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सोमवार, 28 अगस्त 2017

पत्रकार प्रेस क्लब (पीपीसी)की प्रदेश स्तरीय बैठक सम्पन्न


पत्रकार प्रेस क्लब (उत्तर प्रदेश) की प्रदेश स्तरीय बैठक आज दिनांक 27ध्08ध्17 को वाराणसी स्थित वाराणसी के जिलाण्यक्ष पवन पाण्डेय के आवास शिवम पैलेस पर सम्पन्न हुई। बैठक के मुख्य अतिथि प्रदेश अध्यक्ष घनश्याम पाठक रहे तथा अध्क्षता क्लब के वरिष्ठ प्रदेश उपाध्यक्ष हरीश सिंह ने की। 
कार्यक्रम का शुभरम्भ वरिष्ठ पदाधिकारियों के माल्यर्पण व स्वागत के उपरान्त हुआ। 

पत्रकार प्रेस क्लब की उत्तर प्रदेश इकाई के समस्त पदाधिकारिगण जिसमे प्रदेश, मंडल एवम सभी जिलों के पदाधिकारियों के औपचारिक स्वागत सत्कार, आपसी परिचय, अतिथियों के उदबोधन के बाद , हिंदुस्तान समाचार पत्र के छायाकार स्व0 विजय यादव जी की असायमिक निधन पर शोक प्रकट करते हुए 2 मिनट का मौन रखकर उनकी दिवंगत आत्मा की शान्ति की प्रार्थना की गई। उसके उपरांत संगठन की रीति नीति, वर्तमान में पत्रकार जगत के हितार्थ किये जा रहे उल्लेखनीय कार्य, पत्रकार जगत के भविष्य एवं पत्रकारों और उनके परिवार की सुरक्षा हेतु विस्तृत चर्चा की गई। 

प्रदेश अध्यक्ष श्री घनश्याम पाठक जी द्वारा कई नवागत पत्रकारों की जिज्ञासा को सरल तरीके से जानकारी देते हुए संतुष्ट किया गया। इस अवसर पर संगठन के समस्त पदाधिकारी एवम कई विशिष्ट सदस्य उपस्थित रहे।
बैठक का आयोजन जिला अध्यक्ष वाराणसी श्री पवन पांडेय जी द्वारा किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पीपीसी के प्रदेश उपाध्यक्ष श्री हरीश सिंह जी के साथ मंच संचालन प्रदेश अध्यक्ष श्री घनश्याम पाठक जी द्वारा किया गया।
इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री घनश्याम पाठक जी ने पत्रकारों से जुडी कई समस्याओं को ध्यान में रखते हुए, पत्रकारों के हित एवम सुरक्षा के लिए कई सुझाव एवं उपाय निर्देशित किये। पत्रकार साथियों को हर सम्भव सहायता का भरोसा दिलाने के साथ ही उन्होंने ऐसे पत्रकारों को सलाह एवम चेतावनी भी दी की कोई भी साथी अपने व्यक्तिगत स्वार्थों या दुर्भावनाओं से ग्रसित होकर पत्रकारिता या संगठन का उपयोग करने की कोशिश ना करे।
प्रदेश अध्यक्ष जी के साथ बैठक में मौजूद प्रदेश संयोजक श्री विनय मौर्या जी, प्रदेश उपाध्यक्षगण श्री हरीश सिंह जी, श्री संतोष पांडेय,श्री कृष्ण कुमार द्विवेदी, श्री सोनू सिंह, प्रदेश संगठन मंत्री श्री मदन मोहन शर्मा, पूर्वांचल प्रभारी श्री प्रवीण यादव(यश), प्रदेश सचिव श्री गौरव शुक्ला जी ने जिलेवार सभी पदाधिकारियों एवम सदस्यों की समस्याओं एवम उनकी सलाह पर विचार विमर्श किया।
बैठक में कई वक्ताओं ने अपना अपना मत और विचार मंच पर लघु वाक्यों में प्रस्तुत किया। ऐसे ही वक्ताओं की कड़ी में प्रदेश उपाध्यक्ष श्री सोनू सिंह द्वारा पंचकुला में हुई वीभत्स घटना में मीडियाकर्मियों के साथ हुए हिंसक व्यवहार को देखते हुए समाचार संकलन करते समय स्वयं की सुरक्षा का पूरा ध्यान देने की सलाह दी। जिलाउपाध्यक्ष जौनपुर अखिलेश सिंह जी में कहा कि संगठन के प्रत्येक सदस्य सबको एक परिवार के रूप लेकर चलना होगा तभी संगठन का सही अर्थ होगा। इसी तरह पीपीसी यूपी के प्रदेश संयोजक श्री विनय मौर्या जी, पूर्वांचल संयोजक श्री प्रवीण यश जी, प्रदेश उपाध्यक्ष श्री सन्तोष पांडेय जी, समेत संगठन कई के सदस्यों एवम पदाधिकारियों द्वारा पत्रकार हित के अपनी बातें रखीं।
