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शुक्रवार, 8 मार्च 2013

महिला दिवस

जगत जननी नारी शब्द की व्याख्या असंभव है। इसलिए आज इस विशेष दिवस पर मेरी ओर से नारी शक्ति को शुभकामनाएँ।

मंगलवार, 15 मार्च 2011

सुदूर अंडमान में भी गूंजी नारी-सशक्तिकरण की आवाज़

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ (8 मार्च) पर पोर्टब्लेयर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का शुभारम्भ अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाए एवं चर्चित साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने दीप जलाकर किया। श्री यादव ने अपने उदबोधन में कहा कि - ‘‘नारी ही सृजन का आधार है और इसके विभिन्न रूपों को पहचानने की जरूरत है। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस इस तथ्य को उजागर करता है कि विश्व शान्ति और सामाजिक प्रगति को कायम रखने तथा मानवाधिकार और मूलभूत स्वतंत्रता को पूर्णरूप से हासिल करने के लिए महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, समानता और उनके विकास के साथ-साथ महिलाओं के योगदान को मान्यता प्रदान करना भी अपेक्षित है।‘‘
संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि एवं युवा लेखिका सुश्री आकांक्षा यादव ने महिला सशक्तीकरण को सिर्फ उपमान नहीं बल्कि एक धारदार हथियार बताया। बदलते परिवेश में समाज में महिलाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं आज राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, मीडिया, कला, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, ब्लागिंग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है। सदियों से समाज ने नारी को पूज्या बनाकर उसकी देह को आभूषणों से लाद कर एवं आदर्शों की परंपरागत घुट्टी पिलाकर उसके दिमाग को कुंद करने का कार्य किया, पर नारी की शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास के क्षितिज दिनों-ब-दिन खुलते जा रहे हैं, जिससे तमाम नए-नए क्षेत्रों का विस्तार हो रहा हैं।
पोर्टब्लेयर प्रधान डाकघर की पोस्टमास्टर श्रीमती एम. मरियाकुट्टी ने कहा कि-'' संविधान में महिला सशक्तीकरण के अनेक प्रावधान हैं पर दूरदराज और ग्रामीण स्तर तक भी लोगों को उनके बारे में जागरुक करने की जरूरत है। सुश्री सुप्रभा ने इस अवसर पर नारी की भूमिका के अवमूल्यन के लिए विज्ञापनों और चन्द फिल्मों को दोषी ठहराया जो नारी को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सुश्री शांता देब ने कहा कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ भगवान वास करते हैं, फिर भी नारी के प्रति समाज का रवैया दोयम है। सुश्री जयरानी ने उन महिलाओं पर प्रकाश डाला जो उपेक्षा के बावजूद समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने में सफल हुईं। इसके अलावा अन्य तमाम लोगों ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन जयरानी ने किया और आभार शांता देब ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में तमाम महिलाएं और प्रबुद्ध-जन उपस्थिति रहे।

