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रविवार, 1 मई 2011

श्रृद्धांजलि --... डा श्याम गुप्त ....

          निर्मोही  -----

कितना निर्मोही है ये जीव,
ये आत्मा, ये जीवात्मा |                

चलदेता है तोड़कर ,
 एक ही पल में-
 सारे बंधन, रिश्ते नाते
 उन्मुक्त आकाश की ओर;
निर्द्वंद्व, निर्बाध,स्वतंत्र, मोहमुक्त ,
मुक्ति की ओर |
और पीछे रहजता है -
माटी का शरीर,
सड़ने को गलने को  या फ़िर -
जलने को ,
उसी माटी में मिलने को |

यही गति है शरीर की,
यही मुक्ति है आत्मा की |

पर क्या वस्तुत : यह जीव -
मुक्त होजाता है ,
संसार से ?
कैद रहता है वह,  सदा-
 मन में;
आत्मीयों के याद रूपी
बंधन में , और-
हो जाता है अमर |

अमरत्व व मुक्ति सर्वथा भिन्न हैं,
फिर भी-
एक ही  सिक्के के दो पहलू हैं |
अत: मुक्त होकर इस जगत से,
बंधन से;
विश्व में ही-
अमरता के बंधन में ,
जीव बंध जाता है ;
सिर्फ उसका आयाम बदल जाता है |

 यही मृत्यु है,
यही अमरता;
यही मुक्ति,
यह जीवन सरिता ||

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