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शुक्रवार, 10 जून 2011

मेरा मिशन आशा और अनुशासन का मिशन है


http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/05/great-discovery.html

मेरा मिशन आशा और अनुशासन का मिशन है। लोग बेहतरी की आशा में ही अनुशासन भंग करते हैं और जो लोग अनुशासन भंग करने से बचते हैं, वे भी बेहतरी की आशा में ही ऐसा करते हैं। समाज में चोर, कंजूस, कालाबाज़ारी और ड्रग्स का धंधा करने वाले भी पाए जाते हैं और इसी समाज में सच्चे सिपाही, दानी और निःस्वार्थ सेवा करने वाले भी रहते हैं। हरेक अपने काम से उन्नति की आशा करता है। जो ज़ुल्म कर रहा है वह भी अपनी बेहतरी के लिए ही ऐसा कर रहा है और जो ज़ुल्म का विरोध कर रहा है वह भी अपनी और सबकी बेहतरी के लिए ही ऐसा कर रहा है।
ऐसा क्यों है ?
ऐसा इसलिए है कि मनुष्य सोचने और करने के लिए प्राकृतिक रूप से आज़ाद है। वह कुछ भी सोच सकता है और वह कुछ भी कर सकता है। दुनिया में किसी को भी उसके अच्छे-बुरे कामों का पूरा बदला मिलता नहीं है। क़ानून सभी मुजरिमों को उचित सज़ा दे नहीं पाता बल्कि कई बार तो बेक़ुसूर भी सज़ा पा जाते हैं। ये चीज़ें हमारे सामने हैं। हमारे मन में न्याय की आशा भी है और यह सबके मन में है लेकिन यह न्याय मिलेगा कब और देगा कौन और कहां ?
न्याय हमारे स्वभाव की मांग है। इसे पूरा होना ही चाहिए। अगर यह नज़र आने वाली दुनिया में नहीं मिल रहा है तो फिर इसे नज़र से परे कहीं और मिलना ही चाहिए। यह एक तार्किक बात है।
हमें वह काम करना चाहिए जिससे समाज में  ‘न्याय की आशा‘ समाप्त न होने पाए। ऐसी मेरी विनम्र विनती है विशेषकर आप जैसे विद्वानों से।
मान्यताएं कितनी भी अलग क्यों न हों ?
हमें समाज पर पड़ने वाले उनके प्रभावों का आकलन ज़रूर करना चाहिए और देखना चाहिए कि यह मान्यता समाज में आशा और अनुशासन , शांति और संतुलन लाने में कितनी सहायक है ?
इसे अपनाने के बाद हमारे देश और हमारे विश्व के लोगों का जीना आसान होगा या कि दुष्कर ?
इसके बावजूद भी मत-भिन्नता रहे तो भी हमें अपने-अपने निष्कर्ष के अनुसार समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए यथासंभव कोशिश करनी चाहिए और इस काम में दूसरों से आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

गुरुवार, 9 जून 2011

आप अपने दीपक ख़ुद बन जाइये


यह देश धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है तो यहां सबसे बढ़कर शांति होनी चाहिए।
अगर हम विभिन्न मत और संप्रदायों में भी बंट गए हैं और अपने अपने मत और संप्रदाय को सत्य और श्रेष्ठ मानते हैं तो हमें एक ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हुए शांति और परोपकार के प्रयासों में एक दूसरे से बढ़ निकलने के लिए भरपूर कम्प्टीशन करना चाहिए।अपने देश और अपने समाज को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को बचाने का तरीक़ा आज इसके सिवा कोई दूसरा है नहीं। मैं इसी तरीक़े पर चलता हूं और आपको भी इसी तरीक़े पर चलने की सलाह देता हूं।आप अपने दीपक ख़ुद बन जाइये, मार्ग आपके सामने ख़ुद प्रकट हो जाएगा। तब आप चलेंगे तो मंज़िल तक ज़रूर पहुंचेंगे और कोई भी राह से भटकाने वाला आपको भटका नहीं पाएगा। आपकी मुक्ति, आपके ज्ञान और आपके पुरूषार्थ पर ही टिकी है। किसी और को इससे बेहतर बात पता हो तो वह हमें बताए !

बुधवार, 8 जून 2011

शाहरूख़ ख़ान ने बाबा रामदेव जी को जो सलाह दी थी वह ठीक थी कि आदमी वही काम करे जिसे करना वह जानता है Shahrukh Khan