इस प्रादेशिक बैठक में प्रदेश अध्यक्ष जी श्री घनश्याम पाठक जी के साथ संगठन के प्रदेश संगठन मंत्री श्री मदन मोहन शर्मा जी, वाराणसी मंडल अध्यक्ष श्री पवन त्रिपाठी जी, मंडल अध्यक्ष मिर्जापुर श्री राहुल सिंह जी,जिला संरक्षक वाराणसी श्री सकल देव सिंह जी, जिला उपाध्यक्ष वाराणसी श्री नवीन प्रधान जी  जिला अध्यक्ष चंदौली श्री आशुतोष तिवारी जी, जिला संयोजक चंदौली श्री मुकेश मौर्या जी, जिला अध्यक्ष जौनपुर श्री कृपाशंकर यादव जी,जिला संयोजक जौनपुर
 श्री लालचंद निषाद जी, जिला संयोजक भदोही श्री 
समीर वर्मा जी, आशीष सोनी जी, रामलाल साहनी जी, 
संजीव शर्मा चंद्रप्रकाश तिवारी, अनूप शुक्ला, विक्रम 
मल्होत्रा, रेवती रमण शर्मा, नीरज कुमार मौर्या, 
उमेश कुमार उपाध्याय, उपेंद्र कुमार यादव, कैलाश 
प्रसाद साहनी, दिनानाथ, राजेंद्र प्रसाद सिंह, पुष्कर मिश्र, 
सुधीर कुमार विश्वकर्मा, संजीव शर्मा, विवेक कुमार,
 गोविंद कुमार श्रीवास्तव, दिलीप कुमार मौर्या,
 मिथिलेश कुमार सिंह, चंद्र प्रकाश तिवारी, प्रभु नारायण प्रजापति, जितेंद्र कुमार अग्रहरि, आनंद चतुर्वेदी, मदन मोहन मिश्रा, योगेश श्रीवास्तव, डॉक्टर बीपी यादव, आशीष भूषण सिंह, मनीष तिवारी, प्रभात रस्तोगी, अरुण पटेल, संतोष सिंह, राजीव सेठ, अमरदीप, राजकुमार, केएल शाही, मुकेश मिश्रा, धर्मेंद्र पांडेय, पिंकू सरदार, कृष्णकांत मिश्रा, अभिनव कुमार पांडेय, वीरेंद्र पांडेय, पंकज पांडेय, संजय कुमार मिश्रा, राजेंद्र कुमार पांडेय, राजेश कुमार मिश्र, अवनीश कुमार दुबे, संतोष कुमार दुबे, मुहम्मद जावेद, ओम प्रकाश,  दिलीप सिंह, भरत निधि तिवारी, सुरेंद्र सिंह, वली अहमद, रामकृष्ण पांडेय, शुभम सिंह, दीपक तिवारी, सुनील प्रजापति, रामाज्ञा यादव, शशिकांत मौर्य, कमलेश यादव, राजेश मिश्र, गुलजार अली, विनोद कुमार सिंह, अजीत सिंह, संतोष नागवंशी, मोहम्मद इरफान हाशमी, मंजीत कुमार पटेल, बजरंगी प्रसाद, कृष्णा सिंह, विवेक यादव, विकी मध्यानी, पंकज कुमार पांडेय, रामलाल साहनी, महेश कुमार मिश्रा समेत सैंकड़ो पत्रकार साथी पुरे जोश के साथ शामिल हुए। 





शनिवार, 5 अप्रैल 2014

उत्तर प्रदेश-- जाति के चक्रव्यूह को कैसे भेद पायेगी भाजपा

जाति आधारित पार्टियों सपा बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की चुनौती