मंगलवार, 8 मार्च 2011

सोच का सीमित दायरा

http://atulshrivastavaa.blogspot.com/
गुगल से साभार 
अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस है आज। आज के दिन महिलाओं की स्‍वतंत्रता और उनके अधिकारों को लेकर सरकारी और गैर सरकारी स्‍तर पर अनेक आयोजन होंगे। (ये अलग बात है कि सिर्फ आयोजन होंगे और जनता के पैसों पर नेता अफसर मौज उडाएंगे, होगा कुछ नहीं)। बीते युगों में नारी को देवी और शक्ति का प्रतीक बताया गया, आज भी  इसे हम मानते हैं पर  क्‍या सच में नारी को वो दर्जा मिल रहा है जिसकी वह हकदार है, सोचने वाली बात है।
आज के दिन मुझे याद आ रहा है एक किस्‍सा जो मेरे एक मित्र ने मुझे सुनाया था। लिंग समानता विषय पर एक एनजीओ के माध्‍यम से काम करने वाले मेरे एक मित्र ने मुझे यह किस्‍सा बताते हुए कहा था कि वह जब भी ऐसी किसी कार्यशाला में जाता है जहां महिलाओं के अधिकार और महिलाओं की स्‍वतंत्रता की बात होती है, यह किस्‍सा जरूर सुनाता है। किस्‍से  के माध्‍यम से मौजूद लोगों से सवाल करता है। उसके मुताबिक अक्‍सर जवाब सही नहीं मिलता।
किस्‍सा कुछ इस प्रकार है, ‘’  एक व्‍यक्ति अपने बेटे को मोटर सायकल में लेकर कहीं जा रहा होता है और उन दोनों का एक्‍सीडेंट हो जाता है। एक्‍सीडेंट में उस व्‍यक्ति की मौत हो जाती है और उसका बेटा गंभीर रूप से घायल हो जाता है। राह चलते लोग भीड लगा देते हैं लेकिन उस घायल बच्‍चे को उठाकर अस्‍पताल ले जाने की जहमत कोई नहीं उठाता। तभी उधर से एक थानेदार साहब गुजरते हैं। वे देखते हैं एक्‍सीडेंट हो गया है। वे पास जाते हैं। घायल पर उनकी नजर पडती है और वे यह देखकर दुखी हो जाते हैं कि घायल होने वाला बच्‍चा और कोई नहीं उनका अपना बेटा है। वे उसे तत्‍काल अस्‍पताल ले जाते हैं। अब बताईए बच्‍चे का पिता तो सडक हादसे में मृत हो जाते हैं तो  यह थानेदार साहब कौन है जो उस बच्‍चे को अपना बेटा कह कर अस्‍पताल ले जाते हैं।‘’
लोग इस कहानी में चक्‍कर में आ जाते हैं और बच्‍चे के पिता को लेकर भ्रम में पड जाते हैं, लेकिन किसी के दिमाग में नहीं आता कि बच्‍चे को अपना बेटा कहकर अस्‍पताल ले जाने वाले थानेदार साहब बच्‍चे की मां थीं। लोग लिंग भेद में इस कदर डूबे रहते हैं कि उनके सामने थानेदार के रूप में  मूछों वाले पुरूष का ही चेहरा दिखता है। एक महिला भी थानेदार हो सकती है, वे यह नहीं सोच पाते।
सालों से हम महिला दिवस मना रहे हैं। सरकारी और गैर सरकारी स्‍तर पर आयोजन होते हैं और महिलाओं की तरक्‍की, उत्‍थान को लेकर भाषण पढे जाते हैं लेकिन अमल नहीं होता। यह एक सवालिया निशान है समाज के लिए।
महिला दिवस पर बस इतना ही। नारी शक्ति को प्रणाम।

सोमवार, 7 मार्च 2011

मुझमे मैं भी रहती हूँ.. !! ( Where am I ?)

राधा-मीरा की बातों से कब तक मुझको बहलाओगे..?
मेरा भी अस्तित्व है कुछ.. क्या मान कभी ये पाओगे..?

क्या तुम ये स्वीकार सकोगे..मुझमे मैं भी रहती हूँ..?
तुम जब बातों में बहते हो..मुझमे मैं भी बहती हूँ..?

मैं माँ हूँ.. यह भी एक सच है, मैं बेटी भी होती हूँ..!
माना कि मैं मीरा भी हूँ, कृष्ण बिना मैं रोती हूँ !!

मैं प्रेयसी हूँ.. यह भी सच है, मैं भाग तुम्हारा आधा हूँ !
फिर भी तुमको लगता है, मैं स्वयं तुम्हारी बाधा हूँ !!

पहले भी तुमने छला मुझे, तुम अब भी तो छलते हो !
मैं जब भी आगे बढती हूँ, हाथ तभी तुम मलते हो !!

ना हूँ मैं पूजन की प्यासी.. न मात्र किताबी बातों की..!
जो सात वचन देती हूँ तुमको, इच्छित हूँ उन सातों की !!

स्वीकार करो यह सत्य महज, मैं बस इतना कहती हूँ.. !
बस तुम यह स्वीकार करो कि मुझमे मैं भी रहती हूँ.. !!

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

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