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सोमवार, 18 अप्रैल 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य--तृतीय सुमनान्जलि( क्रमश:)...प्रेम-अगीत :.---डा श्याम गुप्त


  प्रेम काव्य-महाकाव्य--गीति विधा  --     रचयिता---डा श्याम गुप्त  

  -- प्रेम के विभिन्न  भाव होते हैं , प्रेम को किसी एक तुला द्वारा नहीं  तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत  सुमनांजलि- प्रेम भाव को ९ रचनाओं द्वारा वर्णित किया गया है जो-प्यार, मैं शाश्वत हूँ, प्रेम समर्पण, चुपके चुपके आये, मधुमास रहे, चंचल मन, मैं पंछी आजाद गगन का, प्रेम-अगीत व प्रेम-गली शीर्षक से  हैं |---प्रस्तुत है  प्रेम का एक और भाव - अष्टम  रचना... प्रेम अगीत .......( ये लयबद्ध गतिमय अगीत छंद  हैं, जो अतुकान्त व सोलह मात्रिक, -६ से १० पन्क्तियों तक हो सकते हैं),,,
१-
गीत तुम्हारे मैने गाये,
अश्रु  नयन में भर भर आये |
याद तुम्हारी घिर घिर आयी,
गीत नहीं बन पाए मेरे |
अब तो तेरी ही सरगम पर,
मेरे गीत ढला करते हैं |
मेरे ही रस छंद भाव सब,
मुझ से ही होगये पराये ||

२-
गीत मेरे तुमने जो गाये,
मेरे मन की पीर अजानी -
छलक उठी ,आंसू भर आये |
सोच रहा, बस जीता जाऊं ,
गम के आंसू पीता जाऊं |
गाता रहूँ गीत बस  तेरे,
बिसरादूं सारे जग के गम ||
३-
जब जब तेरे आंसू  छलके ,
सींच लिया था मन का उपवन |
मेरे  आंसू,   तेरे मन  के-
कोने को भी भिगो न पाए |
रीत गयी नयनों की  गगरी ,
तार नहीं जुड़ पाए मन के |
पर आवाज़ मुझे दे देना,
जब भी आंसू छलकें तेरे ||
४-
श्रेष्ठ कला का जो मंदिर था,
तेरे गीत  सजा मेरा मन |
प्रियतम तेरी विरह-पीर में,
पतझड़ सा वीरान होगया |
जैसे धुन्धलाये शब्दों की,
धुंधले अर्ध-मिटे चित्रों की,
कलावीथिका एक पुरानी ||

५-
खुशियों का वह ताजमहल, 
जो हमने -तुमने चाहा था |
आज स्वयं ही सिसक रहा है,
वादा नहीं निभाया तुमने |
ताल नदी और खेत बाग़ वन,
जहां कभी हम तुम मिलते थे |
कोई सदा नहीं देते अब,
तुम जो साथ नहीं हो मेरे ||

६-
तुम जो सदा कहा करती  थीं ,
मीत सदा मेरे बन रहना |
तुमने ही मुख फेर लिया क्यों,
मैंने तो कुछ नहीं कहा था |
शायद तुमको नहीं पता था,
मीत भला कहते हैं किसको |
मीत शब्द को नहीं पढ़ा था,
तुमने मन के शब्द कोष में ||

७-
बालू से सागर के तट पर,
खूब घरोंदे गए उकेरे |
वक्त के ऊंची लहर उठी जब,
सब कुछ आकर बहा लेगई |
छोड़ गयी कुछ घोंघे-सीपी,
सजा लिए हमने दामन में ||
८-
वक्त का दरिया जब जब उमड़ा,
बहा लेगया, बचा नहीं कुछ |
ऊंचे ऊंचे,  गिरि-पर्वत सब,
राज पाट और महल, तिमहले|
बड़े -बड़े    तीरंदाजों   ने ,
सदा वक्त से मुंह की खाई |
तुम तो वक्त का इक टुकड़ा हो,
बस मेरा दिल ठुकरा पाए ||

९-
तेरे मन की नर्म छुअन को,
वैरी मन पहचान न पाया |
तेरे तन की तप्त चुभन को,
मैं था रहा समझता माया |
अब बैठा यह सोच रहा हूँ,
तुमने क्यों न मुझे समझाया |
ज्ञान ध्यान तप योग धारणा,
में , मैंने इस मन को रमाया |
यह भी तो माया संभ्रम है,
यूं ही हुआ पराया तुम से ||
१०-
मेरी कविता के स्वर जैसी,
प्रियतम तुम सुमधुर लगती हो |
छंद  भाव  रस  अलंकार की,
झनक झनक पायल झनकाती |
तुलसी  मीरा  सूरदास के -
पद के भक्ति-भाव छलकाती |
नयी विधा को लेकर उतरी,
वह अगीत कविता सी तुम हो ||





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