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रविवार, 11 मार्च 2012

ये वंशवाद नहीं है क्या?


ये वंशवाद नहीं है क्या?
           
   उत्तर  प्रदेश में नयी सरकार  का गठन जोरों पर है .सपा ने बहुमत हासिल किया और सबकी जुबान पर एक ही नाम चढ़ गया माननीय मुख्यमंत्री पद के लिए और वह नाम है ''अखिलेश यादव''.जबकि चुनाव के दौरान अखिलेश स्वयं लगातार माननीय नेताजी शब्द का उच्चारण इस पद के लिए करते रहे  जिसमे साफ साफ यही दिखाई दे रहा था कि उनका इशारा कभी अपने पिताजी तो कभी अपनी ओर है  क्योंकि माननीय नेताजी तो कोई भी हो सकते हैं पिता हो या पुत्र और फिर यहाँ तो कहीं भी वंशवाद की छायामात्र   भी नहीं है दोनों ही राजनीतिज्ञ हैं और दोनों ही इस पद के योग्य भी .वे इस बारे में भले  ही कोई बात कहें  कहने के अधिकारी भी हैं और फिर उन्हें भारतीय माता की संतान होने  के कारण भारतीय मीडिया ने बोलने  का हक़ भी दिया है किन्तु कहाँ  है वह मीडिया जो नेहरु-गाँधी परिवार  के बच्चों  के राजनीति में आने पर जोर जोर से ''वंशवाद ''के खिलाफ बोलने लगता है क्या यहाँ उन्हें वंशवाद की झलक नहीं दिखती.  अखिलेश को चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया और चुनावों के बाद पिता के दम पर हासिल जीत को पुत्र को समर्पित कर राजनीति में ''अपनी ढपली अपना राग''शुरू कर दिया गया.पर यहाँ कोई नहीं कहेगा  कि यहाँ कुछ भी ऐसा हुआ है जिसकी आलोचना स्वयं वे ही करते रहे हैं जो आज यही कर रहे हैं.सबको उनमे युवा वर्ग का भविष्य दिख रहा है सही है चढ़ते सूरज को सलाम करने से कोई भी क्यों चूकना चाहेगा.
                  शालिनी कौशिक 

रविवार, 17 जुलाई 2011

अपराधों की राजधानी-मुज़फ्फरनगर [उत्तर प्रदेश]

        अपराधों की राजधानी-मुज़फ्फरनगर [उत्तर प्रदेश]

''किस किस को बचायेंगे मेरे प्यार के आंसू,
हर शख्स यहाँ आग लगाने पे तुला है.''
डॉ.जे.पी.गोयल के ये उद्गार आज के मुज़फ्फरनगर पर पूरी तरह से खरी उतरती हैं विश्व के मानचित्र पर अपराधों से थर्राया ये जिला आज अपराध की हर किस्म से त्रस्त है और हालत इस हद तक बेकाबू हो चुके हैं की यहाँ से पलायन बहुत ऊँचे स्तर तक पहुँच चुका है .जिले में सुरक्षा व्यवस्था नाम की कोई चीज़ नहीं है .समाचार पत्रों में आये दिन मुज़फ्फरनगर में निशदिन घटित होने वाले अपराध छाये हैं .कल १५ जुलाई के अमर उजाला के पृष्ठ २ पर ही इस सम्बन्ध में कहा गया-
''एक बार फिर पुराने ढर्रे पर आयी अपराध नगरी''
''१४ दिन में १२ क़त्ल और २३ लूट ''
आज ये हालत हैं की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
''सब  लुट गए अरमान मेरी जान में आके,
लोगों ने मुझे लूटा है मेहमान बनाके,
मिलते ही मुझे जिंदगी बीमार हो गयी,
चारागरों की हर दवा बेकार हो गयी ,
जीने की तमन्ना जगी शमशान में जाके.''
आज यही स्थिति है दिन प्रतिदिन बिगडती जा रही ये स्थिति देख पुलिस के भी हाथ पांव फूल चुके हैं वह भी इसी असमंजस में है की किस तरह इन अपराधियों की नाक में नकेल डाली जाये एक तरफ कोशिश करती हुई पुलिस की स्थति ये है की इतने वह एक अपराध को सुलझाने की कोशिश करती है इतने दूसरा घटित हो जाता है और फिर तीसरा और चौथा ,कहीं ये संख्या थमती नज़र नहीं आ रही .१ जुलाई को दिल्ली के एक परिवार की युवतियों से रेप के प्रयास की हाई प्रोफाइल घटना की गूँज दिल्ली तक पहुंची थी .इसके बाद प्रेमी हमजा और प्रेमिका ताहिरा को प्रेम के दुश्मनों ने मौत के घाट उतार दिया था .८६ लाख रूपए की लूट कर फरार मुस्तफा उर्फ़ कग्गा से हुई मुठभेड़ में सिपाही सचिन शहीद हो गया था . 
मुज़फ्फरनगर के मल्हुपुरा में दो युवकों में चल रही आपसी टेंशन ने मल्हुपुरा की फिजा में ज़हर घोल दिया फायरिंग, पथराव ,और आगजनी से भगदड़ मच गयी हमलावरों में बी टेक और एम्.बी.ई के छात्र भी शामिल थे दूसरी ओर गाँव परसोली में छेड़छाड़ के विरोध में जमकर बवाल हुआ हमलावरों ने पीड़ित परिवार पर अंधाधुंध गोलियां बरसाकर एक लड़की को मौत के घाट उतार दिया जबकि कई गंभीर रूप से घायल हो गए .आज का अमर उजाला बताता  है एक ओर ऑनर किलिंग की बात ''थाना ककरोली के गाँव चौरावाला की सोनिया की मृत्यु को उसके घर के लोग हार्ट अटैक का नाम  दे रहे थे ओर उसकी लाश का अंतिम संस्कार करने जा रहे थे किन्तु उन्होंने अचानक इरादा बदल दिया और शव को पत्थर से बांधकर गंगा में फैंककर फरार हो गए यहीं से इसके ऑनर किलिंग का शक हुआ और पुलिस ने शव गंगा से निकाल कर पोस्ट मार्टम के लिए भेज दिया और ये देख कर वास्तव में लगा की-
''पानी पे तैरती हुई ये लाश देखिये ,
और सोचिये डूबना कितना मुहाल है.''
आज ही मुज़फ्फरनगर जेल में चली गोली से एक बंदी घायल हो गया और जिला कारागार में गोली चलने से पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लग गया .अभी हाल में ही बेकाबू ट्रक ने उजाड़ दी चैयरमेन की हरी भरी'' बगिया ''-रविवार की शाम तक जिस परिवार में बेहद ख़ुशी थी सोमवार की सुबह उनके लिए काल बन कर आयी उनके पूरे परिवार को एक ट्रक ने मौत का झपट्टा मारा और इस तरह वर्तमान चेयरमेन गौरववीर का पूरा परिवार मौत के घाट चढ़ गया ये हादसा तो एक सूचना मात्र है और इसके लिए साजिश की आशंका भी की जा रही है किन्तु यहाँ रोज दुर्घटनाएं हो रही हैं और उनमे कितने ही लोग अपनी जान से हाथ धो रहे हैं .जिनमे से अधिकांश के लिए साजिश की ही आशंका की जा रही है और मन यही कहता है-
''ले चलो मुझको आमिर इन दहशतों के शहर से ,
कैसे दीवारों से देखूं खून यूँ रिसता हुआ .''
और तो और इस जनपद में अपने मुकदमों की पैरवी भी इतनी कठिन है की पैरोकारी पर जाने का मतलब है अपनी जान से हाथ धोना .इतिहास साक्षी है की या तो पैरवी करने जाने वाले लोग गोलियों का निशाना बन जाते हैं या फिर शहर से पलायन कर जाते हैं और किसी गुप्त स्थान की ओर चले जाते हैं .
मैं तो आजकल रोज के समाचार पत्रों में मुज़फ्फरनगर की इतनी घटनाएँ देख रही हूँ की एक बार को तो मन नहीं करता किउसे खोलूँ ओर पढूं .बस  अब तो यही कह सकते हैं -
''आज के दौर में और क्या चाहिए ,
साँस लेने के काबिल फिजां चाहिए.''
और हमें नहीं लगता की ऐसा मुज़फ्फर नगर में अभी कुछ समय होने के लिए कोई अवसर हैं.
              शालिनी कौशिक 

