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शनिवार, 2 अप्रैल 2011

महाभारत के सभी विजेताओ को हार्दिक शुभकामना







                        आप सभी को हार्दिक बधाई व शुभकामना 

गुरुवार, 31 मार्च 2011

महाभारत 2011 {प्रथम} की विजेता शिखा कौशिक और शालिनी कौशिक

 इस घोषणा को मैं मोमेंटो के साथ करना चाहता था. पर आवश्यक था, 
क्यों ...? पहले इसे पढ़े. ......
४  जजों में  दो ने भाग नहीं लिया, दो जजों को फैसला देना था जो आपस में लेखन के  चिर प्रतिद्वंदी है.. दोनों जजों के विचार कभी मेल नहीं खाते. अगर किसी पोस्ट पर खाए भी तो कुछ न कुछ विरोधाभास अवस्य रहा. डॉ. अनवर जमाल खान और डॉ. श्याम गुप्ता. 

सबसे पहले जवाब आया डॉ. गुप्ता जी का........ 
प्रिय हरीश जी----                           
                      प्रेम -महाभारत...फ़ैसला....( डा श्याम गुप्त )
           बहुत सुन्दर सुन्दर , विचाररपूर्ण, तार्किकता, भावना से भरपूर व  ग्यान के आलोक से प्रकाशित आलेख लिखे गये । प्रेम पर इतने अच्छे कथनों को पढवाने के लिये  हरीश जी तो  बधाई के पात्र हैं  ही, सभी प्रतियोगी भी बधाई के पात्र हैं।
              प्रियन्का, अमित तिवारी, अवनीश व मन्गल यादव सभी ने बहुत अच्छा लिखा परन्तु  आलेख वास्तव में सिर्फ़ कथोपकथन नहीं होते बिना उदाहरणों के उनमें स्पष्टता व वैचारिक संगतता नहीं आपाती ,वे एक नीरस वर्णन की भांति लगते हैं।  अत्यंत संक्षिप्त आलेख भी सिर्फ़ रटे रटाये कथन या स्वकथन मात्र लगते हैं । अधिकांश ने दिये हुए शीर्षक का भी प्रयोग नहीं किया।  सौरभ दुबे जी का आलेख भी अत्यन्त सुन्दर बन पडा है परंतु सिर्फ़ विवरणात्मकता तक ही सीमित रहने के कारण मेरे विचार से तीसरे स्थान तक आपाया ।
          मुझे मुख्य प्रतियोगिता  शालिनी व शिखा जी के आलेखों में प्रतीत हुई एवं द्वन्द्वात्मक स्थिति में दोनों में निर्णय करना कठिन था। दोनों आलेख श्रेष्ठ व उच्चकोटि के हैं । जहां शालिनी जी के आलेख में वैग्यानिक तार्किकता व साहित्यिक्ता व उद्धरणों के सौन्दर्य का भरपूर संयोजन है वहीं शिखा जी के आलेख में भी साहित्यिक तार्किकता, उच्चकोटि के उद्धरण-सुषमा, वैचारिकता, दर्शन, वैग्यानिकता,सामाजिक विग्यान जीवन से जुडे वक्तव्यों का सौन्दर्य भी परिलक्षित है । अतः मुझे वह अधिक समीचीन जान पडा । अतः शिखाजी का आलेख में सबसे ऊपर रखता हूं । इस प्रकार मेरे विचार से  प्रथम तीन आलेख इस प्रकार हैं....
    प्रथम---शिखा कौशिक जी..
    द्वितीय...शालिनी कौशिक जी
    त्रितीय....सौरभ दुबे जी ...

                                                          ---डा श्याम गुप्त...
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अब डॉ. अनवर जमाल साहब........ 
प्यारे भाई हरीश जी ! मैंने आपके द्वारा भेजे गए सात लेख पढ़े और उन्हें मोटे तौर पर दो चीज़ों को आधार बनाकर परखा ।
1. लेख की भाषा शैली कैसी है ?
2. लेख अपमेरा फ़ैसला : शालिनी कौशिक जी का लेख सर्वश्रेष्ठ है
ने विषय को कितना स्पष्ट कर पाया है ?
पहले बिन्दु को मैंने भाषा-शैली का शीर्षक दिया और दूसरे बिन्दु को भाव का। अब मैं आपको सातों लेख के बारे में बताता हूं कि मैंने उन्हें अपनी नज़र में कैसा पाया ?
सभी लेख अच्छे हैं और प्रेम के किसी न किसी कोण को सामने रखते हैं और अच्छे लगते हैं। सभी प्रशंसा के हक़दार हैं लेकिन बात प्रतियोगिता की है तो किसी न किसी को तो श्रेष्ठ कहना निर्णायक की मजबूरी है। लिहाज़ा मैंने पाया कि सभी लेखकों की भाषा-शैली सुबोध है और पाठक उनके मंतव्य को आसानी से समझ सकता है।
लेकिन जब मैंने भाव की दृष्टि से लेखों को परखा तो वे दो हिस्सों में बंट गए-
पहले हिस्से में तो शिखा कौशिक जी , प्रियंका राठौर जी, अमित तिवारी जी और अवनीश कुमार जी के लेख आते हैं
और
दूसरे हिस्से में शालिनी कौशिक जी, मंगल यादव और सौरभ दुबे के लेख आते हैं।
पहले हिस्से में जो लेख आते हैं वे भाव की दृष्टि से मध्यम हैं जबकि दूसरे हिस्से में जो लेख आते हैं वे भाव की दृष्टि से उत्तम हैं ।
अब मुझे इन तीन उत्तम लेखों में से एक श्रेष्ठ को चुनना था तो मैंने देखा कि शालिनी कौशिक जी ने अपने लेख में न सिर्फ़ विषय को पूरी तरह खोलकर बयान किया है बल्कि अपने लेख में साहित्यिक तर्कों के साथ वैज्ञानिक अन्वेषण का समावेश भी किया है जिससे उसकी उपयोगिता भी बढ़ गई है और वह सामयिक समस्याओं का एक हल भी पेश करता है।
मेरा निर्णय आपके विचारार्थ सादर प्रेषित है।
इज़्ज़त अफ़ज़ाई के लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार हूं।
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मैं दुविधा में था, भाई रियल्टी शो में भी वोट का जमाना है तो हमने भी वोट के लिए सभी के पास भेजा पर किसी का जवाब नहीं आया. फिर आज हमने डॉ. गुप्ता जी की पोस्ट पढ़ी. आप भी देंखे....

