मंगलवार, 28 जून 2011

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी [भाग दो ]

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी [भाग दो ]

कुछ टिप्पणीकार तो साधारण पोस्ट की भी इतनी प्रशंसा कर देते हैं की ब्लोगर स्वयं यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि ऐसा क्या लिख दिया है मैंने कि ये टिप्पणीकार इतनी तारीफ कर रहे हैं -


''दिल से तेरी निगाह जिगर में उतर गई ,

दोनों को इक अदा में रजामंद कर गयी .''


लेकिन ऐसा नहीं कि केवल प्रशंसा ही हो .अति आलोचना का भी शिकार बनना पड़ता है .ब्लोगर खुद को कोसता है कि किस मनहूस घडी में मैंने यह पोस्ट डाली थी ? मुंह-दर-मुहं हो तो मार-पिटाई तक भी बात पहुँच सकती है पर ब्लॉग-जगत की गरिमा बनायें रखने के लिए ब्लोगर आलोचनाकार को बार-बार ''जी'' लगाकर अपनी बात समझानें का प्रयास करता है .इस पर भी यदि आलोचनाकार न माने तो दिल में ये तो आता ही है -


''हर एक बात पर कहते हो तुम कि तू क्या है ;

तुम्ही कहो कि ये अंदाजे -गुफ्तगू क्या है .''


थोडा सख्त लिख दिया तो आलोचनाकार ब्लोगर को ''अशिष्ट'' की संज्ञा देने में एक मिनट नहीं लगाता. होतें रहें आप सक्रिय-ईमानदार ब्लोगर पर आलोचनाकार की टिप्पणिया आहात तो कर ही जाती है -


''होगा कोई ऐसा भी कि ''ग़ालिब ''को न जाने ;

शाइर तो वह अच्छा है पर बदनाम बहुत है .''


पर साहब जी ब्लोगिंग करते-करते ब्लोगर भी पक्का हो जाता है .दो दिन हुए नहीं इस घमासान को कि फिर एक नयी पोस्ट तैयार -


''रोने से और इश्क में बेबाक हो गए;

धोये गए हम ऐसे कि बस पाक हो गए .''


अब टिपण्णी प्राप्त करनी है तो अन्य के ब्लॉग पर जाकर करनी भी होगी .जब तक ऐसी भावना मन में नहीं आती ब्लोगर का उद्धार होना मुश्किल है -

''हाँ भला कर तेरा भला होगा ;

और दरवेश की सदा क्या है .''


भूले-भटके किसी ऐसे ब्लॉग पर पहुँच जाएँ जहाँ अनुसरनकर्ताओं की संख्या सौ-दो सौ-या हज़ार हो तो मन मचल उठता है और थोडा उदास भी हो जाता है अपने अनुसरनकर्ताओं की संख्या याद कर -


''ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता

अगर और जीते रहते यही इंतजार होता .''


लेकिन चाहने से क्या होता है?ये तो अन्य ब्लोगर्स का हक़ है कि वे आपके ब्लॉग का अनुसरण करें न करें .हर ख्वाहिश पूरी हो ये जरूरी तो नहीं -


''हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले .

[....जारी ]

शिखा कौशिक

http://vicharonkachabootra.blogspot.com


9 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक शेर पेश किये हैं ...

शालिनी कौशिक ने कहा…

bahut sahi kaha hai aapne mirza ghalib ne to barso pahle hi kah diya tha aur aapke madhyam se yahan bhi kahlwadiya-
''''हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले .''

महेश बारमाटे "माही" ने कहा…

pahle bhaag ki tarah... ek baar fir achchi peshkash...
aabhar...

devendra gautam ने कहा…

आप ग़ालिब को बहुत संजीदगी से पढ़ रही हैं और उनके शेरों को बड़े दिलचस्प अंदाज़ में कोट कर रहीं हैं. अच्छा लग रहा है. बधाई!

शिखा कौशिक ने कहा…

sangeeta ji ,shalini ji ,mahi ji v devendr ji aap sabhi ka hardik dhanywad .

Abhishek ने कहा…

""थोडा सख्त लिख दिया तो आलोचनाकार ब्लोगर को ''अशिष्ट'' की संज्ञा देने में एक मिनट नहीं लगाता. होतें रहें आप सक्रिय-ईमानदार ब्लोगर पर आलोचनाकार की टिप्पणिया आहात तो कर ही जाती है""

ये पढ़ के तो बस यही लगता है. अपने मुह मिया मिठू. बस ब्लोगर का सच सच है और आलोचनाकार का सच झूठ. great :P

गंगाधर ने कहा…

'दिल से तेरी निगाह जिगर में उतर गई , दोनों को इक अदा में रजामंद कर गयी . bahut khoob.

Arunesh c dave ने कहा…

ha haa ha क्या दर्द उकेरा है मजा आ गया वैसे ये कमेंट बाजी मुसीबत ही है सौ कमेंट चाहिये तो सौ करने भी पड़ेंगे अब पढ़ना भी पड़ेगा और पढ़ ही लिया तो समय कहा है लिखने का दाल रोटी चलाने का इसलिये रेडीमेड कमेंट कि दुकान खोलो और फ़टाफ़ट काम करो

हरीश सिंह ने कहा…

''''हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले .''
कोशिश जारी रखे निकाल जायेंगे. हा हा हा
अच्छी रचना
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