
7/15/2011 07:25:00 pm

Nirantar
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कोयल खुशी से
कूंक रही
डाली डाली नाच रही
महीनों की गर्मी के बाद
वर्षा से राहत मिली
हरयाली की उम्मीद ने
आवाज़ में मिश्री घोल दी
वर्षा रुक नहीं रही
निरंतर बरसती रही
पेड़ों पर घोंसलों को
धरती पर घरों को
पानी से तहस नहस
करती रही
अति कभी अच्छी
नहीं होती
बेघर हो जाने के बाद
कोयल को
समझ में आ गयी
15-07-2011
1188-71-07-11

5/31/2011 10:17:00 pm

Nirantar
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मेरा
छोटा सा कमरा
मुझे किसी
महल से भी
प्यारा लगता
हर दीवार ,खिड़की
घड़ी और कैलंडर
कौने में मेज
जिस पर लिखता पढता
खिड़की के बाहर
लहलहाता गुलमोहर
उस पर बैठा
फाख्ता का जोड़ा भी
मुझे अपना लगता
बरसों पुराना पलंग
गहरी नींद में सुलाता
सब मेरे
जीवन का हिस्सा
अँधेरे में भी क्या
कहाँ पडा
सब दिखता उसमें
एक अजीब सा सुकून
मिलता उसमें
मेरा कमरा
अब
रहने की जगह नहीं
जीने का
साधन हो गया
मेरा मन
उसमें बस गया
मोह
सिर्फ जीवों से होता
मेरा भ्रम टूट गया
चालीस
वर्षों से रहते रहते
मेरा
कमरा मेरा सबसे
करीबी रिश्तेदार हो गया
मेरा दिल कहता
जो आनंद निरंतर मुझे
मेरे कमरे में आता
वो कहीं और नसीब
ना होगा
उसके बिना जीवन
अधूरा लगेगा
31-05-2011
968-175-05-11

5/07/2011 12:15:00 am

Nirantar
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हर तरफ फ़ैली
गंदगी क्यों देखूं ?
भ्रष्टाचार के किस्से
क्यों सुनूं ?
मार काट की खबरें
क्यों पढूं ?
क्यों इंतज़ार किसी और
का करूँ ?
कोई और करेगा
यह सोच कर क्यों
बैठा रहूँ ?
औरों की तरह चुपचाप
देखता रहूँ
क्यों ना मैं ही पहल
करूँ ?
कुछ गंदगी मैं भी साफ़
करूँ
भ्रष्टाचार से लड़ाई लडूँ
निरंतर
बढ़ रही नफरत को
कम करूँ
सोते हुओं को
जगाऊँ
06-05-2011
818-25-05-11

4/21/2011 11:51:00 am

Nirantar
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बहुत
थका हुआ था
लेटते ही सो गया
नींद में खो गया
सपनों की दुनिया में
पहुँच गया
चाँद से मिलना हुआ
वो मुस्करा रहा था
उसने हाथ बढ़ाया
फिर गले से लगाया
मैंने हाथ मिलाया
फिर गले से लगा
हाथ मैं गर्माहट थी
मिलने में आत्मीयता थी
मुझे आश्चर्य हुआ
चाँद की ठंडक का पता था
गर्माहट का अंदाज़ ना था
मैंने
आश्चर्य से चाँद को देखा
गर्माहट का राज़ पूछा
चाँद ने जवाब दिया
ठंडक मेरी गयी नहीं
अब भी उतना ही ठंडा हूँ
जब भी मिलता हूँ
गर्माहट से मिलता हूँ
निरंतर
दिल खोल कर मिलता हूँ
चाँद की ठंडक का राज़
मुझे पता चल गया

4/17/2011 07:37:00 pm

Nirantar
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लोग मंदिर,
मस्जिद में मुझे ढूंढते
धर्म के ठेकेदारों से
पता मेरा पूंछते
निरंतर नए तरीकों से
मुझे खोजते
फिर भी मुझे पाते नहीं
मैं इंसान के दिल में रहता
ईमान और इंसानियत में
बसता
लालच से नफरत मुझे
सूरज बन
उजाला दिन में करता
रात को
चाँद बन कर निकलता
जो दिल से ढूंढता,
सिर्फ उसे मिलता
17-04-2011
696-120-04-11

4/12/2011 08:11:00 pm

Nirantar
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गुरु,शिष्य
दोनों राजनीति में थे
विचारों में
मतभेद बढ़ता गया
शिष्य,शिष्टता की सीमाएं
लांघता गया
गुरु के लिए निरंतर
अनर्गल बातें कहने लगा
विचारों में मतभेद को
दुश्मनी समझने लगा
मिलना जुलना बंद
कर दिया
शिष्य का परिवार
दुर्घटना का शिकार हुआ
शिष्य विदेश में था
गुरु को पता चला
फ़ौरन स्थल पर पहुँच
परिवार को अस्पताल
पहुंचाया
जब तक शिष्य विदेश से
नहीं लौटा
जी जान से सेवा
करता रहा
शिष्य को आते ही सब
पता चला
ग्लानि से भर गया
गुरु से मिलते ही रोने लगा
परिवार की जान
बचाने के लिए
धन्यवाद देने लगा
गुरु ने आशीर्वाद दिया
और कहा मतभेद रखो
मनभेद मत रखो
शिष्टता कभी ना भूलो
सुबह का भूला
शाम को भी लौट आये तो
भूला नहीं कहलाता
12-04-2011
656-89-04-11

4/04/2011 09:10:00 am

Nirantar
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पिताजी
बचपन में कहते थे
लोगों से मिला करो
हाल चाल जाना करो
अपनों को याद करा करो
चिठ्ठी पत्री लिखा करो
हाल अपना बताया करो
अच्छा साहित्य पढ़ा करो
मन को स्वस्थ रखा करो
बड़ों का सम्मान दिया करो
केवल अपना ना सोचा करो
चिंता सब की करा करो
शर्म लिहाज रखा करो
अब बच्चों से सुनता हूँ
मतलब हो तो मिला करो
चैटिंग से बात करा करो
एस ऍम एस भेज
काम चलाया करो
फेस बुक पर
हाल चाल बताया करो
इंटरनैट पर पढ़ लिया करो
उम्र की ना सोचा करो
छोटों,बड़ों को
बराबर समझा करो
जानो नहीं तो
बात भी ना करा करो
परवाह किसी की मत करो
निरंतर अपनी सोचा करो
खुल्लम खुल्ला प्यार करो
शर्म लिहाज को ताक़
में रखो
04-04--11
592—25 -04-11