हम बिल्कुल नहीं चाहते कि किसी भी सत्याग्रही को सताया जाए लेकिन हम यह भी नहीं चाहते कि सत्याग्रही पुलिस के जवानों पर गमले आदि फेकें। पुलिस के जवान भी हमारे ही हैं और वे वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश मिलता है। जो नेता आदेश देते हैं वे भी हमारे द्वारा ही चुने हुए होते हैं। यह एक जटिल प्रक्रिया है। इन्हीं नेताओं में से कुछ का रूपया विदेशी बैंकों में जमा है। ये लोग आसानी से यह पैसा देश में लाने वाले नहीं हैं। यह बात हमें पता है तो बाबा रामदेव जी को भी पता होनी चाहिए थी। उन्होंने यह कैसे समझ लिया था कि जैसे ही चार्टर्ड प्लेन से उतर कर मैं अनशन करूंगा, वैसे ही सरकार विदेश से काला धन वापस लाने पर आमादा हो जाएगी ?
यह बाबा का  भोलापन ही था और यह इस वजह से था कि वह इस गंदी राजनीति के हथकंडों को नहीं जानते थे। बाबा ने उस क्षेत्र में क़दम रखा जिस क्षेत्र की क ख ग भी वे नहीं जानते थे और इसी वजह से उन्हें मंच से छलांग लगाकर औरतों बीच छिपना पड़ा। उन्हें लगा कि पुलिस उन्हें मारने के लिए आई है। जबकि ऐसा नहीं होता। कांग्रेस को सबसे ज़्यादा डर बीजेपी के सत्ता में आने से लगता है। बीजेपी के नेता आए दिन अनशन करते रहते हैं और कांग्रेस की भेजी हुई पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करती रहती है और फिर छोड़ देती है। अपने शासन काल में बीजेपी ने यही कांग्रेस के साथ किया। यह एक रूटीन का काम है। आप बताइये कि कांग्रेस ने बीजेपी के और बीजेपी ने कांग्रेस के कितने नेता आज तक मारे हैं ?
एक भी नहीं !
बाबा ने सदा स्वागत सत्कार और जय जयकार ही देखा था। बड़े बड़े आई जी और डीजीपी को अपने चरण छूते ही देखा था।
पुलिस का असली रूप क्या होता है ?
इसे वह जानते ही न थे। इसीलिए उन्होंने हालात का ग़लत अंदाज़ा लगाया और फिर ग़लत ही फ़ैसला लिया और अपनी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिला बैठे।
बाबा को जानना चाहिए कि राजनीति में कोई सांपनाथ है तो कोई नागनाथ। कम यहां कोई भी नहीं है। बाबा राजनीति को इन सांपों और नागों से मुक्त कराना चाहते हैं तो बेशक कराएं लेकिन पहले उन्हें सांप और नाग का फन कुचलने का हुनर सीखना होगा। उसके बिना वह यह काम न कर पाएंगे। हमें बाबा के मक़सद से विरोध नहीं है लेकिन उनके तरीक़े से ज़रूर असहमति है।
अगर कल को कपिल सिब्बल बिना जाने ही लोगों को योगासन कराने लग जाएं तो वे लोगों की जान से खेलने वाले माने जाएंगे। ठीक यही बात बाबा रामदेव जी के बारे में कही जाएगी कि अपने पीछे भीड़ जुटाने मात्र से ही कोई भी आदमी नेता नहीं बन जाता जब तक कि वह अपने अंदर नेतृत्व के गुण विकसित न करे और किसी अनुभवी नेता से राजनीति और कूटनीति का व्यवहारिक ज्ञान हासिल न कर ले। ऐसा किए बिना भीड़ जुटाने वाला आदमी लोगों की जान से खेलने वाला माना जाएगा। इस तरह के काम करने से हालात सुधरने के बजाय और ज़्यादा बिगड़ जाएंगे। हमें अपने देश और समाज में सुधार लाना है न कि दुनिया को अपने ऊपर हंसने का मौक़ा देना है। 4 जून के बाद से लेकर आज तक बाबा ने जो भी किया है उससे सन्यास आश्रम की गरिमा को भी ठेस लगी है और देश की छवि भी ख़राब हुई है।
पुरी के शंकराचार्य जी ने भी बाबा रामदेव को ही इस गड़बड़ी के लिए ज़िम्मेदार माना है।

पुरी के शंकराचार्य बोले, रामदेव हैं ‘कायर’!नई दिल्ली। पुरी के शंकराचार्य स्वामी अधोक्षजानंद तीर्थ ने योगगुरु रामदेव पर कायराना हरकत करने का आरोप लगाते हुए उनकी निंदा की है और कहा कि उन्हें देशवासियों से अपने कृत्य के लिये माफी मांगनी चाहिए।
“रामदेव एक भटके हुए धोखेबाज संन्यासी हैं!” 

शंकराचार्य ने आज यहां बातचीत में कहा कि रामदेव ने जिस तरह अपने अनुयायियों से सरकार से की गई डील को छिपाया और फिर गिरफ्तारी से बचने के लिए महिलाओं के बीच छिपकर तथा उनके वस्त्र पहनकर जो कायराना हरकत की उसके बाद उन्हें भगवा वस्त्र पहनने और क्रान्तिकारियों का नाम लेने का कोई हक नहीं रह जाता।
अब बाबा रामदेव की सम्पत्ति पर सरकार की नजर! 

स्वामी अधोक्षजानंद ने कहा कि रामदेव अब अपने कृत्यों से बेनकाब हो गए हैं तथा अब उन्हें भगवा वस्त्र पुन धारण नहीं करना चाहिए।
उनकी इस हरकत से भगवाधारी साधु-संतों की छवि धूमिल हुई है।
बाबा रामदेव ‘संघ’ का मुखौटा हैं: कांग्रेस 

उन्होंने केन्द्र सरकार से देश भर के आश्रमों की तलाशी लेकर उनमें छिपे देशी-विदेशी गुनहगारों को बाहर निकालने तथा रामदेव के साथी बालकृष्ण पर अविलम्ब सख्त कार्रवाई करने की मांग की।
इस वेबाईट से साभार : http://josh18.in.com/showstory.php?id=1072952
समय ने साबित कर दिया है कि शाहरूख़ ख़ान ने बाबा रामदेव जी को जो सलाह दी थी वह ठीक थी कि आदमी वही काम करे जिसे करना वह जानता है।  

मंगलवार, 7 जून 2011

घूंघट में सन्यासी : भारत के इतिहास में पहली बार, बाबा रामदेव जी का अनोखा 'योग'-दान

Dr . Anwer Jamal With a delegation at Brahmakumari mission

इसमें कोई शक नहीं है कि मंदिरों और मज़ारों पर चढ़ावे में जो धन संपत्ति दान दी जाती है उसे वहाँ के ज़्यादातर व्यवस्थापक लोकसेवा में लगाने के बजाय अपनी ऐशो इशरत में ख़र्च करते हैं और यह सरासर धार्मिक भ्रष्टाचार है । इसे दूर करना भी उतना ही ज़रूरी है जितना कि विदेशों में जमा काले धन का राष्ट्रीयकरण करना।
...और यह काम बाबा रामदेव जी  के बस का है नहीं !

नकारा सरकार ने सोते हुवे निहत्थे लोगों पर लाठी चार्ज कर के जो बर्बर कार्यवाही की उसकी जितनी  निंदा की जाया कम ही है | आधी रात को दिल्ली पुलिस बल ने आक्रमण किया और सत्याग्रहियों को मैदान से बाहर निकाल फेंका ! कितने घायल हुए , कुछ गायब , बाबा रामदेव को सलवार - समीज में छुप कर भागना पडा ! वाह रे सरकार ! ये कैसी नकारा सरकार है  ?

