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रविवार, 1 मई 2011

श्रृद्धांजलि --... डा श्याम गुप्त ....

          निर्मोही  -----

कितना निर्मोही है ये जीव,
ये आत्मा, ये जीवात्मा |                

चलदेता है तोड़कर ,
 एक ही पल में-
 सारे बंधन, रिश्ते नाते
 उन्मुक्त आकाश की ओर;
निर्द्वंद्व, निर्बाध,स्वतंत्र, मोहमुक्त ,
मुक्ति की ओर |
और पीछे रहजता है -
माटी का शरीर,
सड़ने को गलने को  या फ़िर -
जलने को ,
उसी माटी में मिलने को |

यही गति है शरीर की,
यही मुक्ति है आत्मा की |

पर क्या वस्तुत : यह जीव -
मुक्त होजाता है ,
संसार से ?
कैद रहता है वह,  सदा-
 मन में;
आत्मीयों के याद रूपी
बंधन में , और-
हो जाता है अमर |

अमरत्व व मुक्ति सर्वथा भिन्न हैं,
फिर भी-
एक ही  सिक्के के दो पहलू हैं |
अत: मुक्त होकर इस जगत से,
बंधन से;
विश्व में ही-
अमरता के बंधन में ,
जीव बंध जाता है ;
सिर्फ उसका आयाम बदल जाता है |

 यही मृत्यु है,
यही अमरता;
यही मुक्ति,
यह जीवन सरिता ||

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य--चतुर्थ सुमनान्जलि--प्रकृति - प्रथम गीत-भ्रमर-गीत...डा श्याम गुप्त...




  प्रेम काव्य-महाकाव्य--गीति विधा  --     रचयिता---डा श्याम गुप्त  

  ------ प्रेम के विभिन्न  भाव होते हैं , प्रेम को किसी एक तुला द्वारा नहीं  तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत  चतुर्थ -सुमनांजलि- प्रकृति - में प्रकृति में उपस्थित प्रेम के विविध उपादानों के बारे में,  नौ विभिन्न अतुकान्त गीतों द्वारा प्रस्तुत किया गया है जो हैं--भ्रमर गीत, दीपक-राग, चन्दा-चकोर, मयूर-न्रित्य, कुमुदिनी, सरिता-संगीत, चातक-विरहा, वीणा-सारंग व शुक-सारिका... । प्रस्तुत है प्रथम गीत---भ्रमर-गीत.....

भ्रमर !
तुम कली कली का रस चूसते हो,
क्यों ?
मकरंद लोलुप बन,
बगिया की गली गली घूमते हो,
क्यों ?
दुनिया तुम्हें, निर्मोही-
प्रीति की रीति न निबाह्ने वाला ,
कली कली मधु चखने वाला, समझती है;
न जाने क्या क्या उलाहने देती है,
क्यों ?
क्यों न दे !
तुम से अच्छी तो मधुमक्खी है,
रस पीकर,
मकरंद से मधु तो बनाती है;
लेने के प्रतिदान में 
प्रीति की रीति तो निभाती है॥


तितलियां,
रंग-बिरंगी छवि से
जन जन का मन,
हर्षित तो करती हैं।
मन में प्रेम, उल्लास व-
प्रेम-आकांक्षा तो भरती हैं॥


भ्रमर !
तुम कृष्ण वर्ण हो,
प्रेम के प्रतीक, कृष्ण के वर्ण ;
फिर भी- रसास्वादन का ,
प्रतिदान नहीं देते ,
क्यों ?

कलियो !
तुम क्यों मकरंद बनाती हो ?
अपनी सुरभि से ,
भ्रमर जैसे निर्मोही को लुभाती हो;
अपनी प्रेम सुरभि को ,
व्यर्थ लुटाती हो ?

कलियाँ हँसीं,
मुस्कुराईं ;
अपना सौरभ बिखेरकर ,
खिलाखिलायीं |
प्रेम का अर्थ होता है-
देना ही देना ,
देते ही जाना |
निर्विकार भाव से,
बिना प्रतिदान मांगे,
बिना प्रतिदान पाए -
जो देता ही जाए ,
वही सच्चा प्रेमी कहाए ||

मांगे बिना भी -
भ्रमर सबकुछ देता है |
कलियों के  सौरभ-कण रूपी -
प्रेम-पाती को ,
बांटता है, प्रेमी पुष्पों में ;
वाहक बनकर-
सौरभ-कणों का |
पुष्पित होता है तभी तो,
बन बहार,
हर बार ,
सुमनांजलि बनकर ,
प्रेम संसार ,
नव-सृजन श्रृंगार ,
सृष्टि का आधार ||    ----क्रमश:   अगला गीत..दीपक राग....

 

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