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शनिवार, 2 जुलाई 2011

अश्लीलता के चरम पर भारतीय सिनेमा...............शिव शंकर

आज भारतीय सिनेमा वयेस्क हो गया है ये कहकर फ़िल्म निर्माता और कलाकार दर्शको के सामने गंदे संवाद और अश्लील हरकत वाली फिल्म प्रस्तुत कर रहे है .१ जुलाई को सिनेमा घरो में आई फ़िल्म डेल्ही बेल्ही ने तो सारे हदे पार कर गई .डेल्ही बेल्ही आमिर खान के निर्देशन में बनी थी जिससे दर्शको को एक अच्छी फिल्म देखने की उमीद थी लेकिन उस फिल्म को देख कर दर्शक अपने को ठगा सा महसूस कर रहे है.

मिस्टर प्रफेशनल के नाम से मसहूर आमिर खान ऐसी फिल्म दर्शको के सामने रखेगे ये लोगो को कुछ हजम नही हो रहा . डेल्ही बेल्ही फ़िल्म में इंटरवल के पहले तक लोगो को अश्लील संवाद और अश्लील हरकते कर के दर्शको के मनोरंजन का असफल प्रयास किया जाता है .विजय राज की एंट्री से फिल्म में कुछ नया मोड़ आता है लेकिन पूरी फ़िल्म में गन्दी गालिया ,अश्लील हरकते ही देखने को मिलती है . ये कौन सा नया वेयास्क्पन है फिल्मी जानकारों और समीक्षकों को भी नही समझ आ रहा है.............. .लोगो को समझ में नही आ रहा की सेंसर बोर्ड का कार्य क्षेत्र क्या है ?............. कैसी फिल्मो को सिनेमा घरो में पहुचनी चाहिए ?
भारतीय सिनेमा इन सी ग्रेड फिल्मो से अपने पतन के तरफ अग्रसर है . इसे बचाने के लिए जल्द कोई उपाय करना होगा नही हम अपनी संस्कृति ,सभ्यता सब कुछ खो देगे एक बड़ा वर्ग सिनेमा देख कर अपना मनोरंजन करता है जिनमे बच्चे भी शमिल है ................सिनेमा देखने से बच्चो पर बड़ा गहरा असर पड़ता जिससे ऐसी फिल्मे समाज को पतन के तरफ ही ले जाएगी .ऐसी फिल्मो से समाज को बचाने के लिए सेंसर बोर्ड को कठोरता पूर्वक कार्य करना चाहिए इसमे नरमी बरतना घातक सिद्ध हो सकता है .फिल्म निर्माताओ को भी ऐसी फिल्मो को बनाने से बचना चाहिए तभी एक अच्छे और साफ सुथरे समाज की हम कल्पना कर सकते है .

