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मंगलवार, 7 जून 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य.. पंचम सुमनान्जलि(क्रमश:)...मानव धर्म --.----डा श्याम गुप्त

                         प्रेम किसी एक तुला द्वारा नहीं  तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है- पंचम -सुमनान्जलि..समष्टि-प्रेम ....जिसमें देश व राष्ट्र -प्रेम , विश्व-वन्धुत्व  व मानव-प्रेम निहित ...७ गीत व कवितायें ...... देव दानव मानव,  मानव धर्म,  विश्व बंधुत्व ,  गीत लिखो देश के,  बंदेमातरम ,  उठा तिरंगा हाथों  में  व  ऐ कलम अब छेड़ दो.... प्रस्तुत की जायेंगीं |  प्रस्तुत है .....द्वितीय कविता ...मानव धर्म...

धर्म   वही  तो   होता है,
जो  सबको धारण करता |
अपना बना व्यक्ति को वह,
उसको अनुशासित करता ||

सभी को एक समान समझ,
सब की ही सेवा करना |
सम्मति  से सबकी चलना,
अडिग सत्य पर रहना  ||

जीव मात्र से प्रेम करें ,
यह मानव धर्म सिखाता |
जीने की धारणा यही,
है जीवन धर्म कहाता ||

सिधु सरस्वती के तीरे ,
यह गाथा गयी सुनायी |
प्रजा वहाँ पर रहती थी -
जो, वह हिन्दू कहलाई ||

बातें यही मुहम्मद ने,
सब अपनों को समझाईं |
जिन लोगों ने समझी थी,
वे बने मुसलमां भाई  ||

यही विचारों का मंथन,
जब ईशा ने फैलाया |
उनका जो आदर करता ,
वह ईसाई कहलाया ||

हिन्दू, मुस्लिम, ,ईसाई-
सिख,मानव  रहा बनाता |
देश, काल सुविधानुसार ,
वह जीवन मर्म सजाता ||

हिल मिल रहें प्रेम से सब,
यह हमको धर्म सिखाता |
सब धर्मों में बसती है,
मानव धर्म की भाषा ||




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