
6/05/2011 06:33:00 pm

Nirantar
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इंसान के हाथ में
लालच की कुल्हाड़ी थी
कुल्हाड़ी की सत्ता थी
धन लालच के चक्कर में
बेरहमी से चल रही थी
सबसे बड़ा पेड़ घबरा गया
बाकी पेड़ों से कहने लगा
पहला वार मुझ पर होगा
तुम्हारा नंबर बाद में
आयेगा
हिम्मत ना हारना
जो किस्मत में लिखा
सहना होगा
अब इंसान भ्रष्ट हो गया
माँ बाप को भी नहीं
छोड़ता
पेड़ों को क्या छोड़ेगा
निरंतर
शोषण पेड़ों का किया
पानी को व्यर्थ बहाया
अब धरती को भी नहीं
छोड़ेगा
लालच में भूल गया
बिना पेड़ पानी के कैसे
जियेगा ?
05-06-2011
1001-28-06-11
(५ जून विश्व पर्यायवरण दिवस पर)

4/25/2011 10:57:00 pm

Nirantar
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क्यों मुझ पर हँसते हो?
मुझ से नफरत करते हो
बिना कारण दुःख देते हो
अपनी इच्छा से कैक्टस
नहीं बना
मुझे इश्वर ने ये रूप दिया
उसकी इच्छा का सम्मान करो
मुझ से भी प्यार करो
माली की ज़रुरत नहीं मुझको
स्वयं पलता हूँ
कम पानी में जीवित रहकर
पानी बचाता हूँ
जिसके के लिए तुम
सब को समझाते
वो काम में खुद ही करता
भयावह रेगिस्तान में
हरयाली का अहसास कराता
खूबसूरत फूल मुझ में भी खिलते
मेरे तने से तुम भोजन पाते
आंधी तूफानों को
निरंतर हिम्मत से झेलता
कभी किसी से
शिकायत नहीं करता
तिरस्कार सब का सहता
विपरीत परिस्थितियों में जीता हूँ
फिर भी खुश रहता हूँ
25-04-2011
763-183-04-11