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

झूठी प्रशंसा की महिमा ..................शिव शंकर

महिलायें झूठी प्रशंसा की भूखी होती है ,अमूमन देखा जाता है की पुरुष अकसर महिलाओं को रिझाने के लिए उनकी झूठी तारीफ कर देते है और महिलायें अपनी प्रशंसा सुनकर फुले नहीं समाती ।
अभी कुछ ही दिनों की बात है एक हमारे मित्र ने हमें बताया की मेरी पुरानी प्रेमिका जो की 10 साल बाद मेरे सम्पर्क में आयी है ,10 साल तक उन दोनों में कोई सम्पर्क नहीं था न फ़ोन से न किसी भी माध्यम से क्योंकि शादी के बाद लडकी अपने परिवार के साथ पुणे में रहने लगी
लेकिन हमारे मित्र ने अंतरजाल (internet ) पे सर्च कर अपनी पुरानी प्रेमिका को ढूंढ़ निकाला और दोनों में चैटिंग के माध्यम से बाते हुई दोनों ने एक दुसरे को ईमेल किया और अपनी अपनी बातें एक दुसरे से शेयर की लड़की ने बात को आगे बढ़ाने के बजाय उसे पुरानी कहानी मान कर भूलने की सलाह दी ,लेकिन हमारे मित्र की झूठी प्रशंसा में फस कर वे रिश्ते को आगे बढ़ाने पर मजबूर हो गयी मित्र महोदय ने उनकी तारीफ में कहां की इतने सालो में मै तुम्हे भूल नहीं पाया ऐसा अकसर मेरे साथ (मित्र ) होता था की मैं अतीत की यादों में खो जाता और तुम हरदम मेरे पास ही होती थी ,बहुत चाहा की तुम्हें याद न करु, लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए एक अलग प्यार ,सम्मान था जो चाहते हुए भी मैं तुम्हें अपने दिल से नहीं निकाल पाया प्रिय
हलांकि मेरे मित्र के द्वारा कहीं बातो में सच्चाई नहीं थी वो शरारत बस अंतरजाल पर पुरानी प्रेमिका को सर्च किया और खोजने में सफल भी हो गया
अब ऐसी घटना अक्सर हमें देखने को मिल जाती है की महिलायें पुरुषों के ऐसी झूठी तारीफ में उलझ कर अपना भला बुरा भी नहीं सोच पाती और उनके झांसे में आ जाती हैं
समाज में अब ये बात आम हो गयी हैं की महिलाओं को अपनी बात मनवाना हो तो उनकी झूठी तारीफ बढ़ चढ़ कर किया जाये तो वो ख़ुशी से झूम जाती हैअब देखिये न प्रेमिकाओं को रिझाने में प्रेमी उसकी झूठी तारीफ करने में पीछे नहीं रहता रूठी पत्नी को मनाने में भी पति महोदय भी इसी झूठी प्रशंसा का सहारा लेते हैं और वे सभी महिलाओं को अपने पक्ष में करने में सफल भी हो जाते है
खैर ये तो रही रिश्ते को दूर तक ले जाने के लिए महिलाओं की झूठी तारीफ पुरुष समाज द्वारा किया जाना, लेकिन ये नुख्से तो आज ब्लॉग की दुनिया में भी देखने को मिल रहा है
ब्लॉग जगत में कुछ डा. महिला ब्लोगर है जो अपने द्वारा लिखे लेख पर प्रशंसा पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है उनके ब्लॉग पर आप जाते ही देखेगें की उनके लिखे लेख पर भारी मात्र में टिप्पणियाँ मिली हैं जिसमें आपको उस महान लेखिका के विपक्ष में कोई कमेन्ट नहीं मिलेगा ,कमेन्ट करने वाले अधिकांश आशिक मिजाज लोग गलत लेख पर भी बिना पढ़े वाह वाह करते पाए जाते है जिससे उस महिला लेखिका को बुरा न लगे
उनके कमेन्ट को पढकर महिला ब्लोगर प्रसन्न हो जाती है और उन्हें धन्यवाद कहती है ,पुरुष महोदय मुस्कराते हुए सोचते है झूठी प्रशंसा कर बेचारी को ख़ुशी दे दिया
लेकिन कुछ ऐसे पुरुष वर्ग भी है जो महिला ब्लोगर द्वारा लिखे लेख पर आपत्ति जताया और उसके विपक्ष में कमेन्ट किया लेकिन वो कमेन्ट महिला ब्लोगर को पसंद नहीं आया महिला ब्लोगर ने उस कमेन्ट को अभद्र कहते हुए कहा की ऐसे किये गये कमेन्ट मै अपने ब्लॉग पर नहीं प्रकाशित करुगी क्योकि उन्हें झूठी तारीफ सुनने की आदत जो हो गई है इसीलिए विपक्ष में की गई टिपण्णी उन्हें अभद्र लगती है
उस महिला ब्लोगर द्वारा एक पोस्ट लिखी जाती है और वो महिला पुरुष ब्लोगरो से अनुरोध करती है की उन्हें अगर मेरा लेख पसंद न आये तो वो मेरे ब्लॉग पर न आये क्योकि न पसंद करने वाले लोग मानसिक रूप से विकलांग है
अब ये बात तो सच लगने लगी है की महिलायें झूठी प्रशंसा की कायल होती है, उनके भले के लिए किया गया निंदा भी उन्हें बुरा लगता है वे अपनी गलती को सुधरने के बजाय उस सच बात को नकारते हुए अपनी झूठी प्रशंसा में मग्न हो जाती है महिलाओं को अपने हित में कही बातो को स्वीकारना चाहिए और अपने विवेक से काम लेते हुए लोगो के झूठी बातो में नहीं आना चाहिए महिलाओं को समझना चाहिए की जो वाह वाह झूठी करते है उनके तुलना में सच में की गई आलोचना करने वाले सही है

अब पुरुष वर्ग से ये अपील है की महिलाओं के प्रति अपनी सोच बदले और उनकी झूठी तारीफ करने के बजाय सच को बया करे, जिससे महिलाये अपने अंदर की कमी को सुधार सके झूठी तारीफ से उसे ज्ञात ही नही होगा की उसके अंदर दोष क्या है ?
पुरुष वर्ग को आगे की पंक्तियों से सिख लेनी चाहिए जो इस प्रकार है-