देश की राजनीति में मौजूदा समय एक अजीब सा माहौल बन चुका है। पहली बार देखा जा रहा है कि कोई एक व्यक्ति पार्टी से उपर उठकर चुनाव मैदान में उतरा हुआ है और यह माहौल सिर्फ एकतरफा ही नहीं वरन् हर तरफ से बना हुआ है। जो राजनीतिक सरगर्मिंया बढ़ी हुई हैं उसमें एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री प्रत्याषी नरेन्द्र दामोदर दास मोदी हैं तो दूसरी तरफ सारी राजनीतिक पार्टियां एकजुट होती दिखायी दे रही हैं। सर्वविदित है कि दिल्ली की कुर्सी पर वहीं विराजित होता है जिसके उपर उत्तर प्रदेष का हाथ होता है। वह हाथ चाहे बाहर से हो अन्दर से। हालांकि चुनावी सर्वे में यह बात उभर कर सामने आ रही है कि भजपा उत्तर प्रदेष में सबसे अधिक सीटे्र हासिल करने वाली पार्टी बनेगी, किन्तु सवाल यह भी उठता है कि यहां पर जातीय आधार पर ध्रुवीकरण हो चुके वोटों को भाजपा कैसे अपने पक्ष में कर पायेगी। क्या जाति के इस चक्रव्यूह को तोड़कर उत्तर प्रदेष में भजपा अपनी धमक जमा पायेगी।
गौरतलब है कि उत्तरप्रदेष कांग्रेस के हाथों से निकलने के बाद जाति आधारित पार्टियों ने अपनी जड़े जमा ली हैं। प्रदेष की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी पिछड़ी जाति विषेश कर यादव वोटों पर अपनी बपौती समझने के साथ मुस्लिम वोट पर भी अपना अधिकार समझती है। वहीं दलितों की मसीहा बनकर उभर चुकी बहुजन समाजवादी पार्टी पिछले दो दषक से दलित वोटों पर अपना कब्जा जमाये हुये है। देखा यह भी गया है कि जबसे जाति आधारित दल सपा बसपा ने प्रदेष में अपना अधिपत्य जमाया है। तभी से सवर्ण जाति के वोटर अनिष्चय के हालात में जी रहे हैं। व्यापारी वर्ग के साथ सवर्ण वोट पर भाजपा का कब्जा भले ही समझा जाता रहा है किन्तु सपा बसपा के अस्तित्व में आने के बाद यह वर्ग भी गेंद की तरह कभी एक पाले में जाता है तो कभी दूसरे की गोद में बैठने के लिये विवष होता है। पिछले विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो समाजवादी पार्टी के सरकार में बढ़ते अपराध और कानून व्यवस्था से उबकर तथा बसपा की सोषल इंजीनियरिंग के चलते ब्राह्णों के साथ अन्य जाति के वोटरों ने भी प्रदेष की कुर्सी मायावती को सौंप दी। हालांकि मायावती के षाशनकाल में कानून व्यवस्था सख्त दिखायी दी किन्तु सत्ता में आते ही दलित समाज पर अंकुष सरकार नहीं लगा पायी। जिसका परिणाम रहा कि सवर्णों की जमीन पर कब्जा और भारी तादात में फर्जी एससी एसटी के मुकदमें होने लगे। यहां तक कि दलितों को बिजली का नंगा तार कहा जाने लगा। सवर्ण समाज अपमान के घूंट पीकर चुप रहने के लिये विवष रहा। जिसका परिणाम 2012 के विधानसभा चुनाव में दिखायी दिया। पूर्व के षासनकाल में हुई समाजवादी सरकार की लचर व्यवस्था को भूलकर लोगों ने फिर उसे सत्ता सौंप दी।
हालांकि यह कहा जा सकता है कि यह लोकसभा चुनाव है और विधानसभा चुनाव की गणित यहां मायने नहीं रखती। फिर भी जातीय समीकरण को नजरअंदाज इस चुनाव में भी नहीं किया जा सकता। सर्वे पोल भले ही भाजपा की बढ़त बता रहें हो किन्तु ऐसे सर्वेक्षण अधिकतर षहरी क्षेत्रों में किये जाते हैं जहां वोटरों का षिक्षित तबका रहता है। इसके इतर जातीय समीकरण ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभावी होते हैं, जहां के वोटरों पर सपा बसपा जैसी जातीय पार्टियां प्रभावी हैं।
