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मंगलवार, 29 मार्च 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य -- द्वितीय सुमनान्जलि-- सृष्टि .----डा श्याम गुप्त

    प्रेम काव्य-महाकाव्य--गीति विधा  -- सृष्टि   
           रचयिता---डा श्याम गुप्त   
---विश्व में प्रेम का मूल प्रादुर्भाव ब्रह्म की सृष्टि-इच्छा, ईशत इच्छा --एकोहं बहुस्याम -- के मूल अहं रूप में प्रस्फुटित हुआ  ; जो आदि-शम्भु व माया के संयोग से कामबीज के रूप में स्थित हुआ , जिनसे सारी सृष्टि हुई | तदुपरांत  शम्भु-महेश्वर के लिंग व योनि रूप में लौकिक रूप में संसार में अवस्थित हुआ  |  ---प्रस्तुतु है द्वितीय सुमनांजलि--सृष्टि ...जो कुंडली छंद में रचित है.......कुल छंद ८....

अ.-सृष्टि -सार --
ईश्वर, ईशत अहं के, मध्य आदि और अंत |
एकोहं-बहुस्याम  की,  इच्छा परम अनंत |
इच्छा परम अनंत,जगत की आदिम कारक |
यही अहं संकल्प, प्रेम जग का परिचायक | 
करे 'श्याम, संकल्प, शांत सत्ता में हलचल |
कम्पन से गति शब्द वायु मन  और  जल ||

मन से तन्मात्रा हुई,  अहंकार और स्वत्व ,
बने प्रेम औ भावना, जल से सब जड़ तत्व |
जल से सब जड़ तत्व,अहं से बुद्धि-वृत्ति सब ,
विश्व प्रेम वश, ईश-अहं से सजता यह जग | 
कहें 'श्याम, जग, आदि अंत स्थिति लय कर्ता , 
जो है स्वयं  असीम, ससीम२  स्वयं को  करता  ||
ब-भगवत प्रादुर्भाव--
जग के कारण-मूल की, सत्ता थी अव्यक्त,
लक्षण हीना,शांत-चित, प्रकृति तम-आवृत्त | 
प्रकृति तम-आवृत्त, आदि इच्छा लहराई ,
आदि शम्भु३  हुए प्रकट,शक्ति अपरा४  मुस्काई |
अपरा-शम्भु संयोग से,श्याम, हुआ महत्तत्व५  ,
कामबीज के रूप में,  व्यक्त हुआ अव्यक्त ||
स -ब्रह्मा प्रादुर्भाव -- 
थे चिद्बीज,असीम के,कण कण में संव्याप्त६  ,
रोम -रोम हेमांड थे, ब्रह्मा सब में व्याप्त |
 ब्रह्मा सब में व्याप्त, घूमता रहा साल भर ,
क्यों हूँ, क्या हूँ, नहीं कभी, कुछ समझ सका पर |
वाणी ने  दी प्रेरणा,  करने  प्रभु का ध्यान ,
प्रकट हुआ बन चतुर्मुख , ब्रह्मा रूप -निधान ||

जल में उस परमात्मा , का जो अंश स्वरुप,
विष्णु नाम से शयन रत, नारायण के रूप |
नारायण के रूप,  सृष्टि की इच्छा  में रत ,
स्वर्णनाल पर स्वर्णकमल फिर प्रकट हुआ तब |
श्याम, कमल पर ब्रह्म तब, प्रकटा ब्रह्मा रूप,
सृजन हेतु सब प्राणि  औ, वेद प्रकृति रस रूप ||



