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रविवार, 15 मई 2011

कोई ना पहचानेगा उन्हें

हमें खुशी है की वो
बुलंदी पर है
मगर अफ़सोस कि
नज़रें आसमान पर
अब तक सफ़र में
साथ थे
अब देखते भी नहीं
कभी हाथ में हाथ डाल
चलते थे
हर मुश्किल में सहारा
मांगते थे
अब हमारी ज़रुरत नहीं
क्यों भूलते कभी
बुलंदी से नीचे भी
उतरना पड़ता
उन्ही लोगों के बीच
रहना होता
कोई ना पहचानेगा उन्हें
निरंतर यह भी याद
रखना होता
वक़्त हमेशा इक सार
नहीं रहता 
15-05-2011
859-66-05-11

शुक्रवार, 13 मई 2011

धर्म का अर्थ पता चल गया

भूखा था
किसी ने खाने को
दो रोटी दी 
मेरी भूख मिटायी
प्यासा था
किसी ने पानी पिलाया
प्यास को बुझाया
दर्द से पीड़ित था
आँख से आंसूं निकल
रहे थे
किसी ने कंधे पर
हाथ रख कर सांत्वना दी
दर्द कम हुआ
बीमार था
किसी ने चिकित्सा कर
जान बचायी
आँखों से दिखता ना था
किसी ने हाथ पकड़
सड़क पार करायी
निरंतर सोचता था
धर्म क्या होता है ?
अब धर्म का अर्थ
पता चल गया
13-05-2011
848-55-05-11

बुधवार, 11 मई 2011

मुरझाये फूल को कौन देखता?


 मुरझाये फूल को
   कौन देखता?
 सुगंध उस की कौन
सूंघता?
कभी आँखों का तारा था
बगिया का चेहरा था
अब मुरझा गया
झुर्रियों से भर गया
अब उसे कौन देखता?
जीवन का यही चलन
संसार का यही नियम 
उगते सूरज को नमन
अस्त को कौन पूजता?
मुरझाये
फूल को कौन देखता ?
नयी कलियाँ सब को
मोहती
खिले फूल की छवि
लुभाती
खुशबू उसकी निरंतर
भाती
मुरझाये फूल को कौन
देखता?
आने वाले का इंतज़ार
 सब को रहता 
जाने वाले को कौन
पूंछता?
11-05-2011
838-45-05-11

बुधवार, 4 मई 2011

पगडंडियाँ

कभी
ऊपर,कभी नीचे
कभी दायें कभी बायें
कटीली झाड़ियों और
पत्थरों के बीच
चलती हुयी पग डंडियाँ
जीवन यात्रा का अनुभव
कराती
कहीं गहरी खाई
मौत का डर बताती
हवा में झूमते
देवदार के लम्बे पेड़
चहचहाते पक्षी
निरंतर
खुशी से जीने का
सन्देश  देते
बिना थके चलने की
शक्ती देते
बादल पहाड़ों से
अठखेलियाँ करते
बिना हार माने
आगे बढ़ने की प्रेरणा
देते
मन करता
बिना हार माने
जीवन की पगडंडी पर
चलता रहूँ
हिम्मत से अपनी
मंजिल पर पहुँच
जाऊं 
04-05-2011
808-15-05-11

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

जीवन का मर्म

लोगों को आते देखा
लोगों को जाते देखा
मौत का अहसास ना था
कल तक सबके साथ  था
आज सबसे दूर है
खुद मौत के आगोश में है
कल तक वो  बोलता 
सब  सुनते
विचारों से उद्वेलित
करता
हर तर्क जवाब देता
हंसता, हंसाता
आज सब बोल रहे
कुछ रो रहे
कुछ दिखावा कर रहे
मन ही मन खुश हो रहे
वो निरंतर सुन रहा
चुपचाप बेबस लेटा
चुपचाप सब देख रहा
ना हंस सकता
ना रो सकता
कुछ कहना चाहता
कह ना पाता
खामोशी से शरीर के
हर नामोनिशान  को
मिटते देख रहा
जीवन का मर्म
समझ रहा
30-04-2011
790-210-04-11

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

कैसे सीमाओं में बंध जाऊं ?

वो चाहते
मैं रुक जाऊं
निरंतर
चलना बंद कर दूं
नया सोचना 
नया करना छोड़ दूं
अपने में
सिमट कर रह जाऊं
सीमाओं में बंध जाऊं
दुनिया के
रेले में मिल जाऊं
मैं ठहरा बहता पानी
कैसे उनके जाल में
फँस जाऊं ?
मुझे बहना है
समुद्र में मिलना है
बादल बन
आकाश को छूना है
निरंतर नया करना है
कैसे सीमाओं में
बंध जाऊं ?
23-04-2011
746-166-04-11

बदलनी है तो मेरी फितरत बदल

इल्तजा
खुदा से करता
मुझे ना बदलना
बदलनी है तो
मेरी फितरत बदल
नफरत को प्यार में
बदल
अन्दर पल रही
निराशा को बदल
मेरे ख्यालों को बदल
उन्हें
उम्मीदों से भर
मेरे चेहरे का नक्शा
बदल
उसे हंसी और
मुस्कराहट से भर
निरंतर सब को खुश
रख सकूं
जहन को
ऐसे जज्बे से भर
23-04-2011
740-162-04-11

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