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बुधवार, 10 अगस्त 2011

प्रेम काव्य-. षष्ठ सुमनान्जलि--रस श्रृंगार--भाग (ख)-ऋतु शृंगार गीत-२ --डा श्याम गुप्त

              प्रेम   -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है ..षष्ठ -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के श्रृंगारिक भाव का वर्णन किया जायगा ...जो तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार तथा (ग)..वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है.....खंड ख -ऋतु शृंगार-- के इस खंड में विभिन्न ऋतुओं से सम्बंधित ..बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, कज़रारे बादल, हे घन !, शरद, हेमंत एवं शिशिर आदि ८ गीत प्रस्तुत किये जायेंगे | प्रस्तुत है  द्वितीय  गीत --ग्रीष्म ...

यूंही प्यार नहीं होजाता ,
कुछ तो कहदो, कुछ तो सुनलो |
मेरी चाहत को प्रिय समझो,
अपने मन की बात बतादो ||

प्रेमी मन है प्यासा मन है,
खिली  धूप है ग्रीष्म सघन है |
पागल मन यदि भटक गया हो ,
मन में प्रिय कुछ खटक गया हो |
जुल्फों की ये छाँह सुहानी ,
प्यारी पुरवा नयनों पानी |
बाहों खिलती रात की रानी ,
मन उपवन की प्रीति पुरानी  |
 
प्रेम  प्रीति मनुहार करो प्रिय,
प्यार करो इज़हार करो प्रिय|
प्यारे मीठे बोल सुनादो,
अपने मन की बात बतादो | ---यूंही प्यार....

पूर्णकाम है कौन जगत में ,
मानव मन भूलों की गठरी |
बात कहोगे बात सुनोगे,
मन की बातें बाँट रहोगे |

दोनों पूर्ण काम होजायें,
सदा प्रीति की रीति निभाएं |
जीवन प्यार-निकुंज बनादो,
अपने मनकी  बात बतादो |.......यूं ही प्यार ...

सघन ग्रीष्म की फांस कटे प्रिय,
प्यास मिटे तन मन की हे प्रिय !
मेरे मन की केसर क्यारी,
तुम परागबनकर महकादों |

आतप में प्रिय, प्रेम-प्रीति की,
एसी ठंडी पवन बहादो |
कुछ सुनलो कुछ मुझे सुनादो,
अपने मन की बात बतादो |

मन के पास तभी मन आता,
यूं ही प्यार नहीं हो जाता |
तुम समझो मुझको समझादों,
आपने मन की बात बतादो ||  ---यूं ही प्यार नहीं....

                                                                   क्रमश:..तृतीय गीत ....वर्षा...




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