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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

बेटे का फ़ोन ----प्रेमकाव्य....सप्तम सुमनान्जलि -वात्सल्य (अंतिम ) - ..गीत-५....डा श्याम गुप्त..........



              प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा

सकता; वह एक विहंगम भाव है  | प्रस्तुत है सप्तम सुमनांजलि ...वात्सल्य..... इस खंड में वात्सल्य रस 
सम्बंधित पांच  गीतों को रखा गया है ....बेटी,  पुत्र,  पुत्र-वधु ,  माँ,  बेटे का फोन .......|  प्रस्तुत है  --------पन्चम  गीत----बेटे का फ़ोन .......

बेटे का है फोन, की माँ तुम,
बस चिंता मुक्त रहो |
बहुत काल तक चिंता की, पर- 
अब तुम उन्मुक्त रहो ||

दूर बहुत हूँ लेकिन यह मन,
यादों में है भटका |
समझ रहा हूँ तेरा मन भी,
हम दोनों में अटका ||

हम तो चिंता मुक्त रहे थे,
पर हम कभी न भूले, |
कैसे कैसे हमें झुलाए,
वो सावन के झूले ||

मुझको याद बहुत आती हैं,
तेरी मीठी बातें |
लोरी गाथा और कथाएं ,
वो बचपन की रातें || 
मुझको याद सदा आती हैं,
तेरी डांट सुहानी |
पापा डांटा करते थे जब,
हम करते मनमानी ||
रोज सवेरे उठो शाम को,
जल्दी ही सोजाओ |
दिन में कस कर पढो, रात में-
सपनों में खोजाओ ||
हट घटना पर एक उदाहरण ,
कहना एक कहानी |
वेद पुराण और रामायण ,
पंचतंत्र की वाणी ||

रात देर तक जाग जाग हम,
करते खूब पढाई |
तूने रातों जाग जाग कर,
काफी चाय बनाई ||

घर से बाहर देर होगई,
तेरा घबरा जाना |
कालिज से लेकर, चूहे के-
बिल तक फोन घुमाना ||

याद मुझे आती रहती हैं ,
घर आँगन की बातें |
छत पर चढ़कर आम तोड़ना,
निशि, तारों की बातें ||

तेरी सीख त्याग इच्छा से,
हम यहाँ पहुँच पाए |
पढ़ लिख योग्य बने और विद्या-
धन पद वैभव पाए ||

साथ हमारे ही अब रहना,
दूर दूर क्या रहना |
पूरा होगा तेरा सुन्दर,
मधुर सलोना सपना ||

                                                     ---क्रमश ...अष्टम सुमनांजलि...सहोदर व सख्य प्रेम...




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