दो प्रेरक विचार....डा श्याम गुप्त.....

और हमने फैसला ले लिया ...

वास्तव में जजों के समक्ष क्या स्थिति होगी आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं. इस मंच की नीव प्रेम पर रखी गयी थी. और उसी प्रेम देन थी की  इतने अल्पसमय में लोग हमारे इतने समर्थक हो गए. उसी भावना का ख्याल रखते हुए हम दोनों जजों का सम्मान करते हैं. और महाभारत २०११ प्रथम का विजेता बहन शिखा और शालिनी कौशिक को घोषित करते हैं. और बाकी सभी प्रतिभागियों को उपविजेता. ताकि हमारे परिवार में द्वेष या ईर्ष्या नहीं. प्रेम का पग बढे...

अनवर भाई को को जिम्मेदारी और मुझे एक माह की छुट्टी.

सीधी और खरी बात.

हम पूरे परिवार सहित इस समय काफी तनाव में है. मेरे २५ वर्षीय भतीजे उपेन्द्र सिंह को छः माह पूर्व मुह में कैंसर हुआ था.. टाटा मेमोरियल मुंबई में आप्रेसन के बाद इलाहबाद में सेंकैया भी हुई.. अब दुबारा लीवर और फेफड़े में संक्रमण है. टाटा मेमोरियल से जवाब हो गया, दो अप्रैल को वह वापस आ रहा है अब उसे लेकर हम रामदेव के आश्रम हरिद्वार जायेंगे. इस बीच "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" से कई दिन दूर रहना पड़ेगा. मंच की सारी जिम्मेदारी मिथिलेश द्विवेदी. और हमारे युवा सहयोगी योगेन्द्र पाल पर.. साथ ही महाभारत की जिम्मेदारी बड़े भाई डॉ. अनवर जमाल के मजबूत कंधे पर. महाभारत २०११ द्वितीय का विषय. निर्णायक मंडल, फैसला व घोषणा सब. अनवर भाई आपको याद होगा मैंने कहा था इस मंच का कोई अध्यक्ष नहीं होगा. हमारा मकसद कुछ और है. हम प्रति माह जिम्मेदारिया बदलेंगे. यह पहली शुरुवात है. अनवर भाई आप इंकार भी करेंगे तो मैं एक माह बाद ही पढूंगा. पर मैं जनता हु आप हार नहीं मानते और फ्रेश होकर भी आ गए हैं. मेरे लिए दुआ करिए. प्रणाम, खुदा हाफिज़.........  आपका भाई हरीश सिंह. {योगेन्द्र जी मंच का नियम तोड़ने के लिए हम माफ़ी चाहते हैं. आप सम्भाले .............

सूचना ---- आप सभी विजेता व उपविजेता. शिखा कौशिक, शालिनी कौशिक, सौरभ दुबे, प्रियंका राठौर, अमित जी, अवनीश व मंगल जी. यदि आप पोस्ट मांगने का पता भेंज दे तो आपका प्रमाण पत्र भेज दिया जायेगा, बाकी पोस्ट पर प्रकाशित होगा ही. अपना पता हमें. editor.bhadohinews@gmail.com  पर भेंजे. 

सोमवार, 14 मार्च 2011

"प्रेम"....

प्यार, प्रेम, प्रीति, जिसको व्याख्यायित करने के लिए लम्बे चौड़े वाक्यों की जरूरत नहीं . प्रेम तो सिर्फ अनुभूति है जों समर्पण के रूप में ही नजर आती है ,चाहे वह रिश्तों के बंधन के रूप में हो या रिश्तों से परे....

अहसासों में बसता है ,
निगाहों से बयाँ होता है ,
निशब्द बंधन है ,
पर रिश्तों से परे है ,
शायद -
यही प्यार है ,
जो दिखाया नहीं जाता ,
दिख जाता है ,
लम्हों में सिमट जाता है ,
रूह की झंकार है ,
जीवन की आस है ,
भावों का गुंथन है ,
हाँ -
यही प्यार है ,
जो शब्दों से परे ,
अभिव्यक्ति है समर्पण रूप ......!!

जब समर्पण रूपी प्रेम व्यष्टि से समष्टि की ओर अग्रसित होता है तो यही सामाजिक चेतना में बदल जाता है  और समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ एक जन आन्दोलन खड़ा हो जाता है .

चिर संघर्षरत मेरा जीवन ,
हर पल कुर्बानी मेरा जीवन !!

कभी हालात से ,
कभी खुद से ,
सामंजस्य स्थापित कर ,
चिर संतोषमय मेरा जीवन !!

