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सोमवार, 14 मार्च 2011

मनोरंजन बनाम अश्लीलता---------मिथिलेश

वर्तमान समय में सर्वोपरी है । हमें सिर्फ लाभ होना चाहिए चाहे उसके बदले नैतिकता ही क्यों ना दाव पर हो । पूंजीवाद का ऐसा दौर भी आयेगा कभी सोचा ना था । मनोरंजन की शुरुआत की गई मानवजीवन से नीरसता दूर करने के लिए , बाद में इसका स्वरुप थोड़ा बदला । मनोरंजन के साथ.साथ इसका प्रयोग संदेश वाहक के रुप में भी किया जाने लगा । कहानी, नाटक कथा आदि इसके प्रमुख स्त्रोत रहे । धीरे-धीरे विज्ञान ने प्रगति की जिसके चलते सूचना तंत्र का मोह रुपी मकड़जाल घर-घर में पहुँच गया । विज्ञान की प्रगति प्रशस्ति के योग्य है, जिसकी प्रशंसा अवश्य होनी चाहिए लेकिन तब जब वह प्रगति हमारे सांस्कृतिक व पारिवारिक मूल्यों को विकास के पथ की ओर ले जाए ना कि पतन की ओर । आज मनोरंजन के नाम पर घर-घर में अश्लीलता परोसी जा रही है। 1982 में एशियाड के दौरान बड़े-बड़े स्टेडियम बने। उन्ही के साथ भारत में रंगीन टेलीविजन आने लगे। पहले इनके दाम ज्यादा थे किंतु प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने की वजह से इनके दामों में अपार कमी आई और इनकी पहुँच घर-घर में हो गई । शुरूआती दौर में मात्र दो चैनल आते थे और रामायण,महाभारत जैसे महाग्रंथों पर आधारित धारावाहिको का प्रसारण होता था, तब मैं बहुत छोटा था, लोग बताते हैं कि जिस समय रामायण या महाभारत का प्रसारण होता था सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था , क्या हिंदू क्या मुस्लिम क्या ईसाई सब इंतजार में लगे रहते थे कि कब रामायण शुरु हो ।

एक वह युग था और एक आज का दौर हैं । आज धारावाहिक, सिनेमा वह सब दिखा रहा है जो हमारे संस्कृति के विरुद्ध है । धारावहिकों, फिल्मों में खुले यौन संबंध , विवाह से पूर्व यौन संतुष्टि इन सबकी वकालत की जा रही है। सारा समाज ही गंदा नजर आ रहा है। अब जब भारत विकास के पथ पर अग्रसर है जाहिर सी बात है विकास का दौर हर क्षेत्र में चलेगा। अभी हाल ही में एक फ़िल्म आई नो वन किल्ड जेसिका फिल्म ने सारे रिर्काड तोड़ दिए फूहड़ता के। पहले फिल्मों में जब गालियां या कुछ अनुचित शब्दों का प्रयोग होता था तब बीप की आवाज आती थी लेकिन अब ये सूक्ष्म पर्दा भी ना रहा। हमारी युवा पीढ़ी अक्सर इन फिल्मों की नकल करने की कोशिश में रहती है । मनोरंजन के नाम पर टीवी और फिल्मों के माध्यम से जो कुछ परोसा जा रहा है उसपर स्वस्थ चिंतन अतिआश्यक हो गया है । आज की नवजात पीढ़ी समय से पहले जवान हो रही है , उसे हिंसा , अश्लीलता तथा फंटासी में ही चरम आनंद मिल रहा है। पिछले दिनों कई ऐसी घटनाएं घटी जो फिल्मों से प्रेरणा स्वरुप की गई । हमारा देश अपने संस्कृति अपने संस्कारो के लिए जाना जाता है। हमारे यहॉं की संस्कृति परिवारवाद पर टीकी है लेकिन पाश्चात्य सभ्यता के चोचलों ने इसे बाजारवाद ला बिठाया है । जहॉं टीवी पर धरावाहिको और रिएलिटी शो के माध्यम से सुंदरियों की खोज की जी रही है वहीं फिल्मों के माध्यम से लड़कियां पटाने के तौर तरीके सिखाए जा रहे हैं। वाजारवाद चारो तरफ छाया है , सेक्स ही सब कुछ रह गया बाकी सब गौण ।

कुकल्पनाओं पर आधारित धारावाहिकों, फिल्मों को तवज्जों दी जा रही है । धारावाहिको में महिलाओं को कुचक्र रचते हुए दर्शाया जा रहा है, फिल्मों में गालियां बकते हुए, जिससे नारी की भाव-संवेदना समर्पण की गरिमा एक ओर एवं विघटनकारी स्वरुप दूसरी ओर हावी हो रहा है। मनोरंजन के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा उससे हमें हैरानी नही होनी चाहिए कि अगर हम अपनी भारतीयता की पहचान खो दे । जरुरी है अश्लीलता को पाबंद किया जाए तथा ललित कलाओं को फिर से पुनर्जीवित कि जाए, टीवी और फिल्मों के माध्यम से सामाजिक नवचेतना का संचार किया जाए।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