गुरुवार, 2 जून 2011

नग्न देह का दर्द -Dimple maheshwari



ये कहानी है एक औरत की..
हुई थी जो कुछ दिनों पहले
हवस का शिकार॥
ये मुर्दा समाज कहता है...
उसका जीना है बेकार
ढकी है आज पूरे कपड़ों में
फिर भी नग्न नजर आती है॥
ये पुरवाई भी
अब नही सुहाती है ॥
देख खुद को आईने में...
लजाती नहीं ..झल्लाती है॥
किया था वादा ..
उसकी गली डोली ले आने का
अब झांकता तक नहीं उस ओर ॥
कॉलेज में हर साल , इनाम
उसके हाथों में समाते नहीं थे
निष्कासित किया जा चुका है
असर दूसरे बच्चो पर पड़ेगा..कहकर
दो साल से टॉप कर रही थी
ये तीसरा साल किताबों से खेल रही थी ॥
हर रात वह चिल्ला उठती है
मारे डर के सो नहीं पाती है...
माँ भाग कर आती है....
पोंछ उसका पसीना समझाती है
उस डर से बाहर निकालती है
पर क्या निकाल पाती है ??
एक नाकाम कोशिश माँ हर रात करती है॥
पानी डाल तन पर अपने
वह रगडती हैं ज़ोरों से ...
उसे दाग़ नजर आते हैं
अपनी देह पर हर कहीं....
पूरा दम लगा के भी वह मिटा नहीं पाती ॥
सहेली उसकी सुख दुःख की संगी
रास्ता भूल चुकी हैं घर का उसके ॥
माँ संग बाज़ार जाए
तो फब्तियां लाश को
मार डालती हैं फिर से एक बार॥
उसकी नग्न पुकार
नग्न हैं उसकी चीत्कार
नग्न देह का दर्द भी अब नंगा हो चुका है॥
हर अनजान शक्ल में ..
दरिंदा नज़र आता हैं
क्या है ये सब?
हमारी बिगड़ती मानसिकता...
या ख़त्म होती मानवीयता॥
क्या इन दरिंदों के घर
कभी बेटियाँ पैदा नहीं होंगीं  ????
-Dimple maheshwari
साभार


Dimple maheshwari

शनिवार, 28 मई 2011

आप से मित्रवत शेयर कर रहा हूँ - नवीन चंद्र चतुर्वेदी



भाई नवीन चंद्र चतुर्वेदी जी ने हमें जनाब तुफ़ैल चतुर्वेदी जी की शायरी पढ़वाई और हमने उनकी शायरी को ‘मुशायरे‘ में पेश भी किया। इसी सिलसिले में उनकी तरफ़ से एक ईमेल मिली जिसमें कुछ अच्छे शेर लिखे हुए थे। जिस ईमेल में काम की बातें होती हैं, उन्हें मैं डिलीट नहीं करता। सो इसे भी डिलीट नहीं किया और उनके भेजे अशआर को मैं आपके साथ शेयर कर रहा हूं।

अनवर भाई, तीन शेर , आप से मित्रवत शेयर कर रहा हूँ:-

ये माना, ज़िन्दगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी
:- रघुपति सहाय फिराक़ 

न सताइश (प्रशंसा) की तमन्ना, न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी (अर्थ) न सही
:- मिर्ज़ा ग़ालिब

एक ज़माना यह भी था देहात में सुख का
लोग खुले रखते थे घर के सब दरवाज़े 
:- सुरेश चंद्र शौक़

मंगलवार, 24 मई 2011

शबे आख़िर में चाँद अपना जगाइये (अनवर जमाल की उर्दू शायरी)

दिल की दिल को सुनाने के वास्ते
आया है माशूक़ मनाने के वास्ते

ख़ामोशी तबस्सुम कलाम और नख़रे
बहुत हैं दिल लुभाने के रास्ते

शबे आख़िर में चाँद अपना जगाइये
आसमाँ पे दिल के चढ़ाने के वास्ते

अश्क न बहा तू फ़रियाद न कर
इंतज़ार कैसा किसी बेवफ़ा के वास्ते

हमदर्द भी मिलेंगे हर मोड़ पर
हौसला चाहिए हाथ बढ़ाने के वास्ते

शबो रोज़ यूँ गुज़ारता है 'अनवर'
लिखता है कलिमा पढ़ाने के वास्ते

.
.
.
क्यों जी , यह कैसी लगी ?

बुधवार, 18 मई 2011

सोमवार, 16 मई 2011

महंगाई की सूरत में लोकतंत्र की क़ीमत चुका रही है जनता


लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी की क़ीमत अगर महज़ 5 रूपये अदा करनी पड़ रही है तो इसमें क्या बुरा है ?
जनता को लोकतंत्र चाहिए और लोकतंत्र को जनता के चुने हुए प्रतिनिधि चाहिएं। चुनाव के लिए धन चाहिए और धन पाने के लिए पूंजीपति चाहिएं। पूंजीपति को ‘मनी बैक गारंटी‘ चाहिए, जो कि चुनाव में खड़े होने वाले सभी उम्मीदवारों को देनी ही पड़ती है।
देश-विदेश सब जगह यही हाल है। जब अंतर्राष्ट्रीय कारणों से महंगाई बढ़ती है तो उसकी आड़ में एक की जगह पांच रूपये महंगाई बढ़ा दी जाती है और अगर जनता कुछ बोलती है तो कुछ कमी कर दी जाती है और यूं जनता लोकतंत्र की क़ीमत चुकाती है।