आज के चुनावी परिवेष में नजर डालें तो यह चुनाव दूसरे आम चुनावों से अलग दिखायी दे रहा है। भारतीय जनता पार्टी नरेन्द्र मोदी के हिन्दुत्व वाली छवि को भुनाने में लगी है तो और पार्टियों मोदी के विरोध में कथित धर्मनिरपेक्षता का राग अलाप रही हैं। अन्य दलों के निषाने पर भाजपा नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी दिखायी दे रहे हैं। अन्य दलों के नेता मोदी के खिलाफ जो तीर तरकष में से निकाल कर चल रहे हैं उसका उसका लबोलुआब यह है कि मोदी मुसलमानों के दुष्मन हैं और वे यदि सत्ता में आये तो मुसलमानों का जीना दूभर हो जायेगा।
उत्तर प्रदेष में सपा बसपा दो प्रमुख दल अभी तक यहीं समझ रहे हैं कि एक विषेश जाति के वोट बैंक पर उनका कब्जा है ही यदि मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में कर लिया तो चुनावी नैया पार कर जायेंगे। सपा का घोशणा पत्र इस बात को खुद ही प्रमाणित कर रहा है। दूसरी तरफ बसपा की मंषा भी किसी से छुपी नहीं है, उसके पास वोट बैंक का एक बड़ा हथियार है जिसमें सेंध लगा पाना अन्य दलों के लिये टेढ़ी खीर ही है। प्रदेष में जातीय समीकरण के अनुसार ही उसने टिकटों का वितरण किया है। बसपा का अपना वोट बैंक और प्रत्याषी की जाति का वोट पाकर बसपा भी दिल्ली पहुंचने का सपना संजो चुकी है।
अब मुस्लिम समुदाय के मतों पर नजर डाली जाय तो वे अभी तक अनिष्चय की स्थिति में दिखायी दे रहे हैं। भले ही अपने भाशणों में मोदी विकास और सुषासन की बात कह रहे हैं किन्तु उनकी हिन्दूवादी छवि के कारण मुस्लिम वोट पर कुछ खास प्रभाव पड़ता दिखायी नहीं दे रहा है। मुस्लिम वोटरों की मंषा इस बार सपा या बसपा के पक्ष में नहीं बल्कि उसके पक्ष में दिख रहा है जो भाजपा के प्रत्याषी को परास्त करने की क्षमता रखता है।
लोकसभा चुनाव में मोदी के लहर की बात करें तो निष्चित रूप से मोदी की लहर चल रही है। विशेष कर युवा वोटरों पर मोदी का काफी असर दिख रहा है। मोदी की हिन्दुत्ववादी छवि इस बार काफी प्रभाव दिखा सकती है। इसका एक कारण यह है कि सपा का मुस्लिम प्रेम उसके वोट बैंक को रास नहीं आ रहा है। और दूसरा कारण यह भी है कि मंहगाई, भ्रश्टाचार के कारण कांग्रेस के षासनकाल से उब चुकी जनता अब उससे निजात भी पाना चाहती है। लोगों में यह चर्चा भी जोरों पर हो रही है कि दिल्ली की सत्ता पर कांग्रेस या भाजपा के अलावा दूसरा कब्जा करने में सक्षम नहीं है। सपा बसपा जैसे दल अंततागत्वा कांग्रेस को ही समर्थन देकर सत्ता सौंप देगी और उन्हें फिर वहीं त्रासदी झेलने के लिये विवष होना पड़ेगी। इसका असर यह है कि इस चुनाव में खुद अपनी सरकार चुनना चाहते हैं। भले ही भाजपा के लिये जातिगत चक्रव्यूह भेदना मुष्किल दिखायी दे रहा है किन्तु भाजपा के रणनीतिकार यदि ग्रामीण वोटरों पर अपनी पकड़ मजबूत कर लिये तो चुनावी हवा का रूख अप्रत्याषित रूप से बदल भी सकता है।

उत्तर प्रदेश-- जाति के चक्रव्यूह को कैसे भेद पायेगी भाजपा

जाति आधारित पार्टियों सपा बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की चुनौती