फूलों को अंगार में ,
जीवन के व्यापार में ,
बदलते देख ,
चिर चिन्तनमग्न मेरा जीवन !!

शोडित की पुकार ,
क्रंदित का आर्तनाद ,
समाज का वीभत्स रूप ,
चिर समर्पणरत मेरा जीवन !
चिर संघर्षरत मेरा जीवन !!




प्रियंका राठौर

शनिवार, 12 मार्च 2011

प्रेम का जीवन में वास्तविक महत्व और सच्चे प्रेम का स्वरुप

प्यार है पवित्र पुंज ,प्यार पुण्य धाम है.
 पुण्य धाम जिसमे कि राधिका है श्याम  है .
श्याम की मुरलिया की हर गूँज प्यार है.
प्यार कर्म प्यार धर्म प्यार प्रभु नाम है."
   एक तरफ प्यार को "देवल आशीष"की उपरोक्त पंक्तियों से विभूषित किया जाता है तो एक तरफ प्यार को "बेकार बेदाम की चीज़ है"जैसे शब्दों से बदनाम किया जाता है.कोई कहता है जिसने जीवन में प्यार नहीं किया उसने क्या किया?प्यार के कई आयाम हैं जिसकी परतों में कई अंतर कथाएं    छिपी हैं .प्रेम विषयक दो विरोधी मान्यताएं हैं-एक मान्यता के अनुसार यह व्यर्थ चीज़ है तो एक के अनुसार यह  जीवन में सब कुछ है .पहली मान्यता को यदि देखा जाये तो वह भौतिकवाद  से जुडी है .जमाना कहता है कि लोग प्यार की अपेक्षा दौलत को अधिक महत्व देते हैं लेकिन यदि कुछ नए शोधों पर ध्यान दें तो प्यार का जीवन में स्थान केवल आकर्षण तक ही सीमित  नहीं है वरन प्यार का जीवन में कई द्रष्टिकोण  से महत्व है .न्यू   हेम्पशायर विश्व विध्यालय के प्रोफ़ेसर एडवर्ड लीमे और उनके येल विश्व विध्यालय के साथियों ने शोध में पाया कि जिन लोगों को दुनिया में बहुत प्यार और स्वीकृति मिलती है वे भौतिक वस्तओं को कम तरजीह देते हैं.वे लोग जिन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें लोग ज्यादा प्यार नहीं करते और अपना नहीं मानते ,वे भौतिक चीजों से ज्यादा जुड़े होते हैं .शोध कर्ताओं ने १८५ लोगों पर शोध किया और पाया कि दूसरी तरह के लोग ,पहली तरह के लोगों के मुकाबले वस्तओं को पांच गुना महत्व दे रहे थे .इसका सीधा साधा अर्थ यह है कि जिन्हें जीवन में प्रेम और जुडाव की कमी ज्यादा महसूस होती है वे चीज़ों के प्रति ज्यादा लगाव महसूस करते हैं या उनमे असुरक्षा की भावना होती है जिसे वे भौतिक उपलब्धियों के जरिये पूरा करने की कोशिश करते हैं .जाहिर है कि जिसको यह लगता है कि आसपास के लोग उसे प्यार नहीं करते या उसे अपना नहीं मानते वह असुरक्षित महसूस करने लगता है और तब उसे लगेगा कि दुनियावी चीज़ें ही उसे सहारा और सुरक्षा दे सकेंगी.
               अमेरिका के स्टेनफोर्ड विश्व विध्यालय के एक हालिया शोध में पता चला है कि प्रेम के कारन उपजे दर्दे दिल का इलाज भी प्रेम की अनुभूति से ही होता है .शोधकर्ताओं ने कुछ छात्रों को हल्का शारीरिक दर्द पहुंचाते हुए उनकी प्रतिक्रियाएं रिकोर्ड   की .गौरतलब है कि अधिकांश छात्र प्रेम की शुरूआती अवस्था में थे ,और पाया कि छात्रों के सामने उनके प्रेमी या प्रेमिका की तस्वीर रखने पर उनका ध्यान मामूली सा बँटा .शोध में सभी छात्रों के मस्तिष्क का स्कैन  किया गया  था .शोध में शामिल डॉ.जेरेड यंगर का कहना है "कि प्रेम एक दर्द निवारक का भी काम करता है."
      असलम कोल असली ने कहा है-
"कभी इश्क करो और फिर देखो,
इस आग में जलते रहने से
कभी दिल पर आंच नहीं आती
कभी रंग ख़राब नहीं होता."
   प्रेम के बारे में कवि, दार्शनिक,प्रेमीजन आदि ऐसे विचार व्यक्त करते ही रहे हैं किन्तु प्रेम न  सिर्फ कलाकारों,लेखकों और दार्शनिकों को प्रेरित करता है अपितु आम इंसानों की रोजमर्रा की जिन्दगी में आने वाली परेशानियों से और तनावों से उबरने में भी मदद करता है .वाशिंगटन पोस्ट ने एक शोध के बारे में बताते हुए कहा कि यदि हमारा करीबी भावनात्मक संबल या सलाह दे तो नकारात्मक विचारों या तनाव  से आसानी से  उबरा जा सकता है .शोध के दौरान उन्होंने पाया कि एक खुशहाल दंपत्ति का ब्लड  प्रेशर अविवाहित लोगों के मुकाबले कम था .हालाँकि बुरे वैवाहिक संबंधों से गुजर रही जोड़ी का ब्लड प्रेशर सबसे ज्यादा पाया गया.प्रेम सम्बन्ध जिन्दगी को मायने और अर्थ देते हैं .एरोन ने पाया कि "प्यार का एहसास मस्तिष्क के डोपेमायीं रिवार्ड सिस्टम को सक्रिय कर देता है  .ख़ुशी और प्रेरणा जैसी भावनाओं के लिए दिमाग का यही हिस्सा जिम्मेदार है.
       प्रेम के क्षेत्र में बाधा बनकर आज "एड्स "भी उपस्थित हुआ है  किन्तु इस बीमारी के लिए भी कहा जाता है  कि "एड्स के रोगी को नफरत नहीं प्यार दीजिये,इससे उसकी उम्र बढ़ेगी रोग घटेगा."इस बात की पुष्टि की है  स्वित्ज़रलैंड स्थित वेसल इन्स्तितुत  फार क्लिनिकल एपिड़ेमोलोज्य ने.रिपोर्ट के अनुसार अगर एड्स प्रभावित रोगी प्यार पाए ,रोमांस करे तो उसकी जीवन अवधि बढ़ जाती है  .शोधकर्ता डॉ.हेनर सी.बचर ने अपने प्रयोग को एक बड़े समूह पर किया .हैरान करते परिणाम यह थे कि जो रोगी घबराये हुए थे और जीने की आस छोड़ चुके थे उनमे न केवल जीने की लालसा बढ़ी बल्कि वे नई स्फूर्ति से भर गए.शोधकर्ता का मानना  है  कि उनके परिक्षण इस बात की पुष्टि करते हैं कि "प्यार और स्वास्थ्य साथसाथ चलता है ."
