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शनिवार, 3 मार्च 2012

इलाहाबाद परिक्षेत्र को कृष्ण कुमार यादव के रूप में मिला नया निदेशक डाक सेवाएँ

भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने इलाहाबाद रीजन के नए निदेशक डाक सेवाएँ के रूप में कार्यभार ग्रहण कर लिया है. साहित्य, लेखन और ब्लागिंग में अभिरुचि रखने वाले श्री यादव इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में परास्नातक हैं. मूलत: तहबरपुर, आजमगढ़ के निवासी श्री यादव वर्ष 2001 बैच के अधिकारी हैं. इससे पूर्व आप सूरत, लखनऊ, कानपुर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हैं. इलाहाबाद में नियुक्ति से पूर्व कृष्ण कुमार यादव अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ थे.

गौरतलब है कि इलाहाबाद रीजन, उत्तर प्रदेश परिमंडल का सबसे बड़ा डाक-रीजन है, जिसके अंतर्गत इलाहाबाद, कौशाम्बी, जौनपुर, प्रतापगढ़, वाराणसी, चंदौली, भदोही, गाजीपुर, मिर्जापुर और सोनभद्र जनपद आते हैं. इलाहाबाद में निदेशक डाक सेवाएँ का पद कई महीनों से खाली चलने के चलते आम जनता के साथ विभागीय गतिविधियाँ भी काफी प्रभावित हो रही थीं. यही नहीं पिछले माह यहाँ के पोस्टमास्टर जनरल की पदोन्नति पश्चात् इलाहाबाद रीजन मुख्यालय में शून्य की स्थिति पैदा हो गई थी. ऐसे में तेज-तर्रार और ईमानदार छवि के लिए मशहूर कृष्ण कुमार यादव की नियुक्ति इलाहाबाद रीजन में डाक सम्बंधित गतिविधियों को नए आयाम देगी. श्री यादव के पास गोरखपुर रीजन के निदेशक का भी अतिरिक्त प्रभार है, ऐसे में उनसे लोगों की आशाएं भी काफी बढ़ गई हैं.

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित नाम श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढ़ा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य-संग्रह-2005), 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह-2006 व 2007), India Post : 150 Glorious Years (2006) एवं 'क्रांति -यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' (2007) प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा. राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ (सं. डा. दुर्गाचरण मिश्र, 2009) भी प्रकाशित हो चुकी है। पचास से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/संकलनों में विभिन्न विधाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं व ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन भी आपने किया है। आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर और दूरदर्शन से आपकी कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार इत्यादि का प्रसारण हो चुका हैं।




श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और व्यक्तिगत रूप से शब्द सृजन की ओर (www.kkyadav.blogspot.com) व डाकिया डाक लाया (www.dakbabu.blogspot.com) और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ ,‘सप्तरंगी प्रेम’ ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉगों के माध्यम से सक्रिय हैं। विभिन्न वेब पत्रिकाओं, ई पत्रिकाओं, और ब्लॉग पर प्रकाशित होने वाले श्री यादव की इंटरनेट पर ’कविता कोश’ में भी काव्य-रचनाएँ संकलित हैं।


विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त श्री यादव की इलाहाबाद में नियुक्ति से इलाहाबाद से जुड़े साहित्यकारों और ब्लागरों में भी काफी हर्ष है !!

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

पत्रकार टाईप के लोग

प्रशासन ने भी कुर्सी नहीं दिया शायद वह भी .................

