
5/11/2011 07:49:00 pm

Nirantar
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मुरझाये फूल को
कौन देखता?
सुगंध उस की कौन
सूंघता?
कभी आँखों का तारा था
बगिया का चेहरा था
अब मुरझा गया
झुर्रियों से भर गया
अब उसे कौन देखता?
जीवन का यही चलन
संसार का यही नियम
उगते सूरज को नमन
अस्त को कौन पूजता?
मुरझाये
फूल को कौन देखता ?
नयी कलियाँ सब को
मोहती
खिले फूल की छवि
लुभाती
खुशबू उसकी निरंतर
भाती
मुरझाये फूल को कौन
देखता?
आने वाले का इंतज़ार
सब को रहता
जाने वाले को कौन
पूंछता?
11-05-2011
838-45-05-11

5/07/2011 12:15:00 am

Nirantar
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हर तरफ फ़ैली
गंदगी क्यों देखूं ?
भ्रष्टाचार के किस्से
क्यों सुनूं ?
मार काट की खबरें
क्यों पढूं ?
क्यों इंतज़ार किसी और
का करूँ ?
कोई और करेगा
यह सोच कर क्यों
बैठा रहूँ ?
औरों की तरह चुपचाप
देखता रहूँ
क्यों ना मैं ही पहल
करूँ ?
कुछ गंदगी मैं भी साफ़
करूँ
भ्रष्टाचार से लड़ाई लडूँ
निरंतर
बढ़ रही नफरत को
कम करूँ
सोते हुओं को
जगाऊँ
06-05-2011
818-25-05-11

4/23/2011 11:22:00 am

Nirantar
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इल्तजा
खुदा से करता
मुझे ना बदलना
बदलनी है तो
मेरी फितरत बदल
नफरत को प्यार में
बदल
अन्दर पल रही
निराशा को बदल
मेरे ख्यालों को बदल
उन्हें
उम्मीदों से भर
मेरे चेहरे का नक्शा
बदल
उसे हंसी और
मुस्कराहट से भर
निरंतर सब को खुश
रख सकूं
जहन को
ऐसे जज्बे से भर
23-04-2011
740-162-04-11