवियों,पादरियों के पाखंड, ढोंग के झूठे चन्गुल में फ़ंसते हैं, दूसरों को भी फ़ंसाते हैं एसी झूठी बातों का प्रचार-प्रसार करके; और बड़े-बढे मठों, सोने के भन्डारों भरे मन्दिरों, चमत्कारी बावाओं, मुल्लाओं के अनाचार- भ्रष्टाचार को बढावा देते हैं।
         अर्थातभ्रष्टाचार का वास्तविक दोषी कौन ? समाज, सरकार, शासन, सन्स्थायें , राजनीति, धर्म नहीं अपितु स्वयं आप-हम, जन-जन,है, स्वयं मनुष्य है,उसकी आचरण विहीनता , अमर्यादित कर्म है ये सारे संस्थान तो जड-वस्तु हैं वे स्वयं को नहीं चलाते, वे गुणहीन होते हैं उनका संचालक, कर्ता-धर्ता मनुष्य ही गुण-युक्त जीव है, प्राणी है और उसी के अनाचरण या सदाचरण का सन्स्थानों पर पुनः समाज पर और फ़िर चक्रीय-व्यवस्था द्वारा पुनः मानव अगली पीढी पर पढता है और भ्रष्ट-आचरण भ्रष्टाचार का दुष्चक्र चलने लगता है
           आज मानव ही अनाचरण भ्रष्ट-आचरण युक्त होगया है। भ्रष्टाचार का मूल कारण है हमारे ..अकर्म. भ्रष्ट कर्म, दुष्कर्म भ्रष्ट-आचरणअनाचरण जिन्हें संक्षिप्त में कहा जासकता है---
१-      १-अति भौतिक उन्नति---आवश्यकता से अधिक अनियन्त्रित भौतिक प्रगति..मानवीय लिप्सा को प्रश्रय देती है। मानव यन्त्राश्रित होकर  ’येन-केन प्रकारेण’-सुविधा सुख की प्राप्ति हित भ्रष्ट आचरण अपनाने लगता है। औरआविष्कार आवश्यकता की जननी बनकर उल्टा क्रम चलने लगता है
२-     - मानवीय लिप्सा सुविधाभोगी संस्कृति---विज्ञान, तकनीक, आधुनीकरण के अन्धानुकरण में हर जगह वातानुकूलित संयन्त्र, हर हाथ में अनावश्यक मोबाइल, कम्प्यूटर, लेपटोप,आई-पोड आदि पश्चिम के अन्धानुकरण में धन- शराव, शराव-शबाव का प्रदर्शन अन्धाधुन्ध प्रयोग परिवार तो मोलेक्यूलर होगये परन्तु हर परिवार - चार घर, चार कार, चार एसी, चार लेपटोप वाला होगया
३-      अधिक पैसा-कमाई अधिक मोटी-मोटी पगारशेयर, बचत, विदेशी-कर्ज़, लोन-संस्क्रिति के कारणजितने का भी मिले, जैसे भी मिले, जहां भी मिले- लेलो”  की नीति पनपने से भ्रष्ट-आचरण भ्रष्टाचार को पैर पसारने की अनुमति मिलती है।
४-  १-अकर्म हर आदमी का शेयर में लगे रहना, अनावश्यक  बचत, अधिकाधिक खेल, संगीत, मनोरंजन, फ़ूहड-हास्य, शास्त्र-धर्म-न्रीति के विरोधी प्रहसन, सीरियल, नाटक विदेशी नकलपर नाटक, अन्ग्रेज़ी/ हिन्दुस्तानी अन्ग्रेजों की लिखी, तथाकथित विदेशी पुरस्कार प्राप्त व्यर्थ की बडी-बडी पुस्तकें,---ईश-निन्दा-शास्त्र निन्दा पर अनावश्यक आलेख । प्रायोजित लेखकों, तथाकथित इतिहासकारों, कालम-लेखकों जो सिर्फ़ धन्धे के लिये, पैसे के लिये -–बच्चों, स्त्री, मनोविज्ञान  के नाम पर माता-पिता को सीख आदि द्वारा- आने वाली संतति में अश्रद्धा, अनास्था के बीज डालते हैंऔर सब चलता है-की सीख द्वारा उसे अनाचरण भ्रष्टाचार के मार्ग पर जाने को जाने-अनजाने बढावा देते हैं
५-      ४-अनाचरण-दुराचरणउपरोक्त जीवन प्रणाली का प्रभावी परिणाम, मानवीय दुराचरण होता है और भ्रष्टाचार का मूल कारक बनता है। मनुष्य के भ्रष्टाचार के कारण ही भ्रष्टाचार संस्थागत होने लगता है और समाज में पसारने लगता है ,फिर समेटे नहीं सिमटता |
          इसप्रकार मुझे लगता है कि भ्रष्टाचार हमारे, आपके प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर रचा-बसा है, और हम सब अपने अन्तर में देखकर उसे दूसरों में, सामने वाले मे, समाज, व्यबस्था आदि में ढूंढते फ़िर रहे हैं; और भ्रष्टाचार हमारे मन-मंदिर में लेटा चैन की वंशी वजा रहा है ....
    
  भ्रष्ट जो देखन में चला भ्रष्ट मिलिया कोय
       जो दिल खोजा आपना, मुझसा भ्रष्ट कोय     .....और---

मोकूं कहां  ढूंढे  रे बन्दे ! मैं  तो  तेरे  पास में.
ना मंदिर में ना मस्ज़िद में, ना शासन-सरकार में।
अपने दिल में झांकले बन्दे, ना कुर्सी-इज़लास में
ढूंढतो मुझको अति-सुख-रूपी,अपनी अनबुझ प्यास में॥

          अब इसका समाधान क्या हो ? मूल रूप में समाधान के लिए -विज्ञान की सीमाओं को पहचान कर, विज्ञान व अध्यात्म के समन्वय रूपी सदाचारयुक्त जीवन-प्रणाली से ही मूल्यों का बिखराव रुकेगा | मानव मूल्यों के वैज्ञानिक आधार को समझना होगा| अच्छा सोचने से ही किसी अच्छे कर्म का अपितु सभी कर्मों का प्रारम्भ होता है| अतः विचारक्रान्ति आवश्यक है | परन्तु उसके साथ साथ क्रियात्मक भाव --- जन जागरण व इच्छाशक्ति होना भी आवश्यक है| समान व सदाचरण युक्त अच्छा सोचने वाले व्यक्ति, विज्ञजन मिलकर प्रयत्न करें तो कुछ भी होसकता है|  यही जन लोकपाल बिल व अन्ना हजारे जैसे व्यक्तित्वों की सार्थकता भी है|  यही ऋग्वेद(१०/१९१/१०५२५/४) के  इस अन्तिम व आव्हान मन्त्र का भाव है--
           " समानी व आकूती: समाना ह्रदयानि व: ।
             समामस्तु वो मनो यथा व: सुसहामति ॥" --हे मनुष्यो ! तुम्हारे ह्रदय, मन, भावनायें एक समान हों, ताकि तुम एक जैसे संकल्पों, कार्यों द्वारा संगठित होकर कर्म करो ।

                                        ----डा श्याम गुप्त...२५-४-२०११... 
 


     

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