सोमवार, 11 जुलाई 2011

विश्व जनसँख्या दिवस

आज सुबह रेडियो मिर्ची सुन रही थी तो अनंत और सौरभ के कार्यक्रम से पता लगा कि आज विश्व जनसँख्या दिवस है .पता तो ये बहुत पहले से था तबसे जबसे इस दिन विश्व की जनसँख्या ६ अरब हो गयी थी  पर ये हम जैसे लोगों को यद् भी क्यों रहेगा जिनका परिवार पहले से ही बहुत छोटा है जब ये उन्ही लोगों को याद  नहीं रहता जिन्होंने आज देश विश्व सभी की स्थिति बहुत बिगाड़ दी है.
        जब भी बचपन में कोई निबंध याद करते थे जनसँख्या से सम्बंधित तो उसमे इसके कारण में एक बड़ा कारण ''अशिक्षा''लिखा जाता था और हमें जब भी कोई अनपढ़ दिखाई देता था हम उसे देख कर देश की ख़राब स्थिति के लिए जिम्मेदार मान लेते थे  पर आज जब हमें कहने को काफी समझ आ चुकी है तब हम अपने आस पास के बहुत से ऐसे परिवार देख रहे हैं जो कहने को सुशिक्षित है,सभ्य हैं और उनके बहुत बड़े बड़े परिवार हैं.भारतीय समाज बेटे के होने तक बच्चे करता ही रहता है और अब ये लालसा इतनी आगे बढ़ चुकी है कि एक बेटा हो जाये तो कहा जाता है कि ''दो तो होने ही चाहियें''.
     आज जो भारत या कहें सरे विश्व में स्थिति है उसके जिम्मेदार हमारे पूर्वजों को ही कहा जायेगा.अपनी मम्मी और दादी से मैंने जाना कि पहले औरतें इस तरह के कॉम्पिटिशन किया करती थी और तो और यदि कोई महिला एक या दो ही बच्चे करती थी तो और औरतें उसे उकसाकर और बच्चे करा लिया करती थी.हमारी जानकर ही एक आंटी जो एक स्कूल में शिक्षिका हैं उनके दो ही बच्चे थे एक बेटा और एक बेटी पर उन्हें और औरतों ने ये कह कर ''कि क्या दो हो बच्चे करके रह गयी''उकसा दिया और अब उनके तीन बच्चे हैं और बड़े भाई बहन से उस बच्चे का अंतर लगभग ८ साल का है.चलिए यहाँ तो फिर भी खैर है हमारे एक अंकल जिनके सबसे पहले बेटा हुआ और जो अपनी बातों से भी काफी आधुनिक नज़र आते हैं उसके बाद ४ लड़कियां बेटे बढ़ने की ख्वाहिश में कर ली.और एक पडोसी जो कि इंटर कोलेज में प्रवक्ता हैं उनके दो बेटियों के बाद एक बेटा हो गया तब भी उनकी इच्छा बेटे के लिए ख़त्म नहीं हुई और उन्होंने उसके बाद तीन बेटियां और पैदा कर ली इसी तरह हद तो एक और अंकल ने की है जिनके एक के बाद एक बेटे होते रहे और वे करते रहे सात बेटे इस तरह उन्होंने देश की जनसँख्या में बढ़ा दिए हाँ रुके वे तभी जब आठवें  नंबर पर बेटी हो गयी.ये तो कुछ लोग हैं जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए मुश्किलें  पैदा कर दी हैं और मैं नहीं मान सकती इसलिए यह बात कि अशिक्षित लोग इसके लिए ज्यादा उत्तर दायी हैं जब मेरे सामने ऐसे उदाहरन हैं और हो सकता है कि आपके सामने भी हों.आज इसी कारण यह भयावह स्थिति पैदा हो गयी है कि अब यदि किसी के दो बच्चें भी हों तो जनसँख्या का बोझ बढ़ता दिखाई देता है.
    शालिनी कौशिक 

बुधवार, 6 जुलाई 2011

मधुर का तनाव जायज है !