देश की राजनीति में मौजूदा समय एक अजीब सा माहौल बन चुका है। पहली बार देखा जा रहा है कि कोई एक व्यक्ति पार्टी से उपर उठकर चुनाव मैदान में उतरा हुआ है और यह माहौल सिर्फ एकतरफा ही नहीं वरन् हर तरफ से बना हुआ है। जो राजनीतिक सरगर्मिंया बढ़ी हुई हैं उसमें एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री प्रत्याषी नरेन्द्र दामोदर दास मोदी हैं तो दूसरी तरफ सारी राजनीतिक पार्टियां एकजुट होती दिखायी दे रही हैं। सर्वविदित है कि दिल्ली की कुर्सी पर वहीं विराजित होता है जिसके उपर उत्तर प्रदेष का हाथ होता है। वह हाथ चाहे बाहर से हो अन्दर से। हालांकि चुनावी सर्वे में यह बात उभर कर सामने आ रही है कि भजपा उत्तर प्रदेष में सबसे अधिक सीटे्र हासिल करने वाली पार्टी बनेगी, किन्तु सवाल यह भी उठता है कि यहां पर जातीय आधार पर ध्रुवीकरण हो चुके वोटों को भाजपा कैसे अपने पक्ष में कर पायेगी। क्या जाति के इस चक्रव्यूह को तोड़कर उत्तर प्रदेष में भजपा अपनी धमक जमा पायेगी।
गौरतलब है कि उत्तरप्रदेष कांग्रेस के हाथों से निकलने के बाद जाति आधारित पार्टियों ने अपनी जड़े जमा ली हैं। प्रदेष की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी पिछड़ी जाति विषेश कर यादव वोटों पर अपनी बपौती समझने के साथ मुस्लिम वोट पर भी अपना अधिकार समझती है। वहीं दलितों की मसीहा बनकर उभर चुकी बहुजन समाजवादी पार्टी पिछले दो दषक से दलित वोटों पर अपना कब्जा जमाये हुये है। देखा यह भी गया है कि जबसे जाति आधारित दल सपा बसपा ने प्रदेष में अपना अधिपत्य जमाया है। तभी से सवर्ण जाति के वोटर अनिष्चय के हालात में जी रहे हैं। व्यापारी वर्ग के साथ सवर्ण वोट पर भाजपा का कब्जा भले ही समझा जाता रहा है किन्तु सपा बसपा के अस्तित्व में आने के बाद यह वर्ग भी गेंद की तरह कभी एक पाले में जाता है तो कभी दूसरे की गोद में बैठने के लिये विवष होता है। पिछले विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो समाजवादी पार्टी के सरकार में बढ़ते अपराध और कानून व्यवस्था से उबकर तथा बसपा की सोषल इंजीनियरिंग के चलते ब्राह्णों के साथ अन्य जाति के वोटरों ने भी प्रदेष की कुर्सी मायावती को सौंप दी। हालांकि मायावती के षाशनकाल में कानून व्यवस्था सख्त दिखायी दी किन्तु सत्ता में आते ही दलित समाज पर अंकुष सरकार नहीं लगा पायी। जिसका परिणाम रहा कि सवर्णों की जमीन पर कब्जा और भारी तादात में फर्जी एससी एसटी के मुकदमें होने लगे। यहां तक कि दलितों को बिजली का नंगा तार कहा जाने लगा। सवर्ण समाज अपमान के घूंट पीकर चुप रहने के लिये विवष रहा। जिसका परिणाम 2012 के विधानसभा चुनाव में दिखायी दिया। पूर्व के षासनकाल में हुई समाजवादी सरकार की लचर व्यवस्था को भूलकर लोगों ने फिर उसे सत्ता सौंप दी।
हालांकि यह कहा जा सकता है कि यह लोकसभा चुनाव है और विधानसभा चुनाव की गणित यहां मायने नहीं रखती। फिर भी जातीय समीकरण को नजरअंदाज इस चुनाव में भी नहीं किया जा सकता। सर्वे पोल भले ही भाजपा की बढ़त बता रहें हो किन्तु ऐसे सर्वेक्षण अधिकतर षहरी क्षेत्रों में किये जाते हैं जहां वोटरों का षिक्षित तबका रहता है। इसके इतर जातीय समीकरण ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभावी होते हैं, जहां के वोटरों पर सपा बसपा जैसी जातीय पार्टियां प्रभावी हैं।
आज के चुनावी परिवेष में नजर डालें तो यह चुनाव दूसरे आम चुनावों से अलग दिखायी दे रहा है। भारतीय जनता पार्टी नरेन्द्र मोदी के हिन्दुत्व वाली छवि को भुनाने में लगी है तो और पार्टियों मोदी के विरोध में कथित धर्मनिरपेक्षता का राग अलाप रही हैं। अन्य दलों के निषाने पर भाजपा नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी दिखायी दे रहे हैं। अन्य दलों के नेता मोदी के खिलाफ जो तीर तरकष में से निकाल कर चल रहे हैं उसका उसका लबोलुआब यह है कि मोदी मुसलमानों के दुष्मन हैं और वे यदि सत्ता में आये तो मुसलमानों का जीना दूभर हो जायेगा।
उत्तर प्रदेष में सपा बसपा दो प्रमुख दल अभी तक यहीं समझ रहे हैं कि एक विषेश जाति के वोट बैंक पर उनका कब्जा है ही यदि मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में कर लिया तो चुनावी नैया पार कर जायेंगे। सपा का घोशणा पत्र इस बात को खुद ही प्रमाणित कर रहा है। दूसरी तरफ बसपा की मंषा भी किसी से छुपी नहीं है, उसके पास वोट बैंक का एक बड़ा हथियार है जिसमें सेंध लगा पाना अन्य दलों के लिये टेढ़ी खीर ही है। प्रदेष में जातीय समीकरण के अनुसार ही उसने टिकटों का वितरण किया है। बसपा का अपना वोट बैंक और प्रत्याषी की जाति का वोट पाकर बसपा भी दिल्ली पहुंचने का सपना संजो चुकी है।
अब मुस्लिम समुदाय के मतों पर नजर डाली जाय तो वे अभी तक अनिष्चय की स्थिति में दिखायी दे रहे हैं। भले ही अपने भाशणों में मोदी विकास और सुषासन की बात कह रहे हैं किन्तु उनकी हिन्दूवादी छवि के कारण मुस्लिम वोट पर कुछ खास प्रभाव पड़ता दिखायी नहीं दे रहा है। मुस्लिम वोटरों की मंषा इस बार सपा या बसपा के पक्ष में नहीं बल्कि उसके पक्ष में दिख रहा है जो भाजपा के प्रत्याषी को परास्त करने की क्षमता रखता है।
लोकसभा चुनाव में मोदी के लहर की बात करें तो निष्चित रूप से मोदी की लहर चल रही है। विशेष कर युवा वोटरों पर मोदी का काफी असर दिख रहा है। मोदी की हिन्दुत्ववादी छवि इस बार काफी प्रभाव दिखा सकती है। इसका एक कारण यह है कि सपा का मुस्लिम प्रेम उसके वोट बैंक को रास नहीं आ रहा है। और दूसरा कारण यह भी है कि मंहगाई, भ्रश्टाचार के कारण कांग्रेस के षासनकाल से उब चुकी जनता अब उससे निजात भी पाना चाहती है। लोगों में यह चर्चा भी जोरों पर हो रही है कि दिल्ली की सत्ता पर कांग्रेस या भाजपा के अलावा दूसरा कब्जा करने में सक्षम नहीं है। सपा बसपा जैसे दल अंततागत्वा कांग्रेस को ही समर्थन देकर सत्ता सौंप देगी और उन्हें फिर वहीं त्रासदी झेलने के लिये विवष होना पड़ेगी। इसका असर यह है कि इस चुनाव में खुद अपनी सरकार चुनना चाहते हैं। भले ही भाजपा के लिये जातिगत चक्रव्यूह भेदना मुष्किल दिखायी दे रहा है किन्तु भाजपा के रणनीतिकार यदि ग्रामीण वोटरों पर अपनी पकड़ मजबूत कर लिये तो चुनावी हवा का रूख अप्रत्याषित रूप से बदल भी सकता है।

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