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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य--तृतीय सुमनान्जलि.. कविता....मधुमास रहे..---डा श्याम गुप्त...



  प्रेम काव्य-महाकाव्य--गीति विधा  --     रचयिता---डा श्याम गुप्त  

  -- प्रेम के विभिन्न  भाव होते हैं , प्रेम को किसी एक तुला द्वारा नहीं  तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत  सुमनांजलि- प्रेम भाव को ९ रचनाओं द्वारा वर्णित किया गया है जो-प्यार, मैं शाश्वत हूँ, प्रेम समर्पण, चुपके चुपके आये, मधुमास रहे, चंचल मन, मैं पंछी आजाद गगन का, प्रेम-अगीत व प्रेम-गली शीर्षक से  हैं |---प्रस्तुत है  प्रेम का एक और भाव ... पंचम रचना --मधुमास रहे  ....
 
 
 
 
            मधुमास रहे  ....
हम तुम चाहे मिल पायं नहीं ,
जीवन में न तेरा साथ रहे |
मैं यादों का मधुमास बनूँ ,
जो प्रतिपल तेरे साथ रहे ||
 
तू   दूर  रहे या पास रहे,
यह अनुरागी मन यही कहे |
तेरे जीवन की बगिया  में,
जीवन भर प्रिय मधुमास रहे ||
 
जब याद करूँ मन में आना,
मन-मंदिर को महका जाना |
यादें तेरी मन में मितवा,
बन करके सदा मधुमास रहे ||
 
जीवन वन भी है, उपवन भी,
हे वन माली ! यह ध्यान रहे |
दुःख के काँटों, सुख की कलियो-
की मह-मह से गुलज़ार रहे || 
 
दुःख का पतझड़ सुख का बसंत ,
कष्टों की गर्म बयार बहे |
पर तेरे प्यार की खुशबू से,
इस मन में सदा मधुमास रहे ||   ----क्रमश: 

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