मधुर का तनाव जायज है !


ऐश के गर्भवती होने से मधुर भंडारकर सदमे में हैं .मधुर ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए जो कहा उससे मैं सहमत हूँ -''हीरोइन परियोजना रुक जाने के बाद आज मै अपने कार्यालय में अकेला बैठा हूँ .जिस परियोजना पर मैं पिछले डेढ़ साल से पसीना बहा रहा था,उसे मैं ऐसे ही बंद न होने देता .यह मेरे कैरियर की सबसे महत्वकांक्षी परियोजना होने जा रही थी ''

हो सकता है आप में से कुछ उनके इस कथन को इस तरह ले कि ''मधुर केवल व्यवसायिक दृष्टिकोण से सोच रहे हैं ''पर मैं नहीं मानती यह सही है कि किसी भी अभिनेता का या अभिनेत्री का निजी जीवन किसी और के सपनों को इस तरह बर्बाद कर डाले .ऐश्वर्या एक स्थापित अभिनेत्री हैं .किसी भी फिल्म का हिस्सा बनने से पहले उन्हें स्वयं यह निर्णय लेना चाहिए था कि वे अब प्राथमिकता किसे देती है -माँ बनने को अथवा फ़िल्मी जीवन को .एक सामान्य स्त्री के गर्भधारण में और एक सफल व् कई परियोजनाओं का हिस्सा बनी अभिनेत्री के गर्भधारण में जमीन-आसमान का अंतर है .आपको यदि माँ बनना है तो किसी की महत्वकांक्षी योजना का हिस्सा क्यों बन रही हैं ?यहाँ यह कहना भी हास्यासप्रद है कि अचानक ही ऐसा हो गया ?

मधुर जी अब एक बात तो आप हमेशा याद रखेंगे ही कि किसी विवाहित अभिनेत्री को हीरोइन बनाना कितना बड़ा जोखिम का काम है !


शिखा कौशिक

http://vicharonkachabootra.blogspot.com



सोमवार, 4 जुलाई 2011

अब बदनाम ही रुतबे वाला है !

अब बदनाम ही रुतबे वाला है !


कल के दैनिक हिंदुस्तान में एक खबर पढ़कर मेरा मन घृणा से भर उठा .शीर्षक था -''जेल से छूटते ही मरिया का महिमामंडन शुरू ''.नीरज ग्रोवर हत्या कांड में सबूत मिटाने वाली क्रूर ह्रदय मारिया सुसाईराज तीन साल की सजा काटकर शनिवार को जेल से रिहा हो गयी .ऐसी दुष्ट औरत के साथ समाज यदि कठोर रुख नहीं अपना सकता तो यह भी तो शोभा नहीं देता कि उसको तथाकथित ''स्टार'' का दर्जा प्रदान किया जाये पर इलेक्ट्रौनिक मीडिया से लेकर फिल्म निर्माता तक उसकी बदनामी को भुनाने के लिए उसके आगे-पीछे चक्कर लगा रहें हैं .अख़बार में इस बदनामी को ''लोकप्रियता'' कहा गया है .संवाददाता को दस बार विचार करना चाहिए था इस एक शब्द ''लोकप्रियता 'को लिखने से पहले .यदि यही लोकप्रियता है तो फिर तो आज भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय ''अजमल कसाब ''है .रामगोपाल वर्मा ने खुलेआम मरिया पर एक फिल्म बनाने की घोषणा की है ,कलर्स चैनल ''बिग बौस'' में लेने के लिए उत्सुक है -आखिर क्यों ?ये हम दर्शकों को भी सोचना है .मारिया के प्रति आप क्या मेरे जैसे विचार नहीं रखते -


''जो टुकड़े जिस्म के नीरज के किये थे

ए-मारिया भला वे छिप सके कहाँ ?

मुझको तो तेरी सूरत पर

अब भी नजर आते हैं ''

ऐसी क्रूर अभिनेत्री पर तो आजीवन फिल्मों में काम करने पर प्रतिबन्ध होना चाहिए और ऐसी क्रूर स्त्री को जो ''स्टार'' का दर्जा दें वे इन्सान नहीं शैतान ही हैं -


'' उस इन्सान के भीतर शैतान भी है रहता

जो कातिलों को आज भगवान कह रहा है ''

शिखा कौशिक

http://vicharonkachabootra.blogspot.com

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी [भाग-३ ]

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी [भाग-३ ]


कई बार तो ब्लोगर हताश होने लगता है.महत्वपूर्ण विषय पर लिखे आलेख पर एक या आधी ही टिप्पणी प्राप्त होती है वहीँ अर्थहीन आलेखों पर टिप्पणिओं की बौछार .दिल में एक आह! उठती है........सोचता है -क्यूँ न ब्लोगिंग को अलविदा ही कह दूं -


''आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक .''


ऐसी विषम परिस्थिति में कुछ ब्लोगर फरिश्तों के रूप में उसको साहस देने के लिए उपस्थित होते हैं .साहस देते हैं संघर्ष करने का .वे उसे मन्त्र बतलाते हैं -''न दैन्यं न पलायनं '.न किसी की टिप्पणी का इंतजार करो और न ब्लोगिंग से पलायन.वे कहते हैं ब्लोगिंग का तो मजा ही ये है-


''इशरते कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना

दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना ''


वे समझाते हैं किसी की टिप्पणी को लेकर अपने सिर में दर्द मत करो .लिखते रहो....लिखते रहो.....लिखते रहो -

''ग़ालिब बुरा न मान जो वाइस बुरा कहे

ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे ''


वे अपना फलसफ़ा बताते हैं जिससे ''ब्लोगिंग छोड़ने ''का कुत्सित विचार फिर से ब्लोगर के ह्रदय में न आये-


''रोक लो गर गलत चले कोई

बख्श दो गर खता करे कोई ''


इस पर भी कोई दुष्ट पीछे पड़ ही जाये आपकी अच्छी-भली पोस्ट की धज्जियाँ उड़ाने के लिए तो धीरज रखिये-


''की वफ़ा हमसे तो गैर उसको जफा कहते हैं

होती आई है कि अच्छों को बुरा कहते हैं ''


-अंत में -

प्रत्येक ब्लोगर को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए कि कहीं ब्लोगिंग जानलेवा ही न बन जाये .आप खुद परखें आप में ये गंभीर लक्षण तो दिखाई नहीं दे रहे -


१-अच्छी पोस्ट लिखने पर जब टिप्पणी न मिले तो आप ऐसा महसूस करते हैं -


''आ के मेरी जान को करार नहीं है

ताकते-बेदादे-इंतजार नहीं है ''


२-आपकी अन्य गतिविधियाँ ठप्प पड़ गयी हैं बस हर समय ब्लोगिंग-ब्लोगिंग-ब्लोगिंग ही दिल-दिमाग पर छाई रहती है आप खुद को निक्कमा महसूस करने लगें है -

''इश्क ने 'ग़ालिब' निक्कमा कर दिया

वरना हम भी आदमी थे काम के ''


३-आप खाना-पीना यहाँ तक की सोना -हँसना तक भूलने लगे हैं ब्लोगिंग के तनाव में -


''आगे आती थी हाले दिल पे हंसी

अब किसी बात पर नहीं आती ''


यदि ऊपर वर्णित लक्षणों में से कोई भी लक्षण आप खुद में देखें तो अनुभवी ब्लोगर से जरूर सलाह ले क्योंकि ब्लोगिंग अनुभवी ब्लोगर्स की नजर में तो बस यही है -



''ये इश्क नहीं आसाँ बस इतना समझ लीजिये

इक आग का दरिया है और डूबते जाना है ''

समाप्त

शिखा कौशिक http://vicharonkachabootra.blogspot.com


मंगलवार, 28 जून 2011

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी [भाग दो ]

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी [भाग दो ]

कुछ टिप्पणीकार तो साधारण पोस्ट की भी इतनी प्रशंसा कर देते हैं की ब्लोगर स्वयं यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि ऐसा क्या लिख दिया है मैंने कि ये टिप्पणीकार इतनी तारीफ कर रहे हैं -


''दिल से तेरी निगाह जिगर में उतर गई ,

दोनों को इक अदा में रजामंद कर गयी .''


लेकिन ऐसा नहीं कि केवल प्रशंसा ही हो .अति आलोचना का भी शिकार बनना पड़ता है .ब्लोगर खुद को कोसता है कि किस मनहूस घडी में मैंने यह पोस्ट डाली थी ? मुंह-दर-मुहं हो तो मार-पिटाई तक भी बात पहुँच सकती है पर ब्लॉग-जगत की गरिमा बनायें रखने के लिए ब्लोगर आलोचनाकार को बार-बार ''जी'' लगाकर अपनी बात समझानें का प्रयास करता है .इस पर भी यदि आलोचनाकार न माने तो दिल में ये तो आता ही है -


''हर एक बात पर कहते हो तुम कि तू क्या है ;

तुम्ही कहो कि ये अंदाजे -गुफ्तगू क्या है .''


थोडा सख्त लिख दिया तो आलोचनाकार ब्लोगर को ''अशिष्ट'' की संज्ञा देने में एक मिनट नहीं लगाता. होतें रहें आप सक्रिय-ईमानदार ब्लोगर पर आलोचनाकार की टिप्पणिया आहात तो कर ही जाती है -


''होगा कोई ऐसा भी कि ''ग़ालिब ''को न जाने ;

शाइर तो वह अच्छा है पर बदनाम बहुत है .''


पर साहब जी ब्लोगिंग करते-करते ब्लोगर भी पक्का हो जाता है .दो दिन हुए नहीं इस घमासान को कि फिर एक नयी पोस्ट तैयार -


''रोने से और इश्क में बेबाक हो गए;

धोये गए हम ऐसे कि बस पाक हो गए .''


अब टिपण्णी प्राप्त करनी है तो अन्य के ब्लॉग पर जाकर करनी भी होगी .जब तक ऐसी भावना मन में नहीं आती ब्लोगर का उद्धार होना मुश्किल है -

''हाँ भला कर तेरा भला होगा ;

और दरवेश की सदा क्या है .''


भूले-भटके किसी ऐसे ब्लॉग पर पहुँच जाएँ जहाँ अनुसरनकर्ताओं की संख्या सौ-दो सौ-या हज़ार हो तो मन मचल उठता है और थोडा उदास भी हो जाता है अपने अनुसरनकर्ताओं की संख्या याद कर -


''ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता

अगर और जीते रहते यही इंतजार होता .''


लेकिन चाहने से क्या होता है?ये तो अन्य ब्लोगर्स का हक़ है कि वे आपके ब्लॉग का अनुसरण करें न करें .हर ख्वाहिश पूरी हो ये जरूरी तो नहीं -


''हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले .

[....जारी ]

शिखा कौशिक

http://vicharonkachabootra.blogspot.com


रविवार, 26 जून 2011

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी -[भाग -१ ]

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी -[भाग -१ ]


भाई जबसे ब्लॉग बनायें हैं रातों की नींद उड़ गयी और दिन का सुकून खो गया .बार-बार दिल में यही गूंजता है -

''दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है ;

आखिर इस दर्द की दवा क्या है .''


ऊपर से कोई ब्लॉग-पोस्ट लिखकर ब्लॉग पर प्रकाशित कर दो तो टिप्पणियों का इंतजार करते-करते अच्छा खासा ब्लोगर भी बेहाल हो जाता है .दिल में एक हूक..........सी उठती है -


''बनाकर फकीरों का हम भेस ''ग़ालिब''

तमाशा-ए-अहले-करम देखते हैं .''


इधर-उधर टाइम पास कर फिर से ब्लॉग खोलो तो ''नो कमेन्ट'' देखकर रहा-सहा सब्र भी जवाब देने लगता है .ब्लोगिंग न हुई मरी ''इश्क '' की बीमारी हो गयी -


''इश्क से तबियत ने जिस्त का मजा पाया ;

दर्द की दवा पाई दर्द बे-दवा पाया .''


अब ब्लोगिंग की बीमारी से ग्रस्त ब्लोगर के लिए तो मानो जीना-मरना सब बराबर .ब्लॉग देखे बिना भी चैन नहीं और देख कर भी -


''मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने-मरने का

उसी को देखकर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले .''


ले-दे कर यदि कई दिन में एक-आध टिपण्णी आ जाती है तब भी दिल को सुकून कहाँ -


''उनके देखे से जो आ जाती है मुहं पर रौनक ;

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है .''


फिर भी टिप्पणीकार के प्रति ह्रदय अगाध श्रद्धा से भर उठता है -


''वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है ;

कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं .''


[जारी]

शिखा कौशिक

http://vicharonkachabootra.blogspot.com

शुक्रवार, 17 जून 2011

लोक निर्माण विभाग ये क्या कर रहा है?


आजकल सभी और अफरातफरी का माहौल है आप सभी को पता भी होगा  और कितने ही होंगे जो इस विपदा को झेल भी रहे होंगे .चलिए पहले कुछ चित्र ही देख कर समझ लें- 
अमर उजाला व् हिंदुस्तान दैनिक से साभार 
देखा आपने यही हाल है बरसात के इस मौसम में 

जानते हैं  मैं  क्या कहना चाह रही हूँ यही  कि उत्तर प्रदेश का लोक निर्माण विभाग सड़कों का निर्माण कुछ इस प्रकार कर रहा है कि जो घर सड़क से काफी ऊँचे बनाये गए थे वे धीरे धीरे सड़क पर ही आते जा रहे हैं.कहने का मतलब ये है कि जब वे घर बनाये गए थे तो सड़क से इतने ऊँचे बनाये गए थे कि बारिश का पानी उन में नहीं घुस सकता था किन्तु अब स्थिति ये है कि जरा सी बारिश होते ही बारिश का पानी घरों में घुस जाता है और स्थिति यही होती है जो ऊपर के चित्रों में दिखाई दे रही है.सड़कें जब भी बनाई जा रही हैं तब ही हर बार वे ऊँची उठ जाती हैं.हाल ये है कि एक समय जो चबूतरे दीखते थे आज वे सड़क का भाग ही दिखाई दे रहे हैं.
  इसके साथ ही सड़कों पर पहले जो नालियां बनती थी वे ऐसी बनती थी कि उन पर कोई चैनल न लगा होने पर भी वे सही रहती थी और बरसात में उनमे इतनी जल्दी भराव की स्थिति नहीं आती थी और आज ये कहा जा रहा है कि नई तकनीक आ गयी है और ये नई तकनीक ऐसी है जिसके कारण हर  ओर परेशानी का आलम है.बारिश में ही क्या बिन बारिश भी सड़कों पर नाली से बाहर पानी बहता रहता है .आज लोक निर्माण विभाग की नौकरी को बहुत आमदनी वाली नौकरी माना जाता है हो सकता है कि ऐसे बढ़िया कार्यों से उनकी कुछ ज्यादा ही आमदनी हो जाती हो.पर जन साधारण के लिए तो ये लोक निर्माण विभाग एक सिरदर्द ही बनता जा रहा है.    
               शालिनी कौशिक 

सोमवार, 13 जून 2011

माचिस उद्योग अपने उपभोक्ताओं के साथ धोखा

पिछले कई महीनो से झेल रही हूँ इसीलिए आज लिख रही हूँ कि आज माचिस उद्योग अपने उपभोक्ताओं के साथ धोखा कर रहा है.हालाँकि ब्लॉग जगत में से अधिकांश लाइटर का इस्तेमाल करते होंगे किन्तु जहाँ तक मेरा मानना है मैं माचिस को इसके मुकाबले ज्यादा सही समझती हूँ मैंने भी अपनी आंटी के यहाँ लाइटर इस्तेमाल किया और या तो ये कहें कि मुझे इस्तेमाल करना नहीं आया या कहें कि उसे इस्तेमाल करने के लिए बहुत ताक़त चाहिए तो मुझमे वो भी नहीं है और मैं इसी वजह से कह लें तब भी माचिस को ही ज्यादा महत्व देती हूँ.
              चलिए अब सुनिए मेरी आप बीती माचिस  के बारे में.मेरे कितने ही कपड़ों में इसकी तीली का मसाला उछल कर छेद कर चुका है और एक बार तो मेरी आँख भी इसके मसाले के हमले से बाल बाल बच गयी.इतना कुछ तो फिर भी माचिस के ब्रांड पलट पलट कर हम बर्दाश्त करते रहे किन्तु अब तो हद हो गयी है यदि ४-५ तीली न जला लो तो आप गैस जला ही नहीं सकते और हमारे क्षेत्र में आने वाली एक मात्र आई.एस.आई.ब्रांड ''ऊँट  ''भी इसी श्रेणी में है.उसे हम बहुत समय पहले उसके इन्ही कमियों के कारण छोड़ चुके हैं और अब यहाँ आने वाली ''ढोलक.मिर्च '''आदि ब्रांड भी इसी श्रेणी में गिरती दिख रही हैं.एक बार तो किसी उपभोक्ता ने किसी माचिस कम्पनी पर माचिस में कम तीली आने पर मुकदमा भी किया था किन्तु हमारे क्षेत्र में ये काम मुश्किल है क्योंकि उपभोक्ता अदालते जिला स्तर पर होती हैं और उनमे जाकर शिकायत करने का समय निकलना हर आदमी के वश में नहीं होता और इसी कारण ये उद्योग गलत काम करके भी साफ बचे रहते हैं.
    किसी माचिस में मसाला आग नहीं पकड़ता और किसी माचिस में मसाला जलता रहता है और उसकी लकड़ी आग नहीं पकडती.हालाँकि है छोटी से चीज़ किन्तु बहुत काम की चीज़ है और इसमें यदि कोई भी बेईमानी  सामने आती है तो खून खोल उठता है और वह भी बिना चूल्हा जलाये जबकि चूल्हा जलाने को तो माचिस चाहिए.
                               शालिनी  कौशिक  

