
5/15/2011 11:10:00 am

Nirantar
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हमें खुशी है की वो
बुलंदी पर है
मगर अफ़सोस कि
नज़रें आसमान पर
अब तक सफ़र में
साथ थे
अब देखते भी नहीं
कभी हाथ में हाथ डाल
चलते थे
हर मुश्किल में सहारा
मांगते थे
अब हमारी ज़रुरत नहीं
क्यों भूलते कभी
बुलंदी से नीचे भी
उतरना पड़ता
उन्ही लोगों के बीच
रहना होता
कोई ना पहचानेगा उन्हें
निरंतर यह भी याद
रखना होता
वक़्त हमेशा इक सार
नहीं रहता
15-05-2011
859-66-05-11

5/13/2011 11:50:00 pm

Nirantar
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भूखा था
किसी ने खाने को
दो रोटी दी
मेरी भूख मिटायी
प्यासा था
किसी ने पानी पिलाया
प्यास को बुझाया
दर्द से पीड़ित था
आँख से आंसूं निकल
रहे थे
किसी ने कंधे पर
हाथ रख कर सांत्वना दी
दर्द कम हुआ
बीमार था
किसी ने चिकित्सा कर
जान बचायी
आँखों से दिखता ना था
किसी ने हाथ पकड़
सड़क पार करायी
निरंतर सोचता था
धर्म क्या होता है ?
अब धर्म का अर्थ
पता चल गया
13-05-2011
848-55-05-11

5/11/2011 07:49:00 pm

Nirantar
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मुरझाये फूल को
कौन देखता?
सुगंध उस की कौन
सूंघता?
कभी आँखों का तारा था
बगिया का चेहरा था
अब मुरझा गया
झुर्रियों से भर गया
अब उसे कौन देखता?
जीवन का यही चलन
संसार का यही नियम
उगते सूरज को नमन
अस्त को कौन पूजता?
मुरझाये
फूल को कौन देखता ?
नयी कलियाँ सब को
मोहती
खिले फूल की छवि
लुभाती
खुशबू उसकी निरंतर
भाती
मुरझाये फूल को कौन
देखता?
आने वाले का इंतज़ार
सब को रहता
जाने वाले को कौन
पूंछता?
11-05-2011
838-45-05-11

5/04/2011 11:48:00 pm

Nirantar
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कभी
ऊपर,कभी नीचे
कभी दायें कभी बायें
कटीली झाड़ियों और
पत्थरों के बीच
चलती हुयी पग डंडियाँ
जीवन यात्रा का अनुभव
कराती
कहीं गहरी खाई
मौत का डर बताती
हवा में झूमते
देवदार के लम्बे पेड़
चहचहाते पक्षी
निरंतर
खुशी से जीने का
सन्देश देते
बिना थके चलने की
शक्ती देते
बादल पहाड़ों से
अठखेलियाँ करते
बिना हार माने
आगे बढ़ने की प्रेरणा
देते
मन करता
बिना हार माने
जीवन की पगडंडी पर
चलता रहूँ
हिम्मत से अपनी
मंजिल पर पहुँच
जाऊं
04-05-2011
808-15-05-11

4/30/2011 11:01:00 pm

Nirantar
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लोगों को आते देखा
लोगों को जाते देखा
मौत का अहसास ना था
कल तक सबके साथ था
आज सबसे दूर है
खुद मौत के आगोश में है
कल तक वो बोलता
सब सुनते
विचारों से उद्वेलित
करता
हर तर्क जवाब देता
हंसता, हंसाता
आज सब बोल रहे
कुछ रो रहे
कुछ दिखावा कर रहे
मन ही मन खुश हो रहे
वो निरंतर सुन रहा
चुपचाप बेबस लेटा
चुपचाप सब देख रहा
ना हंस सकता
ना रो सकता
कुछ कहना चाहता
कह ना पाता
खामोशी से शरीर के
हर नामोनिशान को
मिटते देख रहा
जीवन का मर्म
समझ रहा
30-04-2011
790-210-04-11

4/23/2011 11:40:00 pm

Nirantar
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वो चाहते
मैं रुक जाऊं
निरंतर
चलना बंद कर दूं
नया सोचना
नया करना छोड़ दूं
अपने में
सिमट कर रह जाऊं
सीमाओं में बंध जाऊं
दुनिया के
रेले में मिल जाऊं
मैं ठहरा बहता पानी
कैसे उनके जाल में
फँस जाऊं ?
मुझे बहना है
समुद्र में मिलना है
बादल बन
आकाश को छूना है
निरंतर नया करना है
कैसे सीमाओं में
बंध जाऊं ?
23-04-2011
746-166-04-11

4/23/2011 11:22:00 am

Nirantar
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इल्तजा
खुदा से करता
मुझे ना बदलना
बदलनी है तो
मेरी फितरत बदल
नफरत को प्यार में
बदल
अन्दर पल रही
निराशा को बदल
मेरे ख्यालों को बदल
उन्हें
उम्मीदों से भर
मेरे चेहरे का नक्शा
बदल
उसे हंसी और
मुस्कराहट से भर
निरंतर सब को खुश
रख सकूं
जहन को
ऐसे जज्बे से भर
23-04-2011
740-162-04-11