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रविवार, 1 मई 2011

श्रृद्धांजलि --... डा श्याम गुप्त ....

          निर्मोही  -----

कितना निर्मोही है ये जीव,
ये आत्मा, ये जीवात्मा |                

चलदेता है तोड़कर ,
 एक ही पल में-
 सारे बंधन, रिश्ते नाते
 उन्मुक्त आकाश की ओर;
निर्द्वंद्व, निर्बाध,स्वतंत्र, मोहमुक्त ,
मुक्ति की ओर |
और पीछे रहजता है -
माटी का शरीर,
सड़ने को गलने को  या फ़िर -
जलने को ,
उसी माटी में मिलने को |

यही गति है शरीर की,
यही मुक्ति है आत्मा की |

पर क्या वस्तुत : यह जीव -
मुक्त होजाता है ,
संसार से ?
कैद रहता है वह,  सदा-
 मन में;
आत्मीयों के याद रूपी
बंधन में , और-
हो जाता है अमर |

अमरत्व व मुक्ति सर्वथा भिन्न हैं,
फिर भी-
एक ही  सिक्के के दो पहलू हैं |
अत: मुक्त होकर इस जगत से,
बंधन से;
विश्व में ही-
अमरता के बंधन में ,
जीव बंध जाता है ;
सिर्फ उसका आयाम बदल जाता है |

 यही मृत्यु है,
यही अमरता;
यही मुक्ति,
यह जीवन सरिता ||

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य --तृतीय सुमनान्जलि--प्रेम-भाव- रचना..मैं पन्छी आजाद गगन का... ---डा श्याम गुप्त ......

 

  प्रेम काव्य-महाकाव्य--गीति विधा  --     रचयिता---डा श्याम गुप्त  

  -- प्रेम के विभिन्न  भाव होते हैं , प्रेम को किसी एक तुला द्वारा नहीं  तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत  सुमनांजलि- प्रेम भाव को ९ रचनाओं द्वारा वर्णित किया गया है जो-प्यार, मैं शाश्वत हूँ, प्रेम समर्पण, चुपके चुपके आये, मधुमास रहे, चंचल मन, मैं पंछी आजाद गगन का, प्रेम-अगीत व प्रेम-गली शीर्षक से  हैं |---प्रस्तुत है  प्रेम का एक और भाव --सप्तम रचना...मैं पन्छी आजाद गगन का...

मैं पंछी आजाद गगन का,
 मुक्त पवन में उड़ना जानूं |
तेरे सोने के पिंजरे की ,
रीति-नीति कैसे पहचानूं ||
 
प्यार अगर करते हो मुझसे,
बंधन-मोह छोड़ना होगा |
मुक्त गगन में फैलाकर पर,
साथ साथ यूं उड़ना होगा ||
 
सिंहासन की चाह नहीं है,
वैभव का उत्साह नहीं है 
माया के सर्वोच्च शिखर  पर
पहुचूँ -मेरी राह नहीं है ||

मेरी छोटी सी कुटिया में,
तुमको स्वर्ग सजाना होगा |\
प्यार अगर करते हो मुझसे,
पर फैला कर उड़ना होगा ||
 
सोने के पिंजरे में रहकर,
यह मन अपनापन खोता है |
तुम कैसे यह भूल गए , मन-
तेरे सपनों में सोता है ||
 
सोने चांदी का तो तुमको,
मोह नहीं है ,मुझे पता है |
प्रेम-प्रीति ईश्वर की इच्छा,
अपनी तो यह नहीं खता है ||
 
प्यार में कोइ शर्त न होती,
यह तो हमें समझना  होगा |
प्यार अगर है हमको तो, इस-
मन बंधन में बंधना होगा ||
 
तेरे मुक्त पवन आँगन में,
फैलाकर पर,उड़ती गाऊँ |
जैसी भी हो तेरी कुटिया ,
प्यारा सा इक नीड़ बसाऊँ ||
 
प्यार अगर करते हो मुझसे,
मेरे मन में रहना होगा |
मेरा मन सोने का मन है,
इसमें तो बंधना ही होगा |
 
हम पंछी आजाद पवन  के,
मुक्त गगन है अपना अंतर |
साथ साथ यूं उड़ते गायें ,
नील गगन में फैलाकर पर ||
 
मैं पंछी आजाद गगन का,
फैलाकर पर उड़ना होगा |
मेरा मन सोने का मन है ,
इस पिंजरे में बंधना होगा ||

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