सोमवार, 6 जून 2011

सोचें और फिर कुछ करें


आजकल सडको पर जब हम जाते हैं तो झोले लटकाए टीका लगाये कभी गंदे कपड़ों में तो कभी साफ कपड़ों में कुछ आदमी और कुछ औरतें दिखाई दे जाती हैं.कभी कभी बच्चे भी दिखाई देते हैं और इन सभी का एक ही मकसद होता है जहाँ से भी मिले जैसे भी मिले पैसे बटोरना.हमारे घर के पास कुछ दुकाने  हैं और दोपहर १२-०० बजे के करीब वहां ५-६ लोग आते हैं और हर दुकान में घुसते हैं और जो निश्चित कर रखे हैं १-१ रुपैया लेकर निकलते हैं.ऐसे जैसे शहरों में हफ्ता बंधा होता है ऐसे ही कस्बों में लगता है कि हर दिन का दुकानदारों पर कुछ जुर्माना बांध दिया गया है.अभी कल ही की बात है हम अपने डॉ.अंकल के क्लिनिक पर थे कि एक औरत वहां आई और उसने उनसे कुछ कहा भी नहीं और वे अपने मेज की दराज में कुछ ढूँढने लगे.थोड़ी देर में हमने देखा कि वे उसे दो रूपए देकर उससे एक रूपया ले रहे थे.ऐसा लगा कि ये उनकी क्लिनिक का भी रोज़ का ही प्रचलन हो गया है.
और हम और आप दोनों ही इसके लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि जब हम एक को मांगने पर इस तरह पैसे देते हैं तो उसे देख दुसरे का भी हाथ अपनी और अनचाहे ही बढवा लेते हैं.हम अपने यहाँ घर से किसी भी मांगने वाले को पैसे नहीं देते हाँ अगर कोई भूखा दिखाई देता है तो उसे ज़रूर कुछ खाना दे देते हैं और और इसका ही ये परिणाम है कि हमारे घर इस तरह के लोगों का ताँता नहीं लगता जबकि पास पड़ोस में झोले लटकाए हठे-कट्टे दिखाई देते है रहते हैं .ये तो हम सभी जानते हैं कि ये लोग केवल मांगने के लिए ही नहीं घुमते हैं बल्कि इनका मकसद जैसे भी हो कुछ हासिल करना होता है और इस तरह हम इन्हें स्वयं योगदान दे रहे हैं.एक बार तो हमारे घर में एक औरत कुछ मांगने को घुसी मैंने उसे बाहर ही मना कर दिया और अन्दर आ गयी किन्तु हमारा घर ऐसे है कि उसका गेट कभी दिन में बंद नहीं होता तो वो मेरे अन्दर आने पर घर के और भी अन्दर जाने लगी मैंने उसे रोका तो वो भड़क कर बोली-कमबख्त टोक दिया ''भला मैं उसे अपने घर में जाने से रोक रही थी या उसके किसी प्लान में रोक लगा रही थी''.आज कल ऐसे घटनाएँ बढरही हैं और ये हमारी भलमनसाहत और लापरवाही ही है जो घरो में लूट डकैती की घटनाये बढ़ा रही है एक ओर तो हम इन लोगों को पैसे देकर समाज में भिखारी बढ़ा रहे हैं और दूसरी ओर इन्हें अपने घरों में घुसने के नए रस्ते दिखा रहे हैं .इधर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूरे परिवार के सफाए की घटनाये बढ़ रही हैं और इन सभी घटनाओ में हमारी लापरवाही भी एक महत्वपूर्ण तत्त्व है ऐसे में हमें अगर अपने घरों में ऐसी घटनाये रोकनी हैं और समाज को भिखारियों से बचाना है तो इन्हें पैसे दे पुण्य कमाने की प्रवर्ति पर रोक लगानी होगी.
         शालिनी कौशिक 