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

एक ‘नॉन स्टॉप मुशायरे‘ का सफ़ल आयोजन, सबसे पहले आये जनाब रूपचंदशास्त्री मयंक जी



हिंदी ब्लॉग जगत में पहली बार एक ‘नॉन स्टॉप मुशायरे‘ का सफ़ल आयोजन किया जा रहा है और इसमें हिंदी ब्लॉग जगत की नामवर हस्तियां मंचासीन हैं। जिनमें सबसे पहले आये जनाब रूपचंदशास्त्री मयंक जी, उनके बाद शालिनी कौशिक जी तशरीफ़ लाईं और फिर जनाब कुंवर कुसुमेश जी जलवा अफ़रोज़ हुए। कवि राजेंद्र ‘तेला‘ जी भी आपको यहां मिलेंगे और ब्राह्मण पुत्री शिखा कौशिक जी भी अपनी रचनाओं के क़ीमती मोती यहां लुटा रही हैं। इन सभी के साथ यह बंदा भी आपको दिखेगा और एक ऐसा नाम भी आपको यहां दिखेगा जो पहली बार किसी साझा ब्लॉग में शामिल हुआ है। यह नाम है बहन ‘शन्नो जी‘ का। शन्नो जी फ़ेसबुक की एक मशहूर हस्ती हैं। उनकी काव्य रचनाएं अक्सर आपकी नज़र से गुज़रती रहती हैं। इसी के साथ लगातार स्थापित स्तरीय और उदीयमान, हर वर्ग के शायर और कवि रोज़ाना इस मंच पर स्थान ले रहे हैं। हरेक कवि और शायर का हम तहे-दिल से इस्तक़बाल करते हैं। 
आप भी इस ‘नॉन स्टॉप‘ मुशायरे में आमंत्रित हैं। आप अगर एक कवि या शायर हैं और आप भी इस मुशायरे में अपनी रचना पेश करना चाहते हैं तो अपनी ईमेल आईडी भेज दीजिए इस पते पर 
eshvani @gmail .com
एक सामईन अर्थात श्रोता के तौर पर तो बहरहाल आप सदा सादर आमंत्रित हैं ही। आपके सुझावों का भी स्वागत है। अगर आप अपने कमेंट के साथ कोई शेर या काव्य पंक्तियां भी दिया करें तो उससे मुशायरे में चार चांद लग जाएंगे।
...तो जनाब तशरीफ़ लायें, आने के लिए दरवाज़ा यह रहा : http://mushayera.blogspot.com/

सोमवार, 14 मार्च 2011

जब कभी इंसानी शराफत से मेरा यकीन हिला तो उसे बहनों के सच्चे कमेंट्स ने ही बहाल किया है




मैंने हिंदी ब्लॉग जगत को अपनी ज़िन्दगी का बेहतरीन एक साल दिया. इसे कुछ नए ब्लॉग ऐसे दिए जो उन विषयों पर पहले नहीं थे . लोगों ने भी मुझे अपना भरपूर प्यार दिया और यह प्यार उन्होंने मुझे उस हाल में दिया जबकि मैंने उनकी मान्यताओं की धज्जियाँ उड़कर रख दीं . यह ठीक है कि मैंने ऐसा इसलिए किया की मैं उन्हें ग़लत मानता हूँ लेकिन ऐसा मेरा मानना है, न कि हरेक का. इस सब के बीच मुझे सभी ब्लॉगर्स ने अपने दिल में बिठाया . जो लोग मुझसे नफरत करते हैं , वास्तव में वे भी मुझे अपने दिल में जगह दिए हुए हैं . मैं उनकी भी क़द्र करता हूँ और उनसे भी प्यार ही करता हूँ . मैं एक जज़्बाती आदमी हूँ . ईश्वर और धर्म मेरे लिए पराये नहीं हैं. मैं धर्ममय हूँ , ईश्वरमय हूँ. जो इन्हें बुरा कहता है , वह मुझे बुरा कहता है . इसीलिये मुझसे बर्दाश्त नहीं होता . मैं अपनी हद तक विरोध करता हूँ .
लगातार बहुत सा वक़्त नेट पर देने की वजह से बच्चे मैथ में कम नंबर लेन लगे जबकि वे ९९ प्रतिशत लाया करते थे . मेरी आँखों में से भी पानी बहने लगा है . मैंने BIGPOND की जो नई डिवाइस ली है नेट के लिए उसकी सेटिंग में भी कुछ मुश्किल आ रही है. इस मुद्दत के दरमियान मेरे रूहानी मुराक़बों (सूफी साधना) में कमी आई है . मेरे पीर साहब का इन्तेक़ाल कुछ साल पहले हो चुका है और मैं अपने एक गुरुभाई की निगरानी में साधना कर रहा था कि नेट कि दुनिया में दाखिल हो गया और मेरी साधना को विराम लग गया . अब मैं कुछ समय जैतून के तेल में अंडे तलकर खाना चाहता हूँ , लेकिन सॉरी ताली हुई चीज़ें मैं खाता नहीं. खैर ताक़त के लिए आंवला और शहद जैसी चीज़ें भी काम देंगी . इस दरमियान मैं अपने आमाल का जायज़ा लूँगा कि कहीं खुदा की नज़र में मैं खुद ही तो मुजरिम नहीं ?

japan tsunami 2011

जो लोग मेरी मौजूदगी की वजह से कुछ परेशान थे उन्हें भी राहत मिलेगी और मिलनी भी चाहिए . चाहता तो मैं यही हूँ कि कुछ दिन नेट से पूरी तरह छुट्टी लेकर मुकम्मल आराम करूं लेकिन जो साझा ब्लॉग मैंने बनाये हैं उनसे जुड़े लोगों की सुविधा की ख़ातिर मैं पूरी तरह से चाहकर भी हट नहीं सकता. लेकिन इसके बावजूद ज़िन्दगी के जिन पहलुओं पर मेरा ध्यान कम हो गया है उन्हें मैं भरपूर तवज्जो देना मेरे लिए निहायत ज़रूरी है . सभी भाईयों और बहनों से मैं माफ़ी की दरख्वास्त करता हूँ और यह विनती भी कि   सभी भाई-बहन यह ज़रूर सोचें कि क्या वे वही काम कर रहे हैं जो कि करने के लिए उन्हें मालिक ने इस प्यारी धाती पर पैदा किया है ?

एक दिन वह इसका हिस्साब ज़रूर लेगा , इसका ध्यान रहे . हर समय उस मालिक को आप अपना साक्षी समझें क्योंकि वास्तव में वह हर समय आपके कर्मों को देख रहा है और अंत में वह आपको दंड या पुरस्कार अवश्य देगा . जापान का ज़लज़ला इसकी मिसाल है .

जाते जाते मैंने अपनी एक ताज़ा पोस्ट
http://paricharcha-rashmiprabha.blogspot.com/2011/03/blog-post_14.html
पर नज़र डाली तो बहन सोनल रस्तौगी जी के कमेन्ट पर नज़र पड़ी जोकि ईमानदारी  से भरा हुआ है . नेट जगत में ज़्यादातर  बहनें  गुटबंदी और नफरत से बहुत दूर हैं . मैं बहनों का शुक्रगुजार ख़ास तौर पर हूँ . जब कभी इंसानी शराफत से मेरा यकीन हिला तो उसे बहनों के सच्चे कमेंट्स ने ही बहाल किया है . मैं कुछ काम अधूरे छोड़े जा रहा हूँ जिनमें से एक यह नज़्म भी है :
'माँ' The mother
मैं इसे पूरा ज़रूर करूँगा , इंशा अल्लाह .
और इसे भी ...
औरत की हक़ीक़त
http://www.auratkihaqiqat.blogspot.com/

खुदा हाफिज़ , ॐ शांति ,

INTERMISSION

ब्लॉगोत्सव की हक़ीक़त

क्रिकेट के विश्व कप आयोजन के संदर्भ में :
हार जीत तो चलती ही रहती है , उसकी कोई बहुत ज्यादा अहमियत नहीं है । अहमियत है कारोबार की , धंधे , मुनाफे और प्रचार की जो कि उत्पादों को मिलता है खेलों के जरिए और इसीलिए कंपनियाँ खेल प्रतियोगिताओं को स्पॉन्सर करती हैं और अब इसी हेतु ब्लॉगोत्सव का आयोजन भी कोई कंपनी कर रही है ताकि बाँटने वाले रेवड़ियाँ बाँट सकें उन्हें जिन्हें वे अपना समझते हैं।

रविवार, 6 मार्च 2011

प्रेम , ममता और त्याग हिस्सा हैं नारी के वुजूद का

नारी मन में बहुत से सवाल उठते हैं और हरेक दिल उसे अपने अंदाज़ में बयान करता है. मैंने यह बयान किया है एक पोस्ट 'जीने दो सिर्फ़ एक नारी बन कर' पर :

प्रेम , ममता और त्याग
बैसाखियाँ नहीं हैं
हिस्सा हैं तुम्हारे वुजूद का
गर ये नहीं तो तुम नहीं

आत्महत्या न करो
मुक्ति के नाम पर
नारी होकर जीना है तो
बस काफ़ी है
ख़ुद की पहचान
http://sharmakailashc.blogspot.com/2011/03/blog-post_06.html

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

आप भी इसी तरह अपनी अपनी पोस्ट्स का खुलकर यहाँ प्रचार कर सकते हैं. Ad. sense

अब मैंने हमारी वाणी के बोर्ड पर नज़र डाली तो ३१ विजिटर्स दिखाते हुए सबसे ऊपर दो ब्लाग्स कि पोस्ट्स नज़र आ रही हैं.
१- कुछ अच्छे  ब्लाग्स , मेरी नज़र से - ब्लाग सूची
२- अपनी तारीफ़ सुनना सभी को अच्छा लगता है
जिन साहिबान के ब्लाग्स की ये दो पोस्ट्स हैं वे सामने आकर बताएं कि उनके ब्लाग्स के पते क्या हैं ?
अभी ब्लाग जगत के पहले समाचार पत्र  कि शुरुआत है . कुछ हाथ उनको भी तो बंटाना चाहिए जिनके ब्लाग का यहाँ प्रचार हो रहा है .
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/03/century.html
इसी के साथ मैं चाहता हूँ कि हमारी वाणी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाली दस पोस्ट्स की जानकारी रोजाना दी जाये . जो इस ज़िम्मेदारी  को निभा सके वह सामने आये और पहली बार कुछ अद्भुत करने का गौरव पाए जिसे कि सारा ब्लाग जगत देखेगा .
आप भी इसी तरह अपनी अपनी पोस्ट्स का खुलकर यहाँ प्रचार कर सकते हैं.
कृपया यहाँ कविता और लेख की चंद लाइनें देकर उनका लिंक दे दिया कीजिये ताकि पाठक उन्हें आपके या सम्बंधित ब्लागर्स के ब्लाग पर ही  जाकर पढ़े . इस तरह हम हिन्दी ब्लागर्स की कुछ भी सेवा कर सके तो हम कामयाब माने जायेंगे .
आइये अपना हाथ बढिए .
जो लोग सदस्य बन चुके हैं वे तुरंत अपनी सेवाएँ देना शुरू कर दें.
ऐसी हमारी विनती है .
आजकल शतक का टाइम चल रहा है .
'हिंदी ब्लागर्स फोरम इंटरनेश्नल' का शतक पूरा हो चूका है और उसमें १०३ पोस्ट्स नज़र आ रही हैं .
एकता में शक्ति   के कारण ही हिंदी ब्लागर्स ने इतने कम समय में ऐसा प्रशंसनीय काम कर दिखाया है , सचमुच काबिले मुबारकबाद है पूरा समूह.

इस जैसी कोई दूसरी फोरम हिंदी ब्लाग जगत में नहीं है जहाँ कि वे लोग भी मेंबर बने  हुए हैं जो कि इस फोरम के संस्थापक के नज़रिए का घोर विरोध करते हैं .
अभिव्यक्ति कि आजादी कि रक्षा का ऐसा बेनज़ीर उदाहरण कम ही मिलता है . ब्लागिंग में अपनी कहो और फिर दुसरे की सुनो . दूसरा आपकी माने या न माने लेकिन आप अपनी ग़लत बात ज़रूर छोड़ दें अगर आपकी आत्मा जान ले कि हाँ यह बात ग़लत है. फिर इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आपको ग़लती  कि सूचना देने वाला आपका मित्र है या विरोधी ?
अगर आप का पैर अंधेरे में किसी में होल में पड़ने वाला है तो आपको इसकी सूचना जो भी देता है , इस पर ध्यान देने में ही भलाई है .
सही बात कोई भी बताये उसे मान लेना चाहिए .
इस फोरम पर फिलहाल एक साथ कई मुद्दों पर बात चल रही है . आप भी देखें कि किस की बात सही है ?
http://hbfint.blogspot.com/2011/03/blog-post_3139.html 

यहां निर्णायक मंडल के जजों में अभी भी क़लम की तलवारें खिंची हुईं हैं और शब्द के बाणों की बौछार भी वे कर ही रहे हैं लेकिन फिर भी दूसरों का फ़ैसला ये करेंगे ? The big game

