विज्ञान प्रगति व इंसानियत .. क्या कहें कैसी है हालत यारो ज़माने की। उन्नति कहेंअवनति कहें यारो ज़माने की। कहते तो है वे इसे दौरे प्रगति-विग्यान का, हमको लगती लूट प्रक्रिति के खज़ाने की । दूर बहुत दूर आसमां मे तो झांक लिया, खबर कब रख पाये अपने आशियाने की । . गन्दगी कूडा करकट बज़बज़ाती नालियों के, अम्बार लगे हैं किसे है चिन्ता हटाने की । लूट अनाचार कामचोरी के साये गहरे, किसकी चाहत है भ्रष्टाचार को हटाने की। भाव आचरण कर्म चिन्तन सब विदेशी होगये, किसको चिन्ता शुचि स्वदेशी आचरण सजाने की । सुख के साधन ही हैं सब कुछ तो प्रगति ही मानिये, इन्सानियत मिट जाय तो अवनति जमाने की। श्याम मतलब प्रगति और विग्यान झुठलाना नहीं, है जरूरत शुचि स्वदेशी आचरण आज़माने की ॥ ![]() ![]() |
2/27/2011 08:57:00 pm
shyam gupta

Posted in: