
9/14/2011 08:04:00 pm

कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹
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हिन्दी से सबको सबसे, हिन्दी को है पूरी आशा ,
फले-फूले दिन-रात चौगुनी ,जन-मानस की भाषा ।
इसमें निहित है हमारे पूरे , देश राष्ट्र -धर्म की मर्यादा ,
जितना इसका मंथन होता ,बढ़े ज्ञान अमृत और ज्यादा ।
बदल रहें इसके कार्य -क्षेत्र ,बदल रही सीमा परिभाषा,
आभाषी मन मचल रहे हैं ,ले एक नयी उर में जिज्ञाषा ,
इसमें समाहित है महा-कुम्भ ,रस, श्रृंगारों,भावों और छंदों का ,
हर शंकाओं-आशंकाओं का समाधान ,मन के अन्त्रद्व्न्धों का ।
हर भाषा है महान देश के साहित्यिक -गौरव की समृधि है ,
'कमलेश' पर हर भाषा की सिरमौर ,मार्तु -भाषा ''हिन्दी'' है ॥...जय-हिन्दी ........

4/04/2011 09:10:00 am

Nirantar
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पिताजी
बचपन में कहते थे
लोगों से मिला करो
हाल चाल जाना करो
अपनों को याद करा करो
चिठ्ठी पत्री लिखा करो
हाल अपना बताया करो
अच्छा साहित्य पढ़ा करो
मन को स्वस्थ रखा करो
बड़ों का सम्मान दिया करो
केवल अपना ना सोचा करो
चिंता सब की करा करो
शर्म लिहाज रखा करो
अब बच्चों से सुनता हूँ
मतलब हो तो मिला करो
चैटिंग से बात करा करो
एस ऍम एस भेज
काम चलाया करो
फेस बुक पर
हाल चाल बताया करो
इंटरनैट पर पढ़ लिया करो
उम्र की ना सोचा करो
छोटों,बड़ों को
बराबर समझा करो
जानो नहीं तो
बात भी ना करा करो
परवाह किसी की मत करो
निरंतर अपनी सोचा करो
खुल्लम खुल्ला प्यार करो
शर्म लिहाज को ताक़
में रखो
04-04--11
592—25 -04-11

3/25/2011 07:07:00 pm

Nirantar
3 comments
कौन है जिसने
ख्वाब नहीं देखे
कुछ पूरे हुए,
कुछ अधूरे रहे
फिर क्यों इंसान
निरंतर रोता रहता
जो बीत गया
उसमें खोता रहता
भविष्य की
चिंता में घुलता रहता
वर्तमान में दुखी रहता
जो मिला
अब तक जानो उसे
धन्यवाद इश्वर को दो
बेहतर की उम्मीद करो
बोझ ना
उसका मन में रखो
मिले ना मिले,
मर्जी खुदा की समझो
ना मारो खुद को पल पल
हर पल जिया करो
सन्देश दुनिया को
भी दिया करो
25-03-03
504—174-03-11

3/24/2011 07:32:00 pm

Nirantar
1 comment
क्यों सोचते
तुम हो अकेले
वो भी साथ तुम्हारे
जो नाम तुम्हारा
नफरत से लेते
दिन रात तुम्हें कोसते
चर्चे शहर में करते
चाहते नहीं तो क्या
निरंतर याद तो करते
जो भी है दिल में
साफ़ साफ़ बताते
बेहतर हैं उनसे
जो अपना तो कहते
दिल में जहर रखते
भूले से याद ना करते
देख कर मुस्काराते
पीछे से मुंह चिडाते
इधर हाथ मिलाते
उधर खंजर मारते
24-03-03
497—167-03-11

3/23/2011 10:13:00 am

Nirantar
1 comment
क्या से
क्या हो गया
पहले दाल रोटी में
खुश था
अब पकवानों से भी
पेट नहीं भरता
पहले कोई शिकायत
नहीं थी
अब शिकायतों का
अम्बार लग गया
आराम से बैठता था
चैन से सोता था
अब निरंतर दौड़ रहा
नींद के आगोश में
मुश्किल से खोता
पता है मुझे ये सब
क्यों हुआ
तृष्णा के जाल में
फँस गया
जितना निकलना
चाहता
उतना ही फंसता
जाता
तृप्त से अतृप्त हो
गया
भ्रम जाल में फँस
गया
और पाने की चाहत में
खुद को भूल गया
माया को सुकून
समझा
उस में ही उलझ
गया
जीवन रहस्य समझ
गया
23-03-03
479—149-03-11

3/22/2011 07:30:00 pm

Nirantar
1 comment
बूँद पानी की
आँखों से निकले
अश्क कहलाती
हाल-ऐ-दिल बयाँ
करती
सीप में रूप मोती का
लेती
प्यासे के मुंह में गिरे
प्यास उसकी बुझाती
गर जिस्म से टपके
अहसास मेहनत का
कराती
पेशानी पर छलके तो
परेशानी मन की
बताती
छोटी होते हुए भी
निरंतर कारनामे बड़े
करती
रास्ता कामयाबी का
दिखाती
जज्बा हो तो
मंजिल दूर नहीं होती
हर छोटी चीज़,
छोटी नहीं होती
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
475—145-03-11