भारती वांग्मय सदा से ही नारी की महानता व गुणगान करता रहा है सनातन ग्रंथो ने स्वीकारा हैं की बिना शक्ति के स्वयं शिव भी शव के समान हैं भारतीय समाज आज भी विद्वान् पुरुष को चरण स्पर्श का आदेश दिया जाता है वही गुरु व पिता कन्या को देवी मान कर पैर पूजता है

अत : पुरुष वर्ग इन बातो से सिख लेते हुए नारी का सम्मान करें, उन्हें भोग की वस्तु न समझते हुए सम्मान व इज्जत दें नारी पुरे समाज की जननी है उनके साथ छल -कपट दुखदायी है

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

ब्रह्म हत्या से बडा़ पाप कन्या भ्रूण हत्या...................शिव शंकर



जिसकी सेवाए त्याग एवं ममता की छॉंव में पलकर पूरा परिवार विकसित होता है, उसके आगमन पर पूरे परिवार में मायूसी एवं शोक के वातावरण का व्याप्त हो जाना विडंबनापूर्ण अचरज ही है। कन्या - जन्म के साथ ही उस पर अन्याय एवं अत्याचार का सिलसिला शूरू हो जाता है। अपने जन्म के परिणामों एवं जटिलताओ से अनभिज्ञ उस नन्हीं - सी जान के जन्म से पूर्व या बाद में उपेक्षा , यहॉं तक कि हत्या भी कर दी जाती है।

लोगो में बढती पुत्र- लालसा और खतरनाक गति से लगातार घटता स्त्री, पुरूष अनुपात आज पूरे देश के समाजशास्त्रियोए, जनसंख्या विशेषज्ञों , योजनाकारो तथा समाजिक चिंतकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। जहॉ एक हजार पुरूषों में इतनी ही मातृशक्ति की आवश्यकता पडती है, वही अब कन्या - भ्रूण हत्या एवं जन्म के बाद बालिकाओं की हत्या ने स्थिति को विकट बना दिया है। आज लोगो में पहले से ही लिंग जानने से भ्रूण हत्या में इजाफा हो रहा है। लोग पता लगा कर कन्या भ्रूण को नष्ट कर देते है। गर्भपात करना बहुत बडा कुकर्म और पाप है। शास्त्र में भी कहा गया है कि गर्भपात अनुचित है, संस्कृति में इस संदर्भ में एक श्लोक है ।
यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातनेए प्रायश्चितं न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते श्श्
ब्रह्म हत्या से जो पाप लगता है, उससे दुगुना पाप गर्भपात से लगता है। इसका कोई प्रायश्चित नहीं है

आज भी प्रत्येक नगर एवं महानगर में प्रतिदिन भ्रूण हत्या हो रही है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि समाजसेवी संस्था, और वैधानिक प्रावधान भी इस क्रुर पद्धति को रोकने में अक्षम है। किसी जमाने में बालिकाओ को पैदा होते ही मारे जाने और अपशकुन समझे जाने का अभिशाप झेलना पडता था, लेकिन वर्ममान में भी लोगो मे कन्या को जन्म से पहले या जन्म के बाद भी मारने में कोइ भी परिवर्तन नहीं आया है। लोग इस तरह बालिकाओ को जन्म से पहले नष्ट करते रहे तो मनुष्य जाति का विनाश जल्द ही निश्चित है। कन्या भ्रूण हत्या इतने तेजी के साथ हो रहा है कि वर्तमान मे स्त्री - पुरूष अनुपात भी कई राज्यो में भिन्न भिन्न स्थिति में पाये जा रहे है।

आज स्त्रियो का अनुपात दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है जो आगे चलकर मनुष्य जाति के लिए विनाश का कारण बनेगीं। अभी जल्द ही भारत सरकार द्धारा कराये जनगणना 2010- 2011 के अनुसार स्त्री- पुरूष अनुपात का आकडा जो पेश किया गया वो चिन्ता का विषय बना हुआ है। भारत में लिंगानुपात पुरूषो के मुकाबले स्त्रियो का कम है। ये अनुपात कम होने का सबसे बडा कारण बडे पैमाने पर हो रहे कन्या भ्रूण हत्या है ।