  इस प्रकार देखा जाये तो प्रेम ही जीवन  ऊर्जा का शिखर है  जिसने प्रेम को जान लिया उसने सब जान लिया,जो प्रेम से वंचित रहा वह सबसे वंचित रह गया .प्रेम का अर्थ है  समर्पण की दशा जहाँ दो मिटते है  और एक बचता है  .जिसे अपने लक्ष्य से,सहस से ,उद्देश्य से जरा भी प्रेम है  वह स्वयं को मिटा देता है  .यही सच्चा प्रेम है  रही और मंजिल एक हो जाते हैं .जीवन आनंद की सच्ची रह वहीँ से निकलती है  .कबीर ने भी कहा है -
"प्रेम न हाट बिकाय"
     अर्थात प्रेम किसी बाज़ार में नहीं बिकता.प्यार के मायने बदल सकते हैं किन्तु सच्चे प्रेम का स्वरुप कभी नहीं बदल सकता.सच्चा प्रेम वह महक है  जो हर दिशा को महकाती है  .सच्चे प्रेम को तलवार की धार कहा जाता है  और हर किसी के बस का इस पर चलना नहीं होता.इसलिए सच्चा प्रेम कम ही दिखाई देता है .वर्तमान युवा पीढ़ी प्रेम की और अग्रसर  है  किन्तु उसके लिए सच्चे  प्रेम का स्वरुप कुछ अलग है  .होटल मैनजमेंट   कर रही पारुल के अनुसार-"प्रेम को मैं तलवार की धार नहीं मानती हूँ  पर हंसी  खेल  भी नहीं मानती हूँ .मेरा  मानना है  कि ये  एक देवी  एहसास  है  जिसे सिर्फ  महसूस  किया जा  सकता है  ,व्यक्त  नहीं किया जा  सकता है ."
पल्लवी  कहती   हैं-"प्रेम करना  आसान  लग  सकता है  पर यह निभाना  उतना  ही मुश्किल  है .ये  एक ऐसा  करार  है   जो कभी ख़त्म  नहीं होता है  ."
 ये  तो प्रेम का एक रूप  है  .प्रेम तो कई  स्वरूपों  में ढला  है .देश  प्रेम,प्रभु  प्रेम.मानव  प्रेम,मात्र -प्रेम पितृ  प्रेम,पुत्र  प्रेम आदि  इसके  अनेको  स्वरुप हैं.प्रभु  ईसा  मसीह  ने सभी  प्राणियों , अपने पड़ोसियों  आदि  से प्रेम का सन्देश  दिया .गुरु  नानक  ने प्रेम करने  वालो  को सारी  दुनिया  में बिखर  जाने   का आशीर्वाद  दिया  ताकि  वे प्यार को सारेजहाँ  में फैला  सकें .सभी  धर्मो  के गुरु  जन प्राणी  मात्र   को प्रेम का सन्देश  देते  हैं और आपस  में मिलजुल  कर रहने  की शिक्षा  देते  हैं.उनका  भी मानना है  कि प्रेम वह है  जो अपने प्रिय  के हित  में सर्वस्व  त्याग  करने  को तैयार  रहता  है  .प्यार त्याग  करता  है  बलिदान  नहीं मांगता .प्रेम की ही महिमा  को हमारे  कविजनो  ने  अलग अलग तरह  से वर्णित  किया है    -
देश -प्रेम
"जो भरा  नहीं  भावों  से बहती  जिसमे  रसधार  नहीं ,
वह ह्रदय  नहीं है  पत्थर  है  जिसमे  स्वदेश  का प्यार  नहीं ."
मानव  प्रेम-
"यही  प्रवर्ति  है  जो आप  आप  ही चारे  ,
मनुष्य  है  वही  जो मनुष्य  के लिए मरे."
प्रेमी जनों  का प्यार यहाँ देखिये-
"जब जब कृष्ण की बंसी बाजी  निकली राधा सज के 
जन अजान का ध्यान भुला के लोक लाज को तज के ,
वन वन डोली जनक दुलारी पहन के प्रेम की माला,
दर्शन जल की प्यासी मीरा पी गयी विष का प्याला."
मात्र पितृ भक्ति कहे या मात्र पितृ प्रेम -इसके वशीभूत हो श्रवण कुमार माता पिता को कंधे पर बिठाकर तीर्थ यात्रा करते हैं,पितृ भक्ति में परशुराम माता का गला काट देते हैं,मात्र भक्ति में श्री गणेश भगवान भोलेनाथ से अपना मस्तक कटवा देते हैं और पुत्र प्रेम में माँ पार्वती भयंकर रूप धारण करती हैं और गणेश को भोलेनाथ से पुनर-जीवन दिलवाकर उन्हें देवताओं में प्रथम पूज्य के स्थान पर विराजमान कराती हैं.
  सच पूछा जाये तो दुनिया की समस्त समस्याओं का हल प्रेम में है.अनादर,उपेक्षा,द्वेष,ईर्षा और अंधी स्पर्धा की मारी हुई इस दुनिया में हर व्यक्ति हर प्रसंग एक बिदके हुए घोड़े की तरह हमारा वजूद कुचलने को उद्धत घूम  रहा हो तब आहत अहम् पर यह  कितना बड़ा मरहम है की कोई तो है जो मेरी कद्र करता है,कोई तो है जिसकी आँखों में मुझे देख चमक पैदा होती है .मुझे देखकर जो मेरी भलमन साहत पर प्रश्न चिन्ह   नहीं लगाता.
  इस तरह यदि हम विचार करें तो प्रेम का जीवन में वास्तविक महत्व जीवन अस्तित्व से है और अस्तित्व ऐसा की -
"हज़ार बर्फ गिरें लाख आंधियां चलें
वो फूल खिलकर रहेंगे जो खिलने  वाले हैं,"
प्यार से बढ़कर कुछ नहीं और सच्चा  प्रेम वही  है जो रोते को हंसी दे ,गिरते को उठने की ताक़त दे
मरणासन्न व्यक्ति में   जान फूँक दे.सच्चे प्रेम की महक  यह    संसार महसूस करता है और सच्चे  प्रेम के आगे ये दुनिया झुकती है.सच्चा प्रेम  समस्याएँ मिटाता है चाहे दिलों की हों या देशों की.बलिउद्दी देवबंदी ने कह है-
"फैसले सब के होते   नहीं तलवार से ,
प्यार से भी मसलों का हल   निकलता है." 
       शालिनी कौशिक
http://shalinikaushik2.blogspot.com/


