१- पाप-पुण्य--
" अष्टादश पुराणांयां सारं सारं समुधृतम |
परोपकार: पुण्याय:, पापाय पर पीडिनम ||"----श्रीमद भगवद गीता ...
----अट्ठारह पुराणों का सार व अन्य सारे शास्त्रों आदि में उद्धरित बातों के सार का सार यही है कि, परोपकार ही पुन्य है और दूसरों को पीड़ा पहुंचाना ही पाप है |
२-दुःख---
"भैषज्यमेतम दुखम ,यदेन्नानुचिन्तयत |"---गीता ..
-----दुखों का चिंतन न करना ही दुःख निवारण की औषधि है |
3/30/2011 08:44:00 pm
shyam gupta
Posted in: