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सोमवार, 13 जून 2011

बाबा रामदेव के नाम पर हो-हल्ला क्यों...?

बहुत पहले मैं टीवी पर बाबा रामदेव जी का योग शिविर देख रहा था, बाबा के इस शिविर का सञ्चालन विदेश में हो रहा था. उस दौरान जब योग शिविर की समाप्ति हुयी तो वहा पर गाना बजने लगा " मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरा मोती, मेरे देश की धरती" " यह देश है वीर जवानों का" इस देश भक्ति गीत के साथ लोग भारत का तिरंगा लहरा रहे थे और झूम रहे थे, मजेदार बात यह थी की उस दौरान विदेशी भी झूम रहे थे. बहुत मनभावन लग रहा था यह दृश्य. उस दृश्य ने हमें स्वामी विबेकानंद की याद दी. जिन्होंने अम्रेरिका में जाकर देश का नाम बुलंद  किया. मैं देखता आ रहा हूँ बाबा अपना योग शिविर चाहे भारत में करें या विदेश में उन्होंने हमेशा देश भक्ति की बात ही की है. वे अपने योग शिविरों में हमेशा भ्रष्टाचार और काले धन के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की है. बाबा चाहते तो वे सर्कार की हां में हां मिलाकर हमेशा सभी के चहेते बने रहते पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने हमेशा राष्ट्रभक्ति और देश प्रेम की बात की. चाहे हिन्दू हो या मुसलमान सभी उनके समर्थक रहे. पर पिछले दिनों परिस्तिथियाँ  बदली  जब उन्होंने भ्रष्टाचार और काले धन जैसे मुद्दे को लेकर दिल्ली में आमरण अनशन किया. 
देखा जाता है की बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी भ्रष्ट लोंगो के कुचक्र में फंस जाता है. बाबा भी फंसे, राजनीती के गंदे खेल से वाकिफ होने के बावजूद वे भ्रष्ट राजनीतिज्ञों  की चाल में फंस गए. पहली भूल उनसे तब हुयी जब उन्होंने मंत्रियों को पत्र लिखकर दे दिया. यह बात बाबा अनशन की शुरुआत में अपने समर्थको को बता देते तो सरकार की सारी चालाकी धरी की धरी रह जाती, पर उन्होंने विश्वास में खता खायी. बाबा यही पर मत खा गए और लोंगो को बोलने का मौका दे दिया. पर हमें विचार करना होगा की वे टक्कर किस से ले रहे थे, इस देश की भ्रष्ट सरकार से जो बाबा के आन्दोलन से डरी हुयी थी. और लोंगो को बोलने का मौका दे दिया, उन लोंगो को जिन्हें किसी की अच्छाईयाँ दिखाई नहीं देती बल्कि उन्हें बुराईयों को खोजने की आदत है. 
उस से पहले हमें यह सोचना होगा की बाबा का आन्दोलन किस के लिए था. आज देश की जो दुर्दशा है वह किसी से छुपी नहीं है. आज विश्व में हमारा देश भ्रष्टाचार दूसरे नंबर पर है. और उसी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालो पर सरकार लाठी चार्ज करवा रही है. अपनी जान बचाने के लिए बाबा ने वाही किया जो उन्हें उचित लगा, उनका हम सभी के बीच रहना जरुरी है. आज कितने लोग हैं जो इस मुद्दे पर आवाज़ बुलंद कर रहे है. हो सकता है सरकार भगदड़ दिखाकर बाबा को जान से मरने की योजना बना चुकी थी और इसीलिए रात को उस समय यह कदम उठाया जब दूर दराज़ से आये लोग सो रहे थे. वास्तव में यह कांड जलियाँ वाला बाग से कमतर नहीं था. हमें सोचना होगा की इस देश को आज़ाद करने वाले क्रांतिकारियों को अपनी जान बचाने के लिए कई बार भागना पड़ा था. यह कायरता नहीं थी. पर जिन्हें इस देश से प्यार नहीं है उन्हें कमियां ही दिखाई देंगी. उन्हें कोई ठग कह रहा है तो कोई भगोड़ा. इससे बड़ी गन्दी मानसिकता हमारी क्या हो सकती है. 
इस देश में चाहे क्रन्तिकारी हो हो या महापुरुष सभी से चाहे अनचाहे अपने जीवन में भूल हो जाती है. यहाँ तक की छोटी मानसिकता रखने वालो ने मर्यादा पुरोसोत्तम भगवान राम पर भी अंगुली उठाई. 
देखा जाय तो बाबा एक पवित्र मकसद को लेकर संघर्ष कर रहे हैं. और इसमें सभी को साथ देना चाहिए. पर यहाँ पर भी लोग कांग्रेस की घटिया चाल में फंस गए. और उसी की तरह उन्हें RSS और BJP  का एजेंट बता दिया. यही तो सरकार चाहती थी. सरकार कभी नहीं चाहेगी की देश के लोग एकजुट हो क्योंकि आज़ादी के बाद से ही सत्ता संभल रही इस सरकार से जुड़े लोंगो के ही काला धन विदेशी बैंको में जमा हैं.  शर्म तो हमें आनी चाहिए की सत्ता से जुड़े लोग जो समझाना चाहते हैं वही लोग समझ रहे हैं. 
बाबा ने RSS और BJP  को अनशन में साथ लेने के लिए आमंत्रण नहीं दिया था. वे लोग खुद ही वहा गए. और बाबा ने किसी को मना भी नहीं किया था. उन्होंने कब कहा की मुस्लिम संगठन और अन्य राजनितिक पार्टियाँ उनके अनशन में न आयें. फिर लोग क्यों नहीं गए, 
राजनीती का गन्दा खेल खेलने वाले आम लोंगो को अपने भ्रम जाल में फंसाकर  गुमराह करते रहते हैं और हम गुमराह होते रहते हैं इसी का फायदा फंदेबाज लोग उठाते है. आज जरुरत इस बात की है कि दकियानूसी विचारो को छोड़कर देश हित के मुद्दे पर सभी एक जुट हो, यदि बाबा आज देशभक्ति, कालाधन और भ्रष्टाचार कि बात करते हैं तो हमें एकजुट होकर उनका साथ देना होगा. आज वे उचित मुद्दे को लेकर खड़े हुए हैं, हां जब हमें लगे कि वे गलत रास्ते  पर हैं तो हमें उनका विरोध करने को भी तैयार रहना होगा, पर बेवजह बाबा पर अंगुली उठाकर हम झूठी वाहवाही भले ही चाँद लोंगो कि बटोर ले पर यह भी सोचे कि यदि यही हालत बने रहे तो क्या आने वाली हमारी पीढ़ी सुख और शांतिपूर्वक रह पायेगी.

