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रविवार, 8 मई 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य-- गीत--मयूर नृत्य--.(-सुमनान्जलि-४.).-- डा श्याम गुप्त

प्रेम काव्य -महाकाव्य----     रचयिता---डा श्याम गुप्त  

  ------ प्रेम के विभिन्न  भाव होते हैं , प्रेम को किसी एक तुला द्वारा नहीं  तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत  चतुर्थ -सुमनांजलि- प्रकृति - में प्रकृति में उपस्थित प्रेम के विविध उपादानों के बारे में,  नौ विभिन्न अतुकान्त गीतों द्वारा प्रस्तुत किया गया है जो हैं--भ्रमर गीत, दीपक-राग, चन्दा-चकोर, मयूर-नृत्य , कुमुदिनी, सरिता-संगीत, चातक-विरहा, वीणा-सारंग व शुक-सारिका... । प्रस्तुत है चतुर्थ गीत----मयूर -नृत्य -----
हे मयूर !
तुम किसलिए नृत्य करते हो ? 
मयूरी, 
प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं समझती है;
इसलिए तो तुम्हारे साथ नृत्य नहीं करती है |
तुम नृत्य लय हो जाते हो,
प्रेम आवेश में खो जाते हो ;
विरत मोरनी की याद मन में लाते हो,
इसीलिये तो  आंसू बहाते हो ||

मोरनी !
तुम क्यों नृत्य नहीं करती हो? 
क्यों प्रियतम से विरत रहती हो ?
मोरनी ने अपनी कूक से -
 वन गुंजायमान किया ,
अपना समाधान यूं दिया  ||

प्रेम,
अंतर्मन की गहराई से-
किया जाता है  ;
मेरी कूक गुंजन के बिना,
मोर कहाँ नाच पाता है  |
मयूर की  न्रित्य-छटा--
मोरनी को इतनी भाती है, कि -
सुध-बुध खोकर -
नाचना भूल जाती है |
प्रिया की प्रेम-विह्वलता में -
मोर -इतना अविभूत होजाता है कि -
प्रियतम की आँखों में -
आंसू छलक आता है ||

आँसू, तो-
महज़ एक निशानी है;
यह तो मोर-मोरनी की--
प्रेम-कहानी है  |             -----क्रमश  पंचम गीत---कुमुदिनी.....
 



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