शुक्रवार, 11 मार्च 2011

प्रेम क्या है? (what is Love?)


प्रेम क्या है?
एक छोटा सा प्रश्न लेकिन अनेक उत्तर. एक ऐसा प्रश्न जिसके लिए हर किसी के पास अपना एक अलग उत्तर है. जिस जिस से पूछा जाए वह इसके लिए कुछ अलग उत्तर दे देता है. सबकी अपनी परिभाषाएं हैं प्रेम को लेकर. बहुत बार बहुत सी विरोधाभाषी परिभाषाएं भी.
मैं सोच रहा हूँ कि क्या प्रेम वास्तव में ऐसा है कि जिसकी कोई नियत परिभाषा ही नहीं बन पायी है. क्या प्रेम सचमुच ही ऐसा है कि इसका स्वरुप देश-काल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होता रहता है? क्या प्रेम का अपना कोई स्वरुप, अपनी कोई पहचान नहीं है?
क्या वास्तव में लोगों की भावनाओं के अनुरूप रूप ग्रहण कर लेना ही प्रेम का स्वरुप है? क्या प्रेम व्यक्तिगत या वस्तुगत हो सकता है? जिसके नाम पर हर रोज़ इतनी घृणा फैलाई जा रही है, क्या वही प्रेम है? क्या प्रेम महज एक दैहिक अभिव्यक्ति से अधिक कुछ भी नहीं? क्या किसी विपरितलिंगी के प्रति मन में उठ रही भावनाएं ही प्रेम हैं?
कदापि नहीं !!!
यह जो कुछ भी है वह प्रेम नहीं हो सकता. वह प्रेम हो ही नहीं सकता कि जो लोगों की भावनाओं के अनुरूप रूप ले लेता हो. वह प्रेम कदापि नहीं हो सकता है जिसके मूल में ही घृणा पल रही हो. प्रेम तो स्वयं एक सम्पूर्ण भाव है. प्रेम किसी के चरित्र का हिस्सा नहीं वरन स्वयं में एक पूर्ण चरित्र है.
प्रेम तो कृष्ण है, वह कृष्ण जिसके पाश में बंधकर गोपियाँ-ग्वाले और गायें सब के सब चले आते हैं.
प्रेम तो राम है, वह राम जिसके पाश में कोल-किरात भील सभी बंधे हुए हैं.
प्रेम तो ईसा है, वह ईसा जो मरते समय भी अपने मारने वालों के लिए जीवनदान की प्रार्थना करता है.
प्रेम बुद्ध है, वह बुद्ध जिसकी सैकड़ों साल पुरानी प्रतिमा भी करुणा बरसाती सी लगती है.
प्रेम बस प्रेम है.
प्रेम पुष्प की वह सुगंध है, जो बिना किसी भेद के सबको आह्लादित कर दे. प्रेम की गति सरल रेखीय नहीं है. प्रेम का पथ वर्तुल है. वह अपनी परिधि में आने वाले हर जीव को अपनी सुगंध से भर देता है. प्रेम करने का नहीं, वरन होने का भाव है. प्रेम स्वयं में होता है. प्रेम किसी से नहीं होता है, वरन वह किसी में होता है और फिर जो भी उस प्रेम की परिधि में आता है उसे वह मिल जाता है, बिना किसी भेद के. प्रेम किसी भी प्रकार से व्यक्ति-केन्द्रित भाव नहीं है.
यह कहना कि "मैं सिर्फ तुमसे प्रेम करता/करती हूँ." इस से बड़ा कोई झूठ नहीं हो सकता है.
लेकिन फिर ऐसे में यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि आखिर वैयक्तिक रूप से अपने किसी निकटवर्ती साथी, सम्बन्धी, मित्र या किसी के भी प्रति मन में उठने वाली भावना क्या है?
वह निस्संदेह प्रेम नहीं हैं, वरन प्रेम से इतर भावनाएं हैं, जिन्हें प्रेम मान लिया जाता है. प्रेम को समझने से पहले हमें कुछ शब्दों के विभेद को भी समझ लेना होगा.
प्रेम, प्यार, मोह (मोहब्बत) और अनुराग (इश्क) परस्पर समानार्थी शब्द नहीं हैं, बल्कि इनके अपने अर्थ और अपनी मूल भावनाएं हैं.
प्रेम शक्ति चाहता है, (Prem seeks Power )
प्यार को अपनी अभिव्यक्ति के लिए काया चाहिए. ( Pyar seeks Body ).
मोह (मोहब्बत) माधुर्य चाहता है, (Moh seeks Maadhurya ).
अनुराग (इश्क) आकर्षण चाहता है. ( Anurag seeks Attraction ).