परिकल्पना के चर्चे भी प्रिंट मीडिया में हैं और हरिभूमि दैनिक में भी कई ब्लागर्स के लेख मौजूद हैं।

‘ब्लाग की खबरें‘ के स्टाफ़ में अब हो गए हैं 14 वर्चुअल जर्नलिस्ट।

अमन का पैग़ाम ने 50 लेखकों के लेख पेश करके गोल्डन जुबली मनाई।

आल इंडिया ब्लागर्स एसोसिएशन पर शालिनी जी का एक बहुत ही अच्छा लेख आज देखने में आया है जिसमें उन्होंने ऐसी दाईयों के बारे में जानकारी दी है जो कि जन्म होने के बाद देखती हैं कि लड़की है या लड़का और अगर लड़की पैदा होती है तो वह लड़की की गर्दन मरोड़कर उसे कूड़े में दबा देती है और वसूलती है अपना ‘मेहनताना‘।

इस तरह की बहुत सी खबरें आज ऐसी हैं जिन्हें कि आपकी जानकारी में होना चाहिए।

अखिल ब्रह्मांड ब्लागर्स संगठन का गठन हुआ।

एक खबर यह भी है कि अखिल ब्रह्मांड ब्लागर्स संगठन के गठन की बधाई देने हम गए तो हमारा कमेंट ही भाई लोगों ने मिटा दिया.
लेकिन इसके बावजूद वहां आप शिखा वार्ष्णेय जी की गर्मी में खींची गई फ़ोटो देखकर समझ जाएंगे कि अब होली आने ही वाली है। वहां आप एक घोड़ा भी देखेंगे और उसके साथ दो ब्लागर्स भी मौजूद हैं।

नहीं, नहीं , कोई अश्वमेध यज्ञ नहीं होने वाला है भाई। अब न कोई राजा है और न ही ऐसी रानियां हैं जो अश्वमेध यज्ञ को झेल सकें।

बस ऐसे ही बैठे ठाले का एक ब्लाग तफ़रीह के लिए बना लिया है जिसमें रामगढ़ के ठाकुर से लेकर उड़न तश्तरी तक है।

चालीस के लगभग कमेंट भी पहली पोस्ट पर आ चुके हैं। हालांकि अब न तो ब्लागवाणी है और न ही चिठ्ठाजगत है लेकिन भाई लोगों को टिप्पणी लेने और देने की ऐसी लत पड़ चुकी है कि टिप्पणी ज़रूर करेंगे।

इंदुपुरी जी को इस संगठन का सचिव चुना गया है और सच बात तो यह है कि अध्यक्ष और सचिव साहिबा ने आपस में जो वार्तालाप किया है उससे पता चलता है कि औरतों में ‘सेंस आफ़ ह्यूमर एंड विट‘ कितने ग़ज़ब का होता है ?






shikha varshney said...
अब इस ठाकुर को अध्यक्ष बना ही दिया गया है तो ये अपने दोनों लूले हाथों को जोड़कर प्रवक्ता जय,वीरू से गुजारिश करता है कि गब्बर ( इन्दुपुरी जी ) के संरक्षण में इस संगठन का कार्य आरम्भ किया जाये और सभी रामगढ (हिंदी ब्लॉग जगत )वासियों से विनर्म निवेदन है कि इस शुभ कार्य मे हाथ बटायें.इस होली पर इस रामगढ में एक और हिट शोले बनाने में अपना योगदान दें.. बहुत बहुत धन्यबाद आप सबका.

2 March 2011 15:31



इंदु पुरी गोस्वामी said...
@शिखा वार्ष्णय हा हा हा मुझे गब्बरसिंह बना दिया? दुष्ट! इस बार तो फिर गब्बर नाचेगा होली पर और.....बसंती देखेगी.पर....कांच की गिलास,बोतल्स तोड़ कर फैंकना मना है.गब्बर मधुमेह रोगी है.पैर में कांच लग गया तो रामगढ़ का क्या होगा? हा हा हा पर अच्छा लगा आपका ये अंदाज़ मुझे. प्यार

2 March 2011 16:40



shikha varshney said...
अरे इंदु जी ! आपके जैसे प्यारे गब्बर के रहते यहाँ किसी और की जुर्रत जो ये रूतबा संभाले???अब तो ये शोले आपके ही कन्धों पर टिकी है.हमें तो वैसे भी गोपनीयता की शपथ खिला दी गई है :) :). प्यार के लिए आभार :)

2 March 2011 17:02

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भारतीय ब्लाग लेखक मंच ने भी एक लेखन प्रतियोगिता का आयोजन करते हुए ऐसे ईनाम देने की घोषणा की है जो कि आज तक ब्लाग जगत में नहीं बांटे गए होंगे। प्रेम विषय दिया है तो ईनाम में वे ऐसा क्या देंगे ?


यह समय ही बताएगा। उसके निर्णायक मंडल में डा. श्याम गुप्ता जी, रेखा श्रीवास्तव जी और निर्मला कपिला जी के साथ एक निर्णायक मैं भी हूं।

अरे भाई ! अभी तो खुद मेरा ही निर्णय ब्लाग जगत नहीं कर पाया तो मैं ब्लागर्स का निर्णय कैसे दे पाऊंगा ?

इस प्रतियोगिता का नाम उन्होंने महाभारत दिया है तो शायद इसकी एक वजह यह है कि एलबीए पर भाई हरीश जी खुद मेरे साथ महाभारत का लुत्फ़ ले चुके हैं और आदरणीय भाई डा. श्याम गुप्ता जी तो अभी तक मेरे सामने मैदान में डटे हुए हैं ‘हिंदी ब्लागर्स फ़ोरम इंटरनेशनल‘ पर। यहां निर्णायक मंडल के जजों में अभी भी क़लम की तलवारें खिंची हुईं हैं और शब्द के बाणों की बौछार भी वे कर ही रहे हैं लेकिन फिर भी दूसरों का फ़ैसला ये करेंगे ?

इसी का नाम है नियति।

वैसे महाभारत का फ़ैसला करना भी उन्हीं को चाहिए जो कि महाभारत का प्रैक्टिकली एक्सपीरिएंस रखते हों। ऐसे में मेरा चुनाव कुछ ग़लत भी नहीं है।

क्यों ?