भारत में 1000 पुरूषो के मुकाबले महिलाये 933 है, ग्रामीण स्तर पर 946 और नगरीय महिला अनुपात 900 है। ये आकडा तो पूरे भारत का था। राज्यो में स्त्रियो के सबसे अधिक अनुपात वाला राज्य केरल 1058 है। स्त्रियों के सबसे कम अनुपात वाला राज्य हरियाणा 861 है। संघ राज्य क्षेत्रो में सबसे अधिक अनुपात पाण्डिचेरी का 1001 है और सबसे कम दमन और दीव का 710 है।
संघ राज्य क्षेत्रो के जिलो में सबसे अधिक माहे (पाण्डिचेरी) 1147 और सबसे कम दमन का 591 है।

इन आकडो को देख कर हम अनुमान लगा सकते है कि भारत में महिलाओं का अनुपात किस प्रकार घटता जा रहा है।
अगर सरकार जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाती है तो देश में बहुत गहन समस्या उत्पन हो सकती है। कई राज्यों में कन्या के जन्म को लेकर कई भ्रांतिया है जैसे- तमिलनाडु के मदुरै जिले के एक गॉंव में कल्लर जाति के लोग घर में कन्या के जन्म को अभिशाप मानते हैं। इसलिए जन्म के तीन दिन के अन्दर ही उसे एक जहरीले पौधे का दूध पिलाकर या फिर उसके नथुनों में रूई भरकर मार डालते हैं। भारतीय बाल कल्याण परिषद् द्धारा चलाई जा रही संस्था की रिपोर्ट के अनुसार इस समुदाय के लोग नवजात बच्ची को इस तरह मारते है , कि पुलिस भी उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कर पाती ।
जन्म लेते ही कन्या के भेदभाव की यह मानसिकता सिर्फ असभ्य , अशिक्षित एवं पिछडे लोगो की नहीं है, बल्कि कन्या अवमूल्यन का यह प्रदूषण सभ्य, शिक्षित एवं संभ्रांत कहे जाने वाले लोगो में भी सामान्य रूप से पाया जाता है। शहरों के तथाकथित विकसित एवं जागरूकता वाले माहौल में भी इस आदिम बर्बता ने कन्या भ्रूणों की हत्या का रूप ले लिया है। इसे नैतिक पतन की पराकाष्ठा ही कह सकते है कि जीवन रक्षा की शपथ लेने वाले चिकित्सक ही कन्या भ्रूणों के हत्यारे बने बैठे है।


अस्तित्व पर संकट के अतिरिक्त बालिकाओ को पोषणए स्वास्थए शिक्षा आदि हर क्षेत्र में भेदभाव का शिकार होना पडता है।वास्तव में अभिभावकों की संकीर्ण मानसिकता एवं समाज की अंध परंपराएं ही वे मूल कारण हैं जो पुत्र एवं पुत्री में भेद भाव करने हेतू बाध्य करते हैं। हमारे रीति - रिवाजों एवं समाजिक व्यवस्था के कारण भी बेटा और बेटी के प्रति सोच में दरार पैदा हुई है।
अधिकांश माता - पिता समझते है कि बेटा जीवनपर्यंत उनके साथ रहेगा उनका सहारा बनेगा । हलांकि आज के समय में पुत्र को बुढापे का लाठी मानना एक धोखा ही है। लडकियों के विवाह में दहेज की समस्या के कारण भी माता - पिता कन्या जन्म के स्वागत नहीं कर पाते । समाज में वंश - परंपरा का पोषक लडको को ही माना जाता है। ऐसे में पुत्र कामना ने मानव मन को इतनी गहराई तक कुंठीत कर दिया है कि कन्या संतान की कामना या जन्म दोनो अब अनेपेक्षित माना जाने लगा हैं।

भारत सरकार ने एक राष्टीय कार्य योजना बनाई है, जिसका मुख्य उद्देश्य पारिवारिक एवं समाजिक परिवेश में बालिकाओं के प्रति सामानतापूर्ण व्यवहार को बढावा देना है। सरकारी कार्यक्रमों गैर सरकारी संगठनों के प्रयास एवं मीडिया के प्रचार - प्रसार से कुछ हद तक जनमानस में बदलाव अवश्य आया है , परंतु निम्न मध्यम वर्ग एवं गरीब परिवारो में अभी भी लैंगिक भेद भाव जारी है। जहॉं बालिकाओ का जीवन पारिवारिक उपेक्षा , असुविधा एवं प्रोत्साहनरहित वातावरण में व्यतीत होता है। जहॉं उनका शरीर प्रधान होता है, मन नहीं। समर्पण मुख्य होता है, इच्छा नहीं। बंदिश प्रमुख है, स्वतंत्रता नहीं।


बदलते हुए वातावरण के साथ अब ऐसी मान्याताओ से उपर उठना होगा। बालिकाओं के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। अब तक किये गए शोषण और उपेक्षा के बाद भी जहॉं भी उन्हे मौका मिला है वे सदा अग्रणी रही हैं। इक्कीसवीं सदी नारी वर्चस्व का संदेश लेकर आई हैं।अगर हम अब भी सचेत नहीं हुए तो हमें इसकी कीमत चुकानी पडेगी । अगर हम अपनी सोच नही बदले तो फिर भविष्य में हमें राष्ट्पति प्रतिभा पाटिल , लोक सभा अध्यक्ष मीरा कुमार और मायावती जैसी सफल महिला हस्तियों से वंचित होना पडेगा। इस लिए समाज में फैले कन्या भ्रूण हत्या जैसे पाप को रोकने के लिए जल्द से जल्द सफल प्रयास करना चाहिए ।

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

लडकियों के शिक्षा के अधिकार का सच ... ..... ( शिव शंकर)


भारत में ६ से १४ साल तक के बच्चो के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का कानून भले ही लागू हो चुका हो, लेकिन इस आयु वर्ग की लडकियों में से ५० प्रतिशत तो हर साल स्कुलो से ड्राप- आउट हो जाति है। जाहिर है,इस तरह से देश की आधि लडकियां कानून से बेदखल होती रहेगी। यह आकडा मोटे तैर पर दो सवाल पैदा करते है। पहला यह कि इस आयु वर्ग के १९२ मिलियन बच्चों में से आधी लडकिया स्कुलो से ड्राप-आउट क्यो हो जाती है ? दूसरा यह है कि इस आयु वर्ग के आधी लडकिया अगर स्कुलो से ड्राप- आउट हो जाती है तो एक बडे परिद्श्य में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून का क्या अर्थ रह जाता है ?
इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन(१९९६) की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि दुनिया भर में ३३ मिलियन लडकिया काम पर जाती है,जबकि काम पर जाने वाले लडको की संख्या ४१ मिलियन है। लेकिन इन आकडो मे पूरे समय घरेलू काम काजो मे जूटी रहने वाली लडकियो कि संख्या नहीं जोडी गई थी ।

इसी तरह नेशनल कमीशन फाँर प्रोटेक्शन आँफ चिल्ड्रेन्स राइटस की एक रिपोर्ट में भी बताया गया है कि भारत मे ६ से १४ साल तक कि अधिकतर लडकियो को हर रोज औसतन ८ घंटे से भी अधिक समय केवल अपने घर के छोटे बच्चो को संभालने मे बिताना पडता है। सरकारी आकडो मे भी दर्शाया गया है कि ६ से १० साल तक कि २५ प्रतिशत और १० से १३ साल तक की ५० प्रतिशत (ठीक दूगनी) से भी अधिक लडकियो को हर साल स्कुलो से ड्राप- आउट हो जाना पडता है।

एक सरकारी सर्वेक्षण (२००८) के दौरान ४२ प्रतिशत लडकियों ने बताया कि वह स्कुल इस लिए छोड देती है कि क्योंकि उनके माता-पिता उन्हे घर संभालने और छोटे भाई बहनों की देखभाल करने के लिए कहते है,आखिरी जनगणना के मुताबिक ,२२.९१ करोड महिलाएं निरक्षर है,एशिया में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है।
एन्युअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट (२००८) के मुताबिक ,शहरी और ग्रामीण इलाके की महिलाओं और पुरुषों के बीच साक्षरता दर क्रमशः ५१.१ प्रतिशत और ६८.४ प्रतिशत दर्ज हैं।

क्राई के एक रिपोर्ट के अनुसार,५ से ९ साल तक की ५३ प्रतिशत भारतीय लडकिया पढना नहीं जानती, इनमे से अधिकतर रोटी के चक्कर मे घर या बाहर काम करती है। ग्रामीण इलाकों में १५ प्रतिशत लडकियों की शादी १३ साल की उम्र में ही कर दी जाति है। इनमें से तकरीबन ५२ प्रतिशत लडकियां १५ से १९ साल की उम्र मे गर्भवती हो जाती है। इन कम उम्र की लडकियों से ७३ प्रतिशत (सबसे अधिक) बच्चे पैदा होते है। फिलहाल इन बच्चो में ६७ प्रतिशत (आधे से अधिक) कुपोषण के शिकार है। लडकियों के लिए सरकार भले हि सशक्तिकरण के लिए शिक्षा जैसे नारे देना जितना आसान है,लक्ष्य तक पहुंचना उतना ही कठीन।

दूसरी तरफ कानून मे मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कह देने भर से अधिकार नहीं मिल जाएगा, बलिक यह भी देखना होगा कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के अनुकूल ।खास तौर से लडकियो के लिए ,भारत में शिक्षा की बुनियादी संरचना है भी या नहीं ।आज ६ से १४ साल तक के तकरीबन २० करोड भारतीय बच्चो की प्राथमिक शिक्षा के लिए पर्याप्य स्कूल ,कमरे , प्रशिक्षित शिक्षक और गुणवतायुक्त सुविधाएं नहीं है, देश की ४० प्रतिशत बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं और इसी से जुडा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ४६ प्रतिशत सरकारी स्कूलो में लडकियों के लिए शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है।

मुख्य तौर पर सामाजिक धारणाओं,घरेलू कामकाजो और प्राथमिक शिक्षा में बुनियादि व्यवस्था के अभाव के चलते एक अजीब सी विडंबना हमारे सामने हैकि देश की आधी लडकियों के पास अधिकार तो हैं,मगर बगैर शिक्षा के । इसलिए इससे जुडे अधिकारो के दायरे में लडकियों की शिक्षा को केंद्रीय महत्व देने की जरुरत है, माना कि यह लडकिया अपने घर से लेकर छोटे बच्चों को संभालने तक के बहुत सारे कामों से भी काफी कुछ सीखती है। लेकिन अगर यह लडकियां केवल इन्ही कामों में रात- दिन उलझी रहती है ,भारी शारीरिक और मानसिक दबावों के बीच जीती हैं,पढाई के लिए थोडा सा समय नहीं निकाल पाती हैं और एक स्थिति के बाद स्कुल से ड्राप्आउट हो जाती है तो यह देश की आधी आबादी के भविष्य के साथ खिलवाड ही हुआ।

आज समय की मांग है कि लडकियों के पिछडेपन को उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनके खिलाफ मौजूद परिस्थतियो के रुप में देखा जाए। अगर लडकी है तो उसे ऐसे ही रहना चाहिए ,जैसे बातें उनके विकाश के रास्ते में बाधा बनती हैं। लडकियों की अलग पहचान बनाने के लिए जरुरी है कि उनकी पहचान न उभर पाने के पीछे छिपे कारणो की खोजबीन और भारतीय शिक्षा पद्दती ,शिक्षकों की कार्यप्रणाली एवं पाठ्यक्रमों की पुनर्समीक्षा की जाए ,लडकियों की शिक्षा से जुडी हुई इन तमाम बाधाओं को सोचे- समझे और तोडे बगैर शिक्षा के अधिकार का बुनियादी मकसद पूरा नहीं हो सकता है ।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

अनसुलझे रिश्ते..................शिव शंकर


अनजाने रिश्ते का एहसास,
बयां करना मुश्किल था ।

दिल की बात को ,
लबों से कहना मुश्किल था ।।


वक्त के साथ चलते रहे हम ,
बदलते हालात के साथ बदलना मुश्किल था ।

खामोशियां फिसलती रही देर तक,
यूँ ही चुपचाप रहना मुश्किल था ।।


सब्र तो होता है कुछ पल का ,
जीवन भर इंतजार करना मुश्किल था ।

वो दूर रहती तो सहते हम ,
पास होते हुए दूर जाना मुश्किल था ।।

अनजाने रिश्ते का एहसास ,
बयां करना मुश्किल था ।।

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

अनसुलझी वो ......... शिव शंकर


मुझमें ढूढ़ती पहचान अपनी


बार बार वो ,


जान क्या ऐसा


था


जिसकी तलाश थी उसको ,


अनसुलझे सवाल को


लेकर उलझती जाती


कभी मैंने साथ


देना चाहा था


उसकी खामोशियों को,


उसके अकेलेपन को ,


पर


वो दूर जाती रही


मुझसे ,


अचानक ही एक एहसास


पास आता है


बंधन का


बेनाम रिश्ते का ,


जिसमें दर्द है ,


घुटन है ,


मजबूरियां है,


शर्म है ,


तड़प है ,


उम्मीद है ।मैं समझते हुए भी


नासमझ सा


लाचार हूँ


उसके सामने


शायद बयां कर पाऊं कभी


उसको अपने आप में ।

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