प्रेम शक्ति चाहता है. यह शक्ति शरीर की नहीं, मन की शक्ति है. एक कमजोर व्यक्ति सब कुछ तो कर सकता है. वह विश्व-विजयी हो सकता है, प्रकांड विद्वान् हो सकता है, परन्तु उसमे प्रेम नहीं हो सकता है.
प्रेम का मूल निर्मोह है. निर्मोह के धरातल पर ही प्रेम का बीज अंकुरित होता है. निर्मोह की शक्ति के बिना प्रेम की प्राप्ति नहीं हो सकती है. पुष्प अगाध और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है. वह प्रेम रुपी सुगंध बिना किसी भेद के फैलाता है, लेकिन कभी किसी के मोह में नहीं आता. कोई दिन-रात बैठकर पुष्प के सुगंध की चर्चा करता रहे, लेकिन फिर भी पुष्प उसके मोह में नहीं आता. वह उसके जाने के बाद भी उसी प्रकार सुगंध फैलाता रहता है. वह एक निश्छल बालक के लिए भी उतना ही सुगन्धित होता है, जितना कि किसी भी अन्य के लिए.
प्रेम प्राप्ति का माध्यम नहीं है. प्रेम बंधन भी नहीं है. प्रेम तो मुक्त करता है. प्रेम जब अंकुरित हो जाता है तब प्राणिमात्र के बीच भेद नहीं रह जाता.
किसी की माँ को गाली देने वाला, अपनी माँ से प्रेम नही कर सकता. किसी भी स्त्री का अपमान करने वाला, अपने परिवार की स्त्रियों से प्रेम नहीं कर सकता. किसी के बच्चे पर हाथ उठा रही माता को अपने पुत्र से मोह तो हो सकता है, लेकिन उसके मन में सहज प्रेम नहीं हो सकता.
प्रेम जब होता है, तब सिर्फ प्रेम ही होता है. प्रेम किसी से नहीं होता है, प्रेम किसी में होता है, ठीक वैसे ही जैसे कि पुष्प की सुगंध हमसे या आपसे नहीं है, वह पुष्प में है, जो सबके लिए है.
बस यही प्रेम है.

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद
(09266377199)

प्रेम हर किसी के अंदर है--- अवनीश कुमार

प्रेम एक ऐसा शब्द जिसे हर कोई सुनता है और हर किसी के लिए इसके मायने भी अलग-अलग है। अगर हम अपनी मां के प्रेम के बारे में सोचें, तो उसका अलग आनन्द है, लेकिन अगर हम अपनी प्रेमिका के प्रेम के बारे में बात करते हैं, तो हमारी अलग सोच होती है। प्रेम को हम अलग-अलग रूप से देखते है।ईश्क और मोहब्बत करना प्रेम नहीं है।
प्रेम हर कोई करता है, सिर्फ औरत व पुरूष का संबंध ही प्रेम नहीं है। प्रेम किसी भी रूप में किसी से भी हो सकता है। मेरी नजर में प्रेम की एक परिभाषा है,किसी को भी सच्चाई, ईमानदारी,विश्वास, निस्वार्थ भाव से किसी का किसी को भी चाहना प्रेम हो सकता है।
प्रेम हर किसी से हो सकता है। पृथ्वी पर उपस्थित या पृथ्वी से बाहर की किसी भी जीव व वस्तु के प्रति सम्मोहन प्रेम हो सकता है। प्रेम किसी से लेने का नहीं देने का नाम होता है। इसी तरह यदि हम वृक्षों को बचाने के बारे में सोचते है, तो उनके प्रति यह हमारा प्रेम है। लेकिन आजकल प्रेम के मायने बदल गये हैं। हमारे जीवन से प्रेम गायब होता जा रहा है। हम लोगों में से ज्यादातर लोग प्रेम को केवल स्त्री-पुरूष के संबंध में देखते हैं, लेकिन यह बिल्कुल निरर्थक सोच है। हम अपने घर पर कोई भी जानवर पालते हैं, उसकी हम सेवा करते है। वह भी प्रेम का ही एक रूप है। हम भगवान को मानते व पूजते है, वह भी प्रेम का ही एक रुप है। हम अपने बच्चों व परिवार से प्रेम करते है। वह प्रेम है, हम अपने दोस्तों का महत्तव अपनी जिन्दगी में समझते है। वह भी प्रेम है।अगर हम देखें तो हमारा पूरा जीवन प्रेम से भरा हुआ है। बस हमें इसे पहचानने की जरूरत है..