द---सृष्टि---
वीणा की ध्वनि-ज्ञान से, ब्रह्मा हुए सचेत,
पुरा-सृष्टि  के ज्ञान का, मिला  उन्हें संकेत |
मिला उन्हें संकेत, अंड को किया विभाजित,
नभ-पृथ्वी के मध्य,किया फिर जल को स्थित |
बने श्याम, मन, अहं, इन्द्रियाँ,  तन्मात्राएँ ,
क्षिति पावक सब भूत१०,काल गति और दिशाएँ ||
क -प्रजा --
सनक सनंदन सनातन,नारद, सनत्कुमार,
रमे नहीं११ ,संसार में,   ब्रह्मा  रहे विचार |
ब्रह्मा रहे विचार, चलेगा कैसे यह जग१२  ,
कार्य-ईशणा प्रकट हुई , ब्रह्मा के मन तब |
किया विभाजित स्वयं को, नर-नारी के रूप,
लिंग रूप में महेश्वर, माया योनि स्वरुप ||
 ख -- माहेश्वरी प्रजा----
माहेश्वरी प्रजा सब, माया-भगवद रूप,
लिंग-योनि रूपा हुई, मैथुनि-सृष्टि१3 अनूप |
मैथुनि-सृष्टि अनूप,प्रेम-रस की बन सरिता ,
बहती मन की राह, अंग बन, भाव-सरसता |
कहें 'श्याम, उस आदि-प्रेम की छाया-माया,
जड़ जंगम संसार बीच, बन "प्रेम" समाया ||   ----क्रमश : --तृतीय सुमनांजलि--प्रेम-भाव ....

 [कुंजिका---  १= ब्रह्म की मूल इच्छा एक से बहुत होने की, जो ओउम रूप में व्यक्त होती है और शांत अवस्था में अशांति-विकृति से सृष्टि-क्रम प्रारम्भ होता है..जो  सृष्टि के रचे जाने का मूल कारण है, इसे ब्रह्म का मानव के प्रति मूल प्रेम कहाजाता है...  २=  जगत के प्रेम के वश ही वह असीम अव्यक्त  परब्रह्म स्वयं को ससीम ईश्वरीय-सत्ता में व्यक्त करता है...  ३=  ब्रह्म की व्यक्त दो मूल भाव परा ( व्यक्त ब्रह्म भाव ) से उत्पन्न आदि-ईश्वर आदि-शंभू व ..४=अपरा ( व्यक्त आदि-शक्ति भाव ) माया ...५= दोनों के संयोग(मूल-प्रेम) से प्राप्त मूल आदि-तत्व जिससे आगे चलाकर सब कुछ निर्मित हुआ...६= दोनों के संयोग से असंख्य सृष्टि-बीज --जिससे समस्त असंख्य ब्रह्मांडों की रचना हुई ...७= रचयिता ब्रह्मा- चारमुखों वाला जो सृष्टि ज्ञान होने पर कमल-नाल पर प्रकट हुआ......८= क्षीर सागर( ईथर, शून्य-भवन , अंतरिक्ष आदि आकाश ) में स्थित ब्रह्म का स्वरुप --नार =जल ...अयन = निवास ...नारायण विष्णु ...९= सृष्टि हर कल्प में विनाश को प्राप्त होती है, तत्पश्चात पुनः रचित होती है, प्रत्येक बार ब्रह्मा उस ज्ञान को पुनः स्मरण कराये सृष्टि करता है...   १०= पदार्थ ...  ११= सनत्कुमार ..आदि सर्व-प्रथम मानव थे जो ब्रह्मा द्वारा मन-संकल्प से बने थी (अलिंगी -सृष्टि ) अतः काम भावना थी ही नहीं , वे संसार का अर्थ हेई नहीं जानते थे ...  १२=  ब्रह्मा -चिंतित हुए की मैं कब तक बनाता रहूंगा, कोइ स्वचालित -निश्चित व्यवस्था हो जो मेरे बाद स्वत संसार -रचना करती रहे...  १३= ब्रह्मा द्वारा रचित  नर व नारी का जोड़ा जिसमें शम्भु-महेश्वर के इच्छा व प्रेम के विभिन्न युग्म भाव समाहित होने से... काम-भाव -लिंग व योनि रूप में प्रकट हुए एवं सृष्टि का स्वचालित -रचना क्रम प्रारम्भ हुआ |]
 