और सबसे आखिर में

आज हमारी वाणी की सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली पोस्ट्स में सबसे ऊपर हमारा वही कमेंट है जिसे एबीबीएस के मालिक ने मिटाने की नाकाम कोशिश की क्योंकि हमने उसे कमेंट गार्डन पर पब्लिश कर दिया। आप भी ऐसा कर सकते हैं बल्कि आप सभी के पास एक एक कमेंट गार्डन होना चाहिए जहां पर आप अपने सब न सही लेकिन कुछ ख़ास कमेंट्स ज़रूर सुरक्षित रख सकें। तब कोई भी आपके कमेंट को मिटाते हुए सौ बार सोचेगा कि यहां से अगर मिटा दिया तो फिर भी कमेंट देने वाले का विचार ब्लागर्स तक पहुंचकर ही रहेगा। ब्लागिंग में किसी के नज़रिये को दबाना मुमकिन ही नहीं है। आज की घटना ने यह एक बार फिर साबित कर दिया है।

अब कुछ बातें अपने सहकर्माी वर्चुअल पत्रकारों से

जो रिपोर्ट आपने पढ़ी आप इसी पैटर्न पर ब्लाग जगत की घटनाओं की रिपोर्टिंग करें। इसमें आप किसी ब्लागर का इंटरव्यू भी ले सकते हैं। आप खुद अपने ब्लाग जगत के अनुभव भी शेयर कर सकते हैं। किसी तकनीकी समस्या को भी आप सामने ला सकते हैं और यदि कोई समस्या आपको परेशान कर रही थी और आपने उसे दूर किया है तो उसे भी सबके सामने ला सकते हैं। जो कुछ भी आप करें, उसका ताल्लुक़ ब्लाग जगत से होना चाहिए। हमें ब्लागर्स के सामने ब्लाग जगत की वे घटनाएं लानी हैं जो कि आम तौर पर सबके सामने नहीं आ पातीं। सभी लोग एक परिवार हैं तो सभी को एक दूसरे की राहत और मुसीबत का इल्म रहना बहुत ज़रूरी है।

सूचना एक शक्ति है। आप ब्लाग जगत की घटनाओं को मामूली हरगिज़ न समझें। हुकूमत से बेदखल करने तक की ताक़त रखती हैं वे सूचनाएं जो इंटरनेट के माध्यम से फैलती हैं। इसीलिए ज़रूरी है कि अफ़वाहों को रोकने के लिए सच्चाई सबके सामने लाई जाए।
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/03/mahabharat-on-blog.html

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

अगर आपने मेरी बात मान ली तो दुसरे मठाधीशों को भी अपनी कुर्सी से खिसकने के लिए मजबूर करेगा आपका भाई Anwer Jamal

मैं किसी वाद में विश्वास नहीं रखता लेकिन फिर भी अगर किसी वाद के साथ मेरा नाम जोड़ा जाये तो मुझे नारीवादी कहा जा सकता है .
जहाँ भी कोई संस्था होगी वहां संगठन ज़रूर होगा और कोई न कोई उसका प्रमुख भी होगा ही होगा.
UBA एक ऐसा संगठन है जहां विचारवान जमा हैं . जो बात मैंने LBA के संयोजक महोदय से कही थी वही बात मैं यहाँ भी कहना चाहूँगा कि
इस संगठन का प्रमुख किसी भी गंभीर महिला ब्लागर को बनाया जाये . इसके अलावा भी दुसरे अहम पद पर बहनों को नियुक्त किया जाये .
मर्द हमेशा से अपनी चौधराहट चलता आया है औरत पर . यहाँ ब्लाग जगत में भी अनवर जमाल यही देख रहा है और वह चाहता है कि मर्द अपनी मर्जी से औरत को अपने बराबर ही नहीं बल्कि अपने ऊंचा पद सौंपना सीख ले ,
औरत को आदर देना सीख ले . हिंदी ब्लागर्स फोरम इंटरनेश्नल की  मुख्य निरीक्षिका के पद पर मोहतरमा रश्मि प्रभा जी को नियुक्त किये जाने के पीछे मेरा यही इरादा है .
मुख्य पद मुख्य सम्मान रखता है . खुद को पीछे हटाकर औरत को मुख्य पद पर बैठाइए. वह ज़रूर अपनी पूरी क्षमताओं का प्रयोग करेगी और आपकी उम्मीद से बेहतर रिज़ल्ट देगी .
आज देश में हर जगह औरत का प्रदर्शन मर्द से बेहतर है.
बेहतर को बेहतर जगह सौंपिए मेरी तरह क्योंकि दूसरों को नसीहत देने से पहले मैं खुद यह नेकी कर चुका हूँ .
उम्मीद है कि आप मेरी बात पर उचित ध्यान देंगे.
अगर आपने मेरी बात मान ली तो दुसरे मठाधीशों को भी अपनी कुर्सी से खिसकने के लिए मजबूर करेगा आपका भाई अनवर जमाल, लेकिन पहले उसकी खुद उसके घर में तो सुनी जाए.
धन्यवाद.