कैसा अजीब लग रहा है जुमला न, मैं भी सुना तो अजीब लगा था, आज मेरा भी मूड किया चलो आज मुख्यालय चलते है, परचा दाखिला है, चलना चाहिए. आम तौर पर मैं जाता नहीं हूँ ऐसी जगह, क्योंकि  न्यूज़ चैनल वालो का जाना मजबूरी है उन्हें बिजुअल बनाना है, पर प्रिंट मीडिया का काम तो फोटोग्राफर भेज कर चल जाता है. करना क्या है फोटो खींचा और प्रत्यासी का नाम लिख लिया हो गया काम......... खैर बात यह नहीं थी, मेरी सोच थी की हमारे ज्ञानपुर के कुछ पत्रकार मित्र मिल जायेंगे. मुख्यालय पहुंचा तो ज़ी न्यूज़ के दिनेश जी को फ़ोन किया वे कैंटीन में बैठे मिले, गया तो अमर उजाला के फोटोग्राफर दुर्गेश यादव और इलेक्ट्रोनिक मिडिया के रमेश मौर्य भी थे.  हाल चाल हंसी मजाक चल रहा था तभी दुर्गेश जी ने कहा अभी पत्रकार टाईप के लोग भी आते होंगे. मैं बड़ा चक्कर में पड़ा यह पत्रकार टाईप क्या है... पूछने पर कहा  अभी पता लग जायेगा.. फिर हम लोग उस जगह आये जहा से तीनो विधानसभा के प्रत्यासी मिल जाय..  प्रत्यासी आता तो उसका फोटो, फिर नाम आदि का विवरण लेकर बधाई फिर अपने बातो में मशगूल हो जाते ........... इसी बीच कई पत्रकार साथी आये, सबसे हाल चाल हुआ पर प्रश्न वही था -- पत्रकार टाईप के लोग........... यह था की मजा आ रहा था... कई जुमले छोड़े जाते थे. जैसे दुर्गेश जी जब कोई यादव प्रत्यासी आता तो कहते... दुर्भाग्य से मैं भी यादव हूँ और सबकी हंसी छूट जाती......... पर सवाल वही का वही था..... फिर चर्चा छिड़ी की आयोग ने हाथ बांध दिए,. सारी कमाई बंद कर दी....... कोई प्रत्यासी अख़बार से हाथ नहीं मिला रहा है और प्रत्यासी की भागदौड़ की खबर भी नहीं छप रही है....... प्रत्यासी  का नाम नहीं आना चाहिए नहीं तो मुर्गा नहीं फंसेगा............. छोटे नगरो में रहने वाले पत्रकारों की औकात लोग देखने लगे है..... मैं भी जानता हूँ की चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता कहा तक कलम पर रोक लगाती है. पर असली रोक अख़बार के मालिकान लगा कर बैठे हैं और हम आयोग का रोना रोते है... क्योंकि अपनी औकात भी बचानी है... ... पर सच तो हम भी जानते हैं........ फोटोग्राफर परेशान है की उसकी फोटो आजकल नहीं छप रही है जुगाड़ कैसे हो....... विज्ञापन व्यवस्थापक परेशान है क्योंकि डीलिंग तो डायरेक्ट हो रही है..... चैनेल वाले खुश है , उनकी स्टोरी बन जा रही है..... हंसी मजाक के बीच थक कर उसी घास पर बैठ जाते है और एक दूसरे से पूछते है कोई आ रहा है की नहीं..... समय बीतने के साथ मजाक भी काम होता जा रहा है.. आखिर सच्ची हंसी तो दो पल की भी काफी होती है. .... फिर दुर्गेश जी बताते है की कल एक प्रत्यासी से एक प्रेस फोटोग्रफर ने पैसे मांगे थे ... अब मिला था की नहीं मुझे नहीं पता. .. उन्ही लोंगो के बारे में बात हो रही थी........... वही थे पत्रकार टाईप के लोग...... वहा से हम और पंकज जी साथ चले तो ज्ञानपुर मिथिलेश जी से मिलने आ गए..... जब मैं दैनिक जागरण में लिखता था तो. .. मिथिलेश जी से मेरी खूब बनने लगी और आज भी खूब बनती है... फिर वही लिखने की बात .. अपनी मजबूरियां..... फिर वापस ऑफिस आया और समाचार लिख कर भेजा........
पर पता नहीं क्यों मैं अभी तक उस  बात से सहमत नहीं हो पाया हूँ.......आखिर पत्रकार टाईप के लोग वह कहा है... वे तो फोटोग्राफर हैं उनकी अपनी मजबूरियां है.... अख़बार क्या देता है यह सभी को पता है........ 
पत्रकार टाईप के लोग वे फोटोग्राफर कदापि नहीं है........... चुनाव में लोग जागरूकता लाने की बात करते है.. अच्छे बुरे को पहचानने की बात करते है.. आखिर समाज का एक बड़ा तबका अख़बार पर ही विश्वास करता है.... जो शिक्षित है वह पढ़कर उन्हें भी बताता है जो गाव में रहते है और उन तक समाचार माउथ मिडिया पहुंचता है... पत्रकारों को सच लिखने की छूट क्यों नहीं दी जाती, सच बताने की छूट क्यों नहीं दी जाती----- आखिर एक पत्रकार यह क्यों नहीं बता सकता की कौन अच्छा है और कौन बुरा.. कौन हमारा रहनुमा बनने की क़ाबलियत रखता है...कौन नहीं........... ऐसा करेंगे तो हम आचार संहिता का उलंघन करेंगे... और अख़बार मालिक के गुस्से के शिकार होंगे...... भले ही हमारा मान सम्मान चला जाय,,,,,,,,, 
सच तो यह है की हम सभी पत्रकार ------- पत्रकार नहीं -------- पत्रकार टाईप के ही है..........

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