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शनिवार, 11 जून 2011

मन की खिड़की,दिल का दरवाज़ा खुला रखता हूँ

मन की खिड़की
दिल का दरवाज़ा खुला
रखता हूँ
मेहमानों का निरंतर
इंतज़ार करता हूँ
सब्र नहीं खोता
किस जात,
किस रंग का होगा ?
कब आयेगा ?
नहीं सोचता
दिल के सौदे में कोई
मोल भाव नहीं करता
हर आने वाले का
इस्तकबाल करता
दिल मिले 
जब तक रखता हूँ
ना मिले तो प्यार से
विदा करता
हूँ
ना मलाल करता
ना रंज कोई रखता
हूँ
नए मेहमान से
मिलने का अरमान
कभी ख़त्म नहीं होता
उम्मीद में
वक़्त गुजारता हूँ
11-06-2011
1033-60-06-11

गुरुवार, 9 जून 2011

क्या दिल हमेशा सही राय देता है?


हते हैं कि दिल हमेशा सही होता है और आपको किसी भी बात पर या सोच पर अपनी राय सही और सकारात्मक दिशा में ही देता है. अगर आप कोई भी कार्य करने जा रहे हैं जो ग़लत है तो दिल आपको आगाह कर देता है कि यह कार्य सही नहीं है. ख़ुद पर आज़मा कर देखिये कि क्या यह सही राय नहीं देता !? अगर आप शराब पीते हैं तो भले ही आप शराब पी कर खुश होते हों मगर पीने के चन्द क्षणों पहले ही आपका दिल आपको आगाह कर देता है कि शराब पीना ग़लत बात है और आपको नुक्सान ही पहुंचाएगी लेकिन आप तुरन्त दिल की बात को नज़र अन्दाज़ करने के लिए कहता है और आप शराब को पीने लगते हैं. इसी तरह के तमाम वो काम जो कि ग़लत हैं को करने से पहले दिल फ़ौरन मना कर देता है. 

लेकिन सवाल है कि दिल के लाख मना करने के बावजूद इंसान ऐसा क्यूँ करता है? कभी सोचा है आपने !? चलिए मैं बताता हूँ... ! उसकी एक वजह है जिस इन्सान के दिल और दिमाग़ में कोई कालापन नहीं होता है वह अपने दिल या दिमाग़ दोनों की संतुष्टि के बाद कोई भी ऐसा कार्य नहीं करता है और सही और सकारात्मक रास्ते को अख्तियार कर लेता है वहीँ जिन इन्सान के दिलों में कालापन भरा होता है उसका दिल भी सही काम करने के लिए आगाह नहीं करता बल्कि ग़लत कार्य करने के लिए उकसाता है. यही वजह है कि इन्सान तमाम ऐसे ग़लत कार्य करता ही चला जाता है और उसमें सुधार की गुन्जाईश ख़त्म हो जाती है. वह इन्सान तभी सुधरता है जब उसके ग़लत कार्य का घड़ा भर जाता है अथवा उसको उनके कृत्य की भरपूर सज़ा मिल जाती है. कुछ लोग तो उसके बाद भी अपना उक्त प्रकार का कृत्य जारी रखते हैं और ज़िन्दगी भर अँधेरे में ही जीवन व्यतीत कर देते हैं क्यूंकि उनको उन अंधेरों में ही मज़ा आता है.

कुरआन में लिखा है -   "वे बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं और वे अब लौटने के नहीं.- सुरह अल-बकरा, अध्याय-2, श्लोक-18

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

ख्वाब...






जितनी दूरी उतने ख्वाब
फिर भी ना जाने क्यों दिल उदास !
खोने की कोशिश में पाने का अहसास
दिन और रात के संग्राम में
भोर के तारे की आवाज !
फिर भी ना जाने क्यों
म्रत्यु में जीवन का आभास !
डूबती उतरती सांसों में
कहीं एक करुणा भरा आर्तनाद !
फिर भी ना जाने क्यों
गुमनाम अँधेरे में भी रास्तों की तलाश !
जितनी दूरी उतने ख्वाब
फिर भी ना जाने क्यों दिल उदास ......!!



प्रियंका राठौर

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