यह पोस्ट अवनीश कुमार द्वारा भेजी गयी है..

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

मंगल यादव, नोएडा
प्रेम नाम सुनते ही मेरे दिल में एक अजीब सी गुदगुदी होती है। कितना प्यारा नाम है प्रेम। प्रेम ऐसा कि जो ईश्वर को भी भक्त का दास बनना पड़ता है। प्रेम ऐसा कि जो खतरनाक जानवरों को भी आदमी का गुलाम बनना पड़ता है। प्रेम ऐसा कि तोता भी आदमी जैसा बोलने लगता है। और आदमी कुछ भी सिखा देता है। प्रेम ऐसा कि हमें भी आप को अपना भाई कहने पर मजबूर कर देता है। प्रेम में इतना दम है कि गैर भी अपने हो जाते हैं। मेरे विचार से प्रेम वही है जो किसी के दिल में अपनी जगह बनाने में महत्वपूर्ण होता है।
इसे हम बेशक देख नही सकते लेकिन किसी को किसी से मिलते हुए देकर जरुर महसूस कर सकते हैं। शख्स कोई भी हो सकता है आदमी या जानवर। सच्चे प्रेम के स्वरुप पर मेरा मानना है प्रेम का स्वरुप अथाह है। इसका वर्णन करना प्रेम शब्द को नीचा करना होगा। उदाहरण के तौर पर प्रकृति का हमारे प्रति प्रेम अथाह है इसको कौन माप सकता है। इसे तो सिर्फ सच्चा प्रकृति प्रेमी ही बता सकता है। एक मां अपने पुत्र को देखने के लिए आतुर रहती है सदा उसकी कुशल मंगल की कामना करती है। एक सच्चा प्रेमी अपनी प्रेमिका के बगैर रह नही सकता है। सिर्फ प्रेम के स्वरुप के बारे में मां, लैला-मजनूं जैसा प्रेमी और भगवान का प्रहलाद जैसा भक्त ही कुछ बता सकता है वरना प्रेम को किसने देखा है। यह तो साक्षात् भगवान होता है। जो हर प्राणी और हर जगह विराजमान है।
प्रेम का हमारे जीवन में उतना ही महत्व है जितना कि खाने के लिए अनाज, पीने के लिए जल और जीने के लिए सांस लेना। प्रेम का महत्व तभी समझ में आता है जब अपना कोई खास हमसे दूर चला जाता है। और यदि बात न हो पाये तो विल्कुल समझ में आता है कि प्रेम आखिर है क्या चीज। प्रेम के बारे में बहुत सारे साहित्य भी लिखे गये हैं। आये दिन कहीं न कहीं विचार गोष्ठियां भी होती हैं। इसलिए मैं ज्यादा इस पर कुछ कहना नही चाहता हूं। इतना जरुर अपने पूर्वजों की बात दोहराना चाहता हूं कि यदि किसी को जीतना हो तो युद्ध नही प्यार करो...सिर्फ अलौकिक प्यार। कहते हैं न सच्चा हो तो मीलों की दूरियां यूं ही खत्म हो जाती हैं।
प्रेम का वास्तविक महत्व के बारे में केवल इतना ही कहना चाहूंगा जहां प्रेम नही है वहां मानवता नही है। जहां मानवता नही है वहां इन्सानियत नही है। जहां इन्सानियत नही है वहां मानव और जानवर में भेद करना मुश्किल है। जब प्रेम नही होगा तो संसार नही होगा। जब संसार नही होगा तो हम आप नही होगें। कहने का मतलब प्रेम से ही सृष्टि टिकी हुई है।
जीना है तो प्रेम कर ले..
अमर होना तो प्यार कर ले...
दुनिया गायेगी गुणगान तेरा
जो भी करना हो आज कर ले...।।
प्रेम एक ऐसी विद्या है जो कहीं नही पढ़ाई जाती। प्रेम करना सीखना हो तो प्रकृति से सीखिए। जो निश्चल और निस्वार्थ भाव से हमसे लगातार प्रेम कर रहा है। सूर्य ऊर्जा दे रहा है, चन्द्रमा शीतल रोशनी दे रही है, बादल पीनी दे रहा है और फूल सुगंध दे रहे हैं। और हम आप बदले में क्या दे रहें हैं किसी से छिपा नही है। प्रेम तो प्रेम है प्रेम का मोल कहां....।।

गुरुवार, 3 मार्च 2011

"प्रेम का जीवन में वास्तविक महत्व और सच्चे प्रेम का स्वरुप "............. सौरभ दुबे

प्रेम क्या है? प्रेम किसे कहते हैं? इसकी शुरुआत कहाँ से होती है ?इसके बारे में लोगो के अनेक मत हें मेरा तो यही मानना हें की जब दो लोग के दिल आपस में मिलते हें तो उनसे जो भाव उत्पन्न होता हें उसे प्रेम कहते हें,प्रेम में दोनों को एक दूसरे के  प्रति,ईमानदारी , कर्तव्यनिष्ठा , त्याग, सहानुभूति तथा सुख दुख मे भागीदारी की निःस्वार्थ भावना होनी चाहिए , लेकिन अहं एवं छलकपट की भावना कभी भी न हो| यही सच्चा प्यार है,इसे हम अगर आज प्रेम शब्द बोलेंगे तो लोग तुरंत इसका अर्थ लगा लेंगे प्रेमी -प्रेमिका के लिये लेकिन प्रेम के और भी प्रकार होते हे जैसे माँ का बेटे से ,पिता का पुत्र से ,बहन का भाई से आदि प्रेम के उदाहरण हें,प्रेम हमारे मन में तभी उत्पन्न होता हें जब हम किसी से मिलते हें या उससे दोस्ती करते हें यदि उसकी बातें हमारे दिल को छूती  हें तो हम अपने प्रेम को आगे बढ़ाते हें और धीरे-धीरे साथ जीने मरने का कसम भी खाते हें ,वैसे प्रेम एक एहसास हें जिसे रूह से  महसूस कीया जा सकता  हें , प्यार, जो हमारे संपूर्ण जीवन में विभिन्न रूपों में सामने आता है, जो यह एहसास दिलाता है कि जिन्दगी कितनी खूबसूरत है, डॉ. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'प्रेम' की व्याख्या कुछ इस तरह की है कि - 'प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है, प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।' सृष्टि में जो कुछ सुकून भरा है, प्रेम है। प्रेम ही है, जो संबंधों को जीवित रखता है। परिवार के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी सिखाता है,हाँ प्रेम चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है, वह तो शिशु-से सरल हृदय की वस्तु है,' सच्चा प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, बल्कि उसकी खुशियों के लिए बलिदान करता है, प्रिय की निष्ठुरता भी उसे कम नहीं कर सकती, वास्तव में प्रेम के पथ में प्रेमी और प्रेमिका दो नहीं, एक हुआ करते हैं, एक की खुशी दूसरे की आँखों में छलकती है और किसी के दुःख से किसी की आँख भर आती है,कोई भी प्यार तन से नही बल्कि मन से होती हें और इसमें वासना का स्थान कतई नही होता ,आज कल मै अक्सर एसा देख रहा हू की लोग प्यार के नाम पर सेक्स कर रहे   उसे प्यार का नाम दे रहे  हें,ये कैसा प्यार हे इसमें ना तो त्याग हें न ही कुछ हें कुछ हें तो सिर्फ वासना हें ,कुछ लोग तो प्रेमिका के वाह्य सुन्दरता पर आकर्षित होते हें ये कोई प्यार नही हें बल्कि हमारे मानसिक सोच के कारण हें ,मैंने दसवी कक्षा में एक पोएम पढ़ा था पोएम तो याद नही उसका अर्थ थोडा बहुत जरुर याद हें ,वह व्यक्ति जो अपनी प्रेमिका की बाह्य सुंदरता और उसके गालो और गुलाबी होठो  से प्यार  करता  है एवं शारीरिक सुंदरता वी वशीभूत होकर अपने प्रेम की अग्नि को प्रज्ज्वलित करता है , अर्थात उसकी सुंदरता को ही अपने प्रेम का आधार मानता है, ऐसे प्रेमी की प्रेम की अग्नि उस समय क्षीण हो जाती है, जब उसकी प्रेमिका बुढ़ापे की कैद मे जकड़ जाती है या फिर उस प्रेमिका से भी अधिक सुंदर कोई दूसरी उसके जीवन के दरवाजे पर दस्तक दे जाती है,
आजकल लव ऐट फ़र्स्ट साइटशब्द बहुत प्रसिद्ध है,जैसे की लोग किसी सुंदर लड़की को देखते ही कहते ही बोलेंगे की हमे उससे प्यार हो गया,ये प्यार थोड़ी ही हें ये तो आपको उसके खूबसूरती से प्यार हुआ हें,अगर यही प्यार हें तो हमे ऐसा प्यार दिन में सौ बार होता हें ,वैसे भी लोग कहते हें की सच्चा प्यार इन्सान को जीवन में एक बार ही होता हें,और मैंने भी देखा हें की अगर सच्चा प्यार हो जाये तो स्वर्ग  की पारी भी आ जाये तो वो भी उन्हें अच्छी नही लगती , प्रेम को प्रेम की तरह कीजिये ,वासना के लिये प्रेम करेन्गे तो प्रेम शब्द गाली की तरह लगेगी , प्रेम में नकारात्मक सोच के लिए कोई जगह नहीं होती। जो लोग प्यार में असफल होकर अपने प्रेमिका  को नुकसान पहुँचाने का कार्य करते हैं, वे सच्चा प्यार नहीं करते,प्रेम तो हो जाने वाली चीज है, किसी के खयालों में खोकर खुद को भुला देना, उसके सभी दर्द अपना लेना, स्वयं को समर्पित कर देना, उसकी जुदाई में दिल में एक मीठी चुभन महसूस करना, हर पल उसका सामीप्य चाहना, उसकी खुशियों में खुश होना, उसके आँसुओं को अपनी आँखों में ले लेना, हाँ यही तो प्यार है, इसे महसूस करो और खो जाओ उस 
सुनहरी अनोखी दुनिया में, जहाँ सिर्फ सुकून है।
            अंत में जहां प्रेम है, वही जीवन है
                                                                                    सौरभ दुबे  

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