गुरुवार, 3 मार्च 2011

"प्रेम का जीवन में वास्तविक महत्व और सच्चे प्रेम का स्वरुप "............. सौरभ दुबे

प्रेम क्या है? प्रेम किसे कहते हैं? इसकी शुरुआत कहाँ से होती है ?इसके बारे में लोगो के अनेक मत हें मेरा तो यही मानना हें की जब दो लोग के दिल आपस में मिलते हें तो उनसे जो भाव उत्पन्न होता हें उसे प्रेम कहते हें,प्रेम में दोनों को एक दूसरे के  प्रति,ईमानदारी , कर्तव्यनिष्ठा , त्याग, सहानुभूति तथा सुख दुख मे भागीदारी की निःस्वार्थ भावना होनी चाहिए , लेकिन अहं एवं छलकपट की भावना कभी भी न हो| यही सच्चा प्यार है,इसे हम अगर आज प्रेम शब्द बोलेंगे तो लोग तुरंत इसका अर्थ लगा लेंगे प्रेमी -प्रेमिका के लिये लेकिन प्रेम के और भी प्रकार होते हे जैसे माँ का बेटे से ,पिता का पुत्र से ,बहन का भाई से आदि प्रेम के उदाहरण हें,प्रेम हमारे मन में तभी उत्पन्न होता हें जब हम किसी से मिलते हें या उससे दोस्ती करते हें यदि उसकी बातें हमारे दिल को छूती  हें तो हम अपने प्रेम को आगे बढ़ाते हें और धीरे-धीरे साथ जीने मरने का कसम भी खाते हें ,वैसे प्रेम एक एहसास हें जिसे रूह से  महसूस कीया जा सकता  हें , प्यार, जो हमारे संपूर्ण जीवन में विभिन्न रूपों में सामने आता है, जो यह एहसास दिलाता है कि जिन्दगी कितनी खूबसूरत है, डॉ. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'प्रेम' की व्याख्या कुछ इस तरह की है कि - 'प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है, प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।' सृष्टि में जो कुछ सुकून भरा है, प्रेम है। प्रेम ही है, जो संबंधों को जीवित रखता है। परिवार के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी सिखाता है,हाँ प्रेम चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है, वह तो शिशु-से सरल हृदय की वस्तु है,' सच्चा प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, बल्कि उसकी खुशियों के लिए बलिदान करता है, प्रिय की निष्ठुरता भी उसे कम नहीं कर सकती, वास्तव में प्रेम के पथ में प्रेमी और प्रेमिका दो नहीं, एक हुआ करते हैं, एक की खुशी दूसरे की आँखों में छलकती है और किसी के दुःख से किसी की आँख भर आती है,कोई भी प्यार तन से नही बल्कि मन से होती हें और इसमें वासना का स्थान कतई नही होता ,आज कल मै अक्सर एसा देख रहा हू की लोग प्यार के नाम पर सेक्स कर रहे   उसे प्यार का नाम दे रहे  हें,ये कैसा प्यार हे इसमें ना तो त्याग हें न ही कुछ हें कुछ हें तो सिर्फ वासना हें ,कुछ लोग तो प्रेमिका के वाह्य सुन्दरता पर आकर्षित होते हें ये कोई प्यार नही हें बल्कि हमारे मानसिक सोच के कारण हें ,मैंने दसवी कक्षा में एक पोएम पढ़ा था पोएम तो याद नही उसका अर्थ थोडा बहुत जरुर याद हें ,वह व्यक्ति जो अपनी प्रेमिका की बाह्य सुंदरता और उसके गालो और गुलाबी होठो  से प्यार  करता  है एवं शारीरिक सुंदरता वी वशीभूत होकर अपने प्रेम की अग्नि को प्रज्ज्वलित करता है , अर्थात उसकी सुंदरता को ही अपने प्रेम का आधार मानता है, ऐसे प्रेमी की प्रेम की अग्नि उस समय क्षीण हो जाती है, जब उसकी प्रेमिका बुढ़ापे की कैद मे जकड़ जाती है या फिर उस प्रेमिका से भी अधिक सुंदर कोई दूसरी उसके जीवन के दरवाजे पर दस्तक दे जाती है,
आजकल लव ऐट फ़र्स्ट साइटशब्द बहुत प्रसिद्ध है,जैसे की लोग किसी सुंदर लड़की को देखते ही कहते ही बोलेंगे की हमे उससे प्यार हो गया,ये प्यार थोड़ी ही हें ये तो आपको उसके खूबसूरती से प्यार हुआ हें,अगर यही प्यार हें तो हमे ऐसा प्यार दिन में सौ बार होता हें ,वैसे भी लोग कहते हें की सच्चा प्यार इन्सान को जीवन में एक बार ही होता हें,और मैंने भी देखा हें की अगर सच्चा प्यार हो जाये तो स्वर्ग  की पारी भी आ जाये तो वो भी उन्हें अच्छी नही लगती , प्रेम को प्रेम की तरह कीजिये ,वासना के लिये प्रेम करेन्गे तो प्रेम शब्द गाली की तरह लगेगी , प्रेम में नकारात्मक सोच के लिए कोई जगह नहीं होती। जो लोग प्यार में असफल होकर अपने प्रेमिका  को नुकसान पहुँचाने का कार्य करते हैं, वे सच्चा प्यार नहीं करते,प्रेम तो हो जाने वाली चीज है, किसी के खयालों में खोकर खुद को भुला देना, उसके सभी दर्द अपना लेना, स्वयं को समर्पित कर देना, उसकी जुदाई में दिल में एक मीठी चुभन महसूस करना, हर पल उसका सामीप्य चाहना, उसकी खुशियों में खुश होना, उसके आँसुओं को अपनी आँखों में ले लेना, हाँ यही तो प्यार है, इसे महसूस करो और खो जाओ उस 
सुनहरी अनोखी दुनिया में, जहाँ सिर्फ सुकून है।
            अंत में जहां प्रेम है, वही जीवन है
                                                                                    सौरभ दुबे  

6 टिप्पणियाँ:

हरीश सिंह ने कहा…

saurabh ji, is pratiyogita me pahli post ke liye badhai.

saurabh dubey ने कहा…

धन्यवाद

rubi sinha ने कहा…

जब मैं इस ब्लॉग पर आई तो देखा एक नए अंदाज़ में महाभारत का आगाज़ हो रहा है. मुझे बड़ी बेसब्री से इंतजार है यहाँ आने वाले लेखो का.... क्या बात है हरीश जी ने विषय भी रखा तो प्रेम. वैरी गुड. सौरभ जी आपकी पहली पोस्ट पढ़कर अच्छा लगा, और देंखे कितने महारथी इस जंग में कूदते हैं. या फिर हथियार घर पर रखकर सो जाते हैं.

शिखा कौशिक ने कहा…

achchha vishay hai ....koshish karenge kuchh likhne ki ...kalam ghisne ki .

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

बढ़िया लेख ...

संत कबीर ने भी कहा है ----'कबिरा यह घर प्रेम का , खाला का घर नाहिं |

शीश उतारै कर धरै , तब पैठे घर मांहि |'

Dr. shyam gupta ने कहा…

बधाई सौरभ जी, प्रेम के सुन्दर आगाज़ के लिये....

हे मन प्रेम के तुम आधