
5/07/2011 12:15:00 am

Nirantar
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हर तरफ फ़ैली
गंदगी क्यों देखूं ?
भ्रष्टाचार के किस्से
क्यों सुनूं ?
मार काट की खबरें
क्यों पढूं ?
क्यों इंतज़ार किसी और
का करूँ ?
कोई और करेगा
यह सोच कर क्यों
बैठा रहूँ ?
औरों की तरह चुपचाप
देखता रहूँ
क्यों ना मैं ही पहल
करूँ ?
कुछ गंदगी मैं भी साफ़
करूँ
भ्रष्टाचार से लड़ाई लडूँ
निरंतर
बढ़ रही नफरत को
कम करूँ
सोते हुओं को
जगाऊँ
06-05-2011
818-25-05-11

4/23/2011 11:40:00 pm

Nirantar
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वो चाहते
मैं रुक जाऊं
निरंतर
चलना बंद कर दूं
नया सोचना
नया करना छोड़ दूं
अपने में
सिमट कर रह जाऊं
सीमाओं में बंध जाऊं
दुनिया के
रेले में मिल जाऊं
मैं ठहरा बहता पानी
कैसे उनके जाल में
फँस जाऊं ?
मुझे बहना है
समुद्र में मिलना है
बादल बन
आकाश को छूना है
निरंतर नया करना है
कैसे सीमाओं में
बंध जाऊं ?
23-04-2011
746-166-04-11

3/25/2011 07:07:00 pm

Nirantar
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कौन है जिसने
ख्वाब नहीं देखे
कुछ पूरे हुए,
कुछ अधूरे रहे
फिर क्यों इंसान
निरंतर रोता रहता
जो बीत गया
उसमें खोता रहता
भविष्य की
चिंता में घुलता रहता
वर्तमान में दुखी रहता
जो मिला
अब तक जानो उसे
धन्यवाद इश्वर को दो
बेहतर की उम्मीद करो
बोझ ना
उसका मन में रखो
मिले ना मिले,
मर्जी खुदा की समझो
ना मारो खुद को पल पल
हर पल जिया करो
सन्देश दुनिया को
भी दिया करो
25-03-03
504—174-03-11