यूपीखबर ने कहा "एलबीए ब्लोगर का सबसे बड़ा संगठन"

सम्मानित मित्रों, जब हमने उत्तरप्रदेश ब्लोगर एसोसिअसन का गठन किया था, तब मेरी मंशा थी एक ऐसे परिवार के संरचना की जो आपस में आत्मिक रूप से जुड़े, एक दूसरे से हम भले ही न मिले किन्तु हमारे बीच एक भावनात्मक रिश्ता अवश्य हो, दुनिया गोल है कहते सभी है. यानि जब कभी एक दूसरे से मुलाकात हो तो हमें यह न लगे की यह हमारी पहली मुलाकात है बल्कि यह महसूस हो की हम एक दूसरे को वर्षो से जानते है, हमारे अन्दर वैचारिक मतभेद रहते हुए भी आत्मिक जुड़ाव हो,
UBA के गठन के बाद कुछ लोंगो ने हमारे विरोध भी किए.. लोंगो ने सोचा की हम LBA के के खिलाफ एक संगठन खड़ा करना चाहते है, जी नहीं LBA ब्लोगरो का एक बड़ा संगठन है औए वह बड़ा रहेगा क्योंकि उस परिवार से भी हमारे भी आत्मिक जुडाव है,
अब हमने इस ब्लाग का नाम परिवर्तित कर यूपीखबर कर दिया है, यह नाम भले ही यूपी को दर्शाता है परन्तु इसमें जुड़ने वाले लेखक सिर्फ यूपी के ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के होंगे. यह भारतियों का एक ऐसा मंच है जिसमे ब्लागर, पत्रकार, साहित्यकार, कवि यानि सभी विधा में लिखने वाले लेखक जुड़ सकते है.
हमारी मंशा है की आप अपने क्षेत्र की खबरों के अलावा अपने जनपद व क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व, पौराणिक महत्व के भी लेख लिखे ताकि पूरे देश की संस्कृति की झलक पूर्ण जानकारी सहित इसी मंच पर सभी को मिले..
अभी इस मंच की रूपरेखा में कुछ और परिवर्तन ऐसे होंगे जो निश्चय ही आपको पसंद आयेंगे...
आइये हम सब मिलकर इस परिवार को मजबूत बनाये..
आप सभी के सहयोग की आकांक्षा सहित.......
आपका छोटा भाई.......... हरीश सिंह....

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

हम एक हैं एक रहेंगे

जैसा कि देखा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश ब्लॉगर असोसिएशन के बनने से कुछ लोग नाखुश हैं । लेकिन एक बात जो कचोट रही है वह यह कि ये नाराजगी कैसी? इनके बीच दुश्मनों का मत है कि मिथिलेश दुबे और हरीश सिंह जी ने एलबीए के साथ गद्दारी की है । ऐसा सोचने वालों के लिए ये संदेश है कि एलबीए पहले भी हमारा परिवार था अब भी है और हमेशा रहेगा । शायद कुछ लोगों के ये मालुम न था कि सलीम भाई और हम जब एलबीए नहीं बना था तब के अच्छे दोस्त और सलीम भाई मेरे बडे भाई जैसे हैं । जब मैंने और हरीश जी ऊत्तर प्रदेश ब्लॉगर असोसिएसन बनाने की सोची थी तब सलीम भाई से हमने राय ली थी और सलीम भाई ने हमारे साथ रहने की बात कही। लेकिन कुछ लोग भ्रम पाले हैं कि हमारा ये कदम एलबीए में टकराव के कारण उठाया गया , ये सरासर मनगढ़त कहानी है । एलबीए हमारा परिवार है और सब एक परिवार जैसे जुड़े है आपस में । बडे भईया अनवर जमाल जी ने हमें सराहा भी उत्तरप्रदेश ब्लॉगर्स असोसिएसन के गठन पर । शायद यही बात लोगों को पच नहीं रहा , कुछ लोग परेशान हैं कि ये लोग एक कैसे हैं, तो उनके यही कहना चाहूंगा कि हमारे बीच अगर कुछ टकराव होता भी है तो वह मात्र पोस्ट के उपर होता है न कि व्यक्तिगत रुप से । एलबीए हो उत्तरप्रदेश ब्लॉगर्स असोसिएसन हो हम सब एक हैं और एक ही रहेंगे । इसलिए उन लोगों से विनम्र निवेदन है कि जो लोग सोचते हैं कि हमारे बीच मनमुटाव है ,कृपया ऐसा कुछ ना लिखे जिससे हमें अपना रौद्र रुप दिखाना पडे़ वरना मिथिलेश और सलीम से सब वाकिफ हैं ।

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