गुरुवार, 24 मार्च 2011

प्रेम काव्य---गीति विधा महाकाव्य -डा श्याम गुप्त

    प्रेम काव्य-महाकाव्य--गीति विधा    
           रचयिता---डा श्याम गुप्त


भारतीय ब्लॉग लेखक मंच पर .... प्रेम महाभारत  के उपरान्त....प्रेम जैसे विशद विषय को आगे बढाते हुए व उसके विविध रंगों को विस्तार देते हुए ...आज से हम  महाकाव्य "प्रेम काव्य " को क्रमिक रूप में पोस्ट करेंगे । यह गीति विधा महाकाव्य में प्रेम के विभिन्न रूप-भावों -- व्यक्तिगत से लौकिक संसार ...अलौकिक ..दार्शनिक  जगत से होते हुए ...परमात्व-भाव एवं मोक्ष व अमृतत्व तक --का गीतिमय रूप में निरूपण  है | इसमें  विभिन्न प्रकार के शास्त्रीय छंदों, अन्य छंदों-तुकांत व अतुकांत  एवं विविधि प्रकार के गीतों का प्रयोग किया गया है |
          यह महाकाव्य, जिसकी अनुक्रमणिका को काव्य-सुमन वल्लरी का नाम दिया गया है -- वन्दना, सृष्टि, प्रेम-भाव, प्रकृति प्रेम, समष्टि प्रेम, रस श्रृंगार , वात्सल्य, सहोदर व सख्य-प्रेम, भक्ति श्रृंगार, अध्यात्म व अमृतत्व ...नामसे  एकादश सर्गों  , जिन्हें 'सुमनावालियाँ' कहा गया है , में निरूपित है |
      प्रथम सुमनांजलि -वन्दना..१० रचनायें--.   जिसमें प्रेम के सभी देवीय व वस्तु-भावों व गुणों की वन्दना की गयी  है .....आगे... .
          ५-माँ भारती वन्दना ...
आर्यमाता, भूमि देवी ,शस्यश्यामल धाम है |
फुल्ल कुसुमित भारती माँ , बार बार प्रणाम है ||
 
धर्म तुम हो, मर्म तुम हो,आयु यश बल दायिनी |
मन सुमन स्वीकार लो माँ, भारती हे मानिनी !
 
जो अलंकृत रह चुकी है, विश्व-गुरु सम्मान से |
चलपड़ी उन्नत-शिखर को, आज फिर नव मान से ||
मोह निद्रा त्याग, पुष्पित, नव सृजन की हो कली |
निज शक्ति बैभव ज्ञान को,फिर प्रकट करने चली ||

कर्म के हर क्षेत्र में ही, नित करे नव सर्जना |
प्रेम के बंधुत्व पथ पर,फिर करे नव गर्जना ||

फिर, विश्व गुरु भारत बने, हो प्रेम की स्थापना |
चाहता है यही आशीष, 'श्याम कर, पद वन्दना ||

        ६-ईषत-अहं-वन्दना .....
प्रेम के  ईषत-अहं१  रूप में,
जग कारक सत्ता मुस्काई |
एक से बनूँ अनंत, असीम में,
जब ईषत-इच्छा२  लहराई ||

यह इच्छा बन आदि-प्रेम,जब-
सृष्टि के कण कण में छाया|
जड़ जंगम गति जीव जगत के ,
अंतस में बन प्रेम समाया ||
 
उसी परम ईषत-इच्छा को -
कर नमन, 'प्रेम' आरम्भ करूँ |
प्रेम-कुसुम वल्लरी फले मन,
श्री चरणों में नित शीश धरूँ ||

[कुंजिका - १= मूल अहं--जिससे समस्त सांसारिक चक्र व मायाजाल की अभिव्यक्ति होती है...वह ब्रह्म का  सृष्टि -जगत के प्रति प्रेम ही है जिससे वह स्वयं को व्यक्त करके माया बंधन में बंधता है....२= मूल अहम् के जाग्रत होने पर 'एकोहं बहुस्याम ' एक से अधिक होने की मूल ब्रह्म इच्छा जिससे समस्त सृष्टि हुई...}
 

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