सोमवार, 16 मई 2011

वो आये मेरी कब्र पे दिया बुझाके चल दिए,


          ''वो आये मेरी कब्र पे दिया बुझाके चल दिए,
           दिए में जितना तेल था सर पे लगाके चल दिए.''
कई लेख पढ़े ''तवलीन सिंह जी''के और मन में आया कि क्या वास्तव में वे अपनी लेखनी को बर्बाद करने पे तुली हैं?पर रविवार १५ मई के अमर उजाला में ''तमाशे की रोटी''शीर्षक युक्त उनके आलेख ने शक को यकीन में बदल दिया .राहुल गाँधी जी के जिस कार्य की तारीफ मीडिया में,जनता में जोर शोर से की गयी उसे पढ़कर सुनकर तो लगा जैसे तवलीन सिंह जी की लेखनी जल भुन गयी और जला भुना पाठकों के समक्ष परोस दिया.
       हमारे यहाँ प्राचीन समय से राजा महाराजा [ये उदाहरण इसलिए क्योंकि तवलीन जी राहुल जी को युवराज कहती हैं जबकि वे अपने बारे में ऐसा कुछ नहीं कहते]जनता की समस्याएँ स्वयं देखने के लिए रातों को चोरी छिपे जनता के बीच जाया करते थे .राहुल जी ने भी कई दिन से चर्चाओं में छाये भट्ठा पारसोल गाँव में किसानो के बीच जाकर ऐसी ही कार्यवाही को अंजाम दिया और अत्याचार की आग में झुलस रहे किसानो को दो पल की राहत दी.उन्होंने किसानो के ही बताने पर बिटोड़े की राख अपनी गाड़ी में जाँच हेतु भरवाई.मैं आपसे पूछती हूँ कि इसमें राहुल जी ने सही कार्य किया या गलत?और यदि गलत तो वह क्यों?
        तवलीन सिंह जी के आलेख की निकृष्टता तो यहीं ज़ाहिर होती है कि वे राजनीति  में सुन्दरता और जवानी को लाभदायक बताती हैं [फिर तो सारी फिल्म इंडस्ट्री यहीं होनी चाहिए] और अपने इसी तराजू पर वे राहुल गाँधी की सफलता को तोलती हैं भला वे बताएं कि यदि राजनीति सुन्दरता और जवानी पर टिकी है तो विश्व के सबसे वयोवृद्ध नेता हमारे यहाँ कैसे जनता में छाये हैं?वे राहुल जी की तुलना राजनाथ सिंह जी से करती हैं और राहुल जी की चमक को उनके ऊपर छाये अँधेरे का कारण बताती हैं.जबकि राजनाथ सिंह जी की असंवेदनशीलता वह बाधा है जो उन्हें राजनीति के आकाश में चमकने से रोकती है और राहुल जी की संवेदनशीलता ही राजनीति में उनकी चमक को निरंतर बढ़ा रही है.राजनाथ सिंह जी के हेलीकोप्टर का पायलट    मर जाता है और वे पहले सभा को संबोधित करने पहुँच जाते हैं जबकि राहुल जी इलाज के लिए तड़प रहे एक ऐसे व्यक्ति की मदद को आगे बढ़ते हैं और जीवन की आशा उसके मुख पर बिखेरते हैं जो उन्हें चेहरे से पहचानता भी नहीं था.
         भट्ठा पारसोल में हुए किसानो पे अत्याचार के हालत पर राहुल जी की ये टिपण्णी''कि उन्हें भारतीय होने पर शर्म महसूस होती है''तवलीन जी के लिए उनकी देशभक्ति पर ऊँगली उठाने का मुद्दा बन गया जबकि राहुल जी का यह कथन एक सच्चे भारतीय का कथन है .वे राहुल जी को पंजाब में खेतों में सड़ते अनाज  पर ऐसी टिपण्णी करने की सलाह देती हैं पर क्या भूल जाती हैं कि जलियाँ वाला बाग कांड १३ अप्रैल १९१९ को पंजाब में ही हुआ पर वह अंग्रेजों के शासनकाल में हुआ था तब देश गुलाम था और आज देश आज़ाद है और सत्ता में बैठे भारतीय अंग्रेज बन गए हैं और जनता वही  गुलामों की श्रेणी में है .अपने ही लोगों द्वारा अत्याचार की आग में झुलसाये जा रहे किसानो की हालत देखकर किसी भी सच्चे भारतीय को अपने भारतीय होने पर शर्म आएगी.खेतों में सड़ता अनाज  तो तवलीन जी की आँखों में आंसू भर देता है किन्तु जीते जागते इन्सान की दुर्दशा  देख यदि राहुल जी ऐसे टिपण्णी करते हैं तो तवलीन जी को एतराज है क्योंकि वे गाँधी फैमली के हैं .ऐसा आलेख लिखने से पहले तवलीन जी को आज के हिंदुस्तान के पृष्ठ ११ पर भट्ठा पारसोल में पुलिस बर्बरता की चशमदीद गवाह नेहा की जुबानी ही जान  लेना चाहिए था कि ''आवाज़ उठाने का मुआवजा चुका रहे हैं हम''नेहा जिसकी वहां पुलिस ने टांग तोड़ दी नेहा के पिता कहाँ किस हालत में हैं पता नहीं.और यह नेहा का ही देश है जहाँ आज उसे गैर देश में रहने जैसी जिंदगी गुजारनी पद रही है .क्या एक सच्चे भारतीय के उद्गार राहुल जी से अलग हैं?मैं तो नहीं मानती मेरा मानना तो यह है कि जो ऐसी स्थिति में भारतीय होने का गर्व दिखा रहा है वह महज़ बनावट ओढ़ रहा है .
             बात बात में सत्ता की बागडोर सोनिया जी के हाथों में कहकर तवलीन सिंह जी और कुछ अन्य आलोचक भी भारतीय संविधान को ही नकारते से लगते हैं जिसके अनुसार सत्ता की धुरी संसद है,संविधान का संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय है और सर्वोच्च न्यायालय की जनता के अधिकारों के प्रति जवाबदेही व् जागरूकता हमारे लिए गौरव का विषय है चुनाव आने पर सभी नेता जनता में अधिक सक्रीय होते हैं किन्तु लगता है कि तवलीन सिंह  जी हमारे नेताओं  से भी अधिक सक्रिय हैं जिनकी  लेखनी का केवल एक विषय होता है और वह है गाँधी परिवार और इस परिवार की आलोचना ही उन्हें चर्चा में बनाये रखती है.तो वे इससे पीछे क्यों हटें?
       मेरा तवलीन सिंह जी से यही कहना है की अपनी  लेखनी को  स्वस्थ आलोचना की कसोटी  पर परखें  और उसी  पर रहें  वर्ना  वही होगा  जो  अधिकांश  आलोचकों   के  साथ   होता है .कटु  आलोचना और वह भी प्रतिद्वन्द  पर आधारित प्रतीत  होने   वाली   आलोचना सदैव   पठनीय    नहीं होती  और ऐसे  आलोचक  गुमनामी  के  अंधेरों  में खो   जाते  हैं.इस देश  के  पाठक   चाहे   वे किसी भी क्षेत्र से हों  तथ्यों पर आधारित स्वस्थ आलोचना ही स्वीकार करते हैं व्यक्तिगत द्वन्द पर आधारित आलोचना नहीं .
                                                 शालिनी कौशिक 