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

ईमान की ताक़त परमाणु बम की ताक़त से ज़्यादा होती है The power of Iman

ईमानदारी की मिसाल
अमेरिका। ईमानदारी की यह मिसाल अमेरिका में क़ायम हुई है। न्यूयॉर्क के जॉन जेम्स टैक्सी में क़रीब एक लाख डॉलर के गहने और कैश भूल गए थे। उन्होंने सोचा कि वे अब अपना माल कभी प्राप्त नहीं कर पाएंगे। फिर भी टैक्सी ड्राइवर की ईमानदारी की बदौलत उन्हें उनका माल वापस मिल गया है।
न्यूयॉर्क के 42 वर्षीय टैक्सी ड्राइवर जूबिरा जालोह ने जेम्स को नेशनल आर्ट्स क्लब पर छोड़ा था। जेम्स अपना बैग टैक्सी में ही भूल गए। अगली सवारी को बैठाते समय जूबिरा की नज़र बैग पर पड़ी और वे उसे संभालकर घर ले गए। घर में उन्होंने अपनी पत्नी को क़िस्सा बताया और बच्चों की पहुंच से दूर बैग को अलमारी में रख दिया।
बैग में जेम्स का कुछ मशहूर लोगों के साथ फ़ोटो भी था। इसलिए उन्हें भरोसा था कि नेशनल आर्ट्स क्लब और न्यूयॉर्क टैक्सी कमीशन की मदद से वे जेम्स को तलाश लेंगे। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मैं मुसलमान हूं और अमानत में ख़यानत करना मेरे ईमान के खि़लाफ़ है। इस्लाम के अनुसार यह दूसरे इंसान के मांस खाने जैसा है। उन्होंने जेम्स को तलाशा और उनका सामान लौटाया। जूबिरा को एक हज़ार डॉलर का ईनाम दिया गया, जो उन्होंने स्वीकार किया। उन्हें वैलेंटाइन डे पार्टी में शामिल होने का क्लब ने न्योता दिया, जो उन्होंने अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इस मौक़े पर वहां शराब परोसी जाती है और मदिरा सेवन उनके उसूलों के खि़लाफ़ है।
कल्पतरू एक्सप्रेस, मथुरा, दिनांक 19 फ़रवरी 2011, पृ. 15
इस्लाम की तालीम को सही तौर पर समझा जाए तो समाज में ईमानदार लोग वुजूद में आते हैं जिनकी ज़रूरत हरेक ज़माने में हरेक इलाक़े के लोगों को रही है और जो चीज़ ज़माने की ज़रूरत होती है उसे ज़माने की कोई ताक़त कभी मिटा नहीं सकती। मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने कुरआन को समझें , पैग़ग्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. की ज़िंदगी को आदर्श और कसौटी बनाकर खुद को जांचें और निखारें। तब उनकी ज़िदगी निखरती और संवरती चली जाएगी, उनकी ज़िंदगी खुद उनके लिए भी आसान हो जाएगी और वे दूसरों के लिए भी नफ़ा पहंचाने वाले बन जाएंगे। मुसलमान होने के लिए इतना काफ़ी नहीं है कि उनसे किसी को नुक्सान न पहुंचे बल्कि लाज़िमी है कि उनके संपर्क में आने वालों को उनसे नफ़ा भी पहुंचे। यह एक अच्छी ख़बर है और उस देश से आई है जहां राजनैतिक खुदग़र्ज़ियों की ख़ातिर इस्लाम को बदनाम करने और मुसलमानों पर डेज़ी कटर जैसे छोटे परमाणु बम छोड़ने वालों का राज है लेकिन ईमान की ताक़त परमाणु बम की ताक़त से ज़्यादा होती है। वह समय क़रीब है कि जब अमेरिका के प्रपंच का बेअसर हो चुका होगा और लोग जान लेंगे कि ईमानदारी और सच्चरित्रता के लिए अपने पालनहार की सृष्टि योजना को जानना बेहद ज़रूरी है जो कि आज ठीक तरह से कुरआन के अलावा कहीं भी मौजूद नहीं है।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

कोई भी आदमी खुद को आखि़र क्यों सुधारे ? Think about it .

नर हो या नारी, वह स्वकेंद्रित होता है। वह अपने अनुभवों से सीखता है और हर चीज़ को अपने उन्हीं अनुभवों की रौशनी में देखता है जो कि उसके अवचेतन मन में बैठ चुके होते हैं। जो अपने अवचेतन मन की वृत्तियों का विश्लेषण करके उसके नकारात्मक पक्ष से खुद को मुक्त कर लेते हैं, वे सत्पुरूष और सूफ़ी-संत कहलाते हैं। वास्तव में समाज के सच्चे सुधारक भी यही होते हैं। अपना जायज़ा लेने का, निष्पक्ष होकर उसपर विचार करने और लेने का और फिर समाज को सुधारने के लिए सद्-विचारों के प्रसार का काम आसान नहीं होता। अक्सर लोग दौलत-शोहरत और इज़्ज़त को ही सब कुछ मानते हैं। इन चीज़ों को पाने का नाम कामयाबी और इन चीज़ों को न पा सकने का नाम नाकामी समझा जाता है। ऐसे लोगों की नज़र में अपना जायज़ा लेना, खुद को और समाज को सुधारने की कोशिश करना सरासर घाटे का सौदा है। इस कोशिश में दौलत-शोहरत और इज़्ज़त तो मिलती नहीं है, उल्टे पहले से जो कुछ कमा रखा होता है। वह भी सब चला जाता है और समाज की अक्सरियत दुश्मन अलग से हो जाती है। एक सुधारक के रहन-सहन का स्टैंडर्ड इतना नीचे पहुंच जाता है कि न तो वह अपने बच्चों को शहर के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ा सकता है और न ही शहर के सबसे ज़्यादा तालीमयाफ़्ता लड़के से अपनी लड़की ही ब्याह पाता है। सुधारक अपने लिए भी ग़रीबी को दावत देता है और अपने बच्चों के लिए भी चाहे वह उसूलपसंद जीवन साथी भले ही ढूंढ ले लेकिन प्रायः होते वे ग़रीब ही हैं।
ग़रीबी कष्ट लाती है, दुख देती है और इंसान सदा से जिस चीज़ से डरता आया है, वह एकमात्र दुख ही तो है। जो दुख उठाने के लिए तैयार नहीं है, वह न तो कभी खुद ही सुधर सकता है और न ही कभी अपने समाज को सुधारने के लिए ही कुछ कर सकता है।
आज समाज में हर तरफ़ बिगाड़ आम है। आम लोग इस बिगाड़ का ठीकरा अपने समाज के ख़ास लोगों पर फोड़कर यह समझते हैं कि अगर हमारे नेता, पूंजीपति और नौकरशाह सुधर जाएं तो फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। वे चाहते हैं कि दूसरे सुधर जाएं और हमारे नेता, पूंजीपति और नौकरशाह खुद भी देश की जनता से यही उम्मीद पाले बैठे हैं कि जनता सुधर जाए तो देश सुधर जाए और सुधरने से हरेक डरता है क्योंकि सभी इस बात को जानते हैं कि सुधरने की कोशिश ग़रीबी, दुख और ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं देगी।
तब कोई भी आदमी खुद को आखि़र क्यों सुधारे ?

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