शनिवार, 4 जून 2011

पहले अपने गिरेबान में झांककर देखो शाहरुख़

कल टीवी पर देखा और आज पेपर में पढ़ा, बड़बोले शाहरुख का बयान। कोई समर्थन नहीं दूंगा जो जिसका काम है उसको वही करना चाहिए। ऐसा लगा मानो बाबा रामदेव का पूरा आंदोलन शाहरुख के समर्थन पर टिका है। अगर समर्थन नहीं दिया, तो बेचारे बाबा तो कहीं के नहीं रहेंगे। शाहरुख जो बात आप दूसरों के लिए कहते हैं क्या वहीं अपने जीवन पर भी लागू करते हैं। जहां तक मेरी जानकारी है शायद आप फिल्मों में काम करते हैं। फिल्मों में आप क्या करते हैं इसकी मुझे कोई खास जानकारी नहीं है। कुछ मित्रों ने बताया कि आप अभिनेता है। वो लोग अगर ऐसा कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। आपका वर्तमान वक्तत्व पढ़ने के बाद मेरे मन में भी एक प्रश्न उठा कि अगर आप अभिनेता हैं तो क्रिकेट से आपका क्या लेना-देना। लेकिन वहां काफी सक्रिय दिखते हैं। वो अलग बात है कि क्रिकेट का मैदान इस व्यापारी कम अभिनेता को अभी तक कोई खास सफलता नहीं दिला पाया है। यह वक्तव्य आप पर भी उतना ही लागू होता है जितना बाबा पर। अगर यह वक्तव्य आपने अपने अनुभवों के आधार दिया है तो भी गलत है।
अगर आप खुद को सफल मानते हैं तो भी आपको सफलता को सहजता से लेना चाहिए। गंभीरता से कभी नहीं। गंभीरता से ली गई सफलता अक्सर दुखदायी होती है। और अगर यह सर चढ़कर बोलने लगे तो, समझ लेना चाहिए कि पतन की तरफ जाने वाली पहली सीढ़ी पर आप अपना कदम रख चुके हैं। आप बॉलीबुड से जुड़े हैं तो आपने राजकिरण का नाम भी सुना होगा। वो भी सफल अभिनेता था। पर आज कहां और किस हालत में जी रहा है कोई नहीं जानता। और भी कई नाम हैं जिन्होंने सफलता के उच्चतम शिखर को चूमा उनमें एक परवीन बॉबी का भी नाम है। एक समय बॉलीवुड में उनकी तूती बोलती थी। फिर एक समय ऐसा भी जब वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठी। मृत्यु भी दर्दनाक ही मिली। 72 घंटे अपने कमरे में मृत अवस्था में पड़ी रही और किसी को भनक तक नहीं मिली। ऐसे और भी किस्से हैं जो शिखर पर पहुँचे पर वहां के सन्नाटे को बरर्दाश्त नहीं कर पाए।
खैर छोड़िए इन सब बातों से आपका क्या लेना-देना। बाबा रामदेव ने दुनिया को क्या दिया है यह सिर्फ उनसे पाने वाले जानते हैं। आप नहीं। शाहरूख आपको कभी दिल्ली एअरपोर्ट पर रेड कार्पेट वेलकम मिला है? शायद नहीं। उसके लिए आपको जुगाड़ बैठा कांस जैसे विदेशी फिल्म समारोहों में जाना पड़ता है। जहां से आप लोगों के स्वागत के तो कम फज़ीहत के किस्से खूब सुनने को मिलते हैं। फिर भी आप बाबा की बात करते हैं!
क्या आपने अपने और बाबा के सामाजिक सराकारों में कभी एकरूपता पाई है। उनके सरोकार लाखों लोगों को स्वस्थ जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। और आप बड़ी-बड़ी कम्पनियों से पैसा लेकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। जिन उत्पादों की महिमा का आप जोर-शोर से बखान करते हैं, क्या सचमुच उनके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक आधार होता है? सच कहा जाय तो उन उत्पादों को आप लोग कभी जांचते परखते तक नहीं हैं, उनका इस्तेमाल करने की बात तो बहुत दूर की है। दरअसल जिन उत्पादों के लिए आप टीवी पर बेहूदगी करते नज़र आते हैं उनका उत्पादन शोषण, अन्याय, विस्थापन और झूठ पर टिका होता है। उनका प्रचार करके आप और आप जैसे अनेक लोग आम जनता की भावनाओं से खेलते हुए कृत्रिम मांग पैदा करके भोगवाद और असंयम को बढ़ावा से रहे होते हैं।
याद रखिए, सूरज की तरफ मुख करके उस पर थूकने से थूक, थूकने वाले के चेहरे पर ही गिरता है। सूरज तो वैसे ही अपने प्रकाश से दुनिया को प्रकाशित करता रहता है।
अंत में इतना ही कहूंगी कि बाबा तो भारतीय जन-मानस के बहुत गहरे तक जुड़े हुए हैं। और इन समस्याओं पर काफी अरसे से जन-जागरण अभियान भी चला रहे हैं। बाबा को आप जैसों की सलाह और समर्थन की आवश्यकता नहीं है। उन्हें पता है कि वे क्या कर रहे हैं और भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में हम सब उनके साथ है। इस मामले में आप अपनी ज़ुबान बंद ही रखे तो अच्छा होगा।
चलते-चलते एक बात और कहूंगी। कभी वक्त मिले तो महात्मा गांधी को ज़रूर पढ़िएगा। तभी आपको मुद्दों को उठाने और उसके सही और गलत तरीकों का ज्ञान हो सकेगा।
-प्रतिभा वाजपेयी.

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