सोमवार, 9 मई 2011

हम कौन थे?क्या हो गए?और क्या होंगे अभी?...............


हम कौन थे?क्या हो गए?और क्या होंगे अभी?...............
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी.
                 आज कुछ ब्लोग्स पर ''शिखा कौशिक जी''द्वारा प्रस्तुत आलेख ''ब्लोगर सम्मान परंपरा का ढकोसला बंद कीजिए''चर्चा में है और विभिन्न ब्लोगर में से कोई इससे सहमत है तो कोई असहमत.चलिए वो तो कोई बात नहीं क्योंकि ये तो कहा ही गया है कि जहाँ बुद्धिजीवी वर्ग होगा वहां तीन राय बनेंगी सहमति ,असहमति और अनिर्णय की किन्तु सबसे ज्यादा उल्लेखनीय टिप्पणियां ''दीपक मशाल जी ''की और ''डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री जी ''की रही .एक और दीपक जी पुरुस्कृत सभी ब्लोगर्स का पक्ष लेते हैं जबकि शिखा जी द्वारा किसी भी ब्लोगर पर कोई आक्षेप किया ही नहीं गया है उनका आक्षेप केवल चयन प्रक्रिया पर है तो दूसरी और डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री जी ''खट्टा मीठा तीखा पचाने की सलाह देते हैं भूल जातेहै कि ''जो डर गया वो मर गया'' की उक्ति आजकल के नए ब्लोगर्स के सर चढ़कर बोल रही है.दोनों में से कोई भी आलेख के मर्म तक नहीं पहुँचता जिसका साफ साफ कहना है कि पहले आप सम्मान दिए जाने के दिशा निर्देश तैयार कीजिये और जिस तरह अन्य पुरुस्कारों के आयोजन में होता है नामांकन चयन इत्यादि  प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही सम्मान के हक़दार का चयन कीजिये. अन्यथा जैसा कि सभी सम्मानों के आयोजन में विवाद पैदा हो जाते हैं वैसा ही यहाँ हो जाने में कोई देर नहीं है.
                साथ ही दीपक 'मशाल' जी ने तो हद ही कर दी उन्होंने तो शिखा जी को यहाँ तक कह दिया कि ''वे भी एक इनाम लिए बैठी हैं''उन्हें यह जानकारी तो होनी ही चाहिए कि शिखा जी ने ये पुरस्कार महाभारत-१ के नाम से आयोजित प्रतियोगिता में जीता है और इसमें क्रमवार ढंग से सभी कुछ किया गया था.पहले प्रतियोगिता का विषय घोषित किया गया फिर भाग लेने की तिथि निर्धारित की गयी उसके बाद क्रमवार अभ्यर्थियों के आलेख प्रकाशित किये गए और अंत में डॉ.श्याम गुप्त जी  और डॉ.अनवर जमाल जी को निर्णायक के रूप में निर्णय करने के लिए कहा गया अंत में उन आलेखों में से चयन किये जाने के बाद शिखा जी को विजेता घोषित किया गया.क्या ऐसी पारदर्शिता वे इन सम्मान समारोह में अपनाई गयी ,अपने तर्कों द्वारा साबित कर सकते हैं?जिन सम्मान समारोहों के पक्ष में वे खड़े हैं उनमे केवल अंतिम स्थिति दिखाई देती है और वह है ''विजेता घोषित करने की''उससे पहले चयन प्रक्रिया का कोई नामो-निशान नहीं है.और रही पुरुस्कार पाने वाले ब्लोगर्स के लेखन आलेखन क्षमता की तो वह देखना निर्णायक मंडल का काम है हमारा नहीं.
                           आज यदि हम देखते हैं तो हमें इस बात पर गर्व होता है कि हम ब्लॉग जगत से जुड़े हैं उस ब्लॉग जगत से जो देश की समस्याओं को उठाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है और दे भी रहा है.ऐसे में यदि यहाँ कोई गलत बात सर उठाती है तो उसे कुचलने में हर जागरूक ब्लोगर को अपना योगदान देना चाहिए न कि लेखक की व्यक्तिगत महत्वकांक्षा पूरी न होने जैसी तुच्छ बात कह कर उसे हतोत्साहित करने का प्रयास किया जाना चाहिए.स्पष्ट तौर पर शिखा जी के आलेख का मर्म यही है कि ये सम्मान समारोह क्योंकि पूर्ण रूप से पारदर्शिता पर आधारित नहीं हैं इसलिए मात्र ढकोसला बन कर रह गए हैं ऐसे में इससे अच्छा यही है कि ''ब्लोगर मीट'' का आयोजन हो जहाँ हर कर्त्तव्य निष्ठ ब्लोगर को अन्य ब्लोगर का प्यार व् सराहना मिले कवि श्रेष्ठ ''दुष्यंत सिंह ''के शब्दों में मैंने उनके आलेख का यही मर्म समझा है-
   ''हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
   इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.
   सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
    मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.''
                                  शालिनी कौशिक 
              शिखा कौशिक जी का आलेख आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं-
              

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