हे !चित्रकार
तुम्हे लज्जा नहीं आयी ?
जब तुमने एक स्त्री का
निर्वस्त्र चित्र बनाया ?
क्या उस समय
तुम्हें यह भी स्मरण
नहीं रहा कि
''तुम ''एक ''स्त्री ''
के गर्भ से उत्पन्न हुए हो ?
तुम्हरी तूलिका भी
तो स्त्रीलिंग है !
उसी से पूछ लेते
और कला को कलंकित
करने वाले
जरा इस पर भी
तो ध्यान देते
''कला की देवी भी
स्त्री है ''
धिक्कार है पुरुष की
इस सोच पर जो
स्त्री को निर्वस्त्र कर
अपना लक्ष्य साधता है
बस इसी तरह पुरुष
स्त्री के लिए बनाई गयी
हर सीमा को लांघता है ,
एक बात सुनो
तुमने विचारों को
लक्ष्य कर कोई कृति
क्यों नहीं बनाई,
तुम स्त्री देह में
ही उलझकर क्यों रह गए ?
तुम तो पुरुष हो न !
तुम्हारे पास तो मेधा
है ,स्त्री की तरह
तुम्हारी अक्ल भी
घुटनों में चली गयी
थी क्या ?
तुमने वैसे कोई
नया काम तो नहीं
कर दिया जो तुमने
अपनी रचना को
प्रदर्शनी में
रख दिया ,
तुमने तो दुशासन
का ही अनुसरण किया है ,
'अरुंधती' को 'द्रौपदी '
की भांति जनता
की सभा में निर्वस्त्र
करने का प्रयास ,
फिर कहती हूँ
धिक्कार है तुम पर ,
तुम्हारी पुरुष सोच पर ;
तुम्हरी कला पर ;
तुमने ये दुष्कर्म किया
तुम्हरी माता ने
नौ माह तुम्हे
गर्भ में रखकर
व्यर्थ ही जन्म दिया !
3/27/2011 03:38:00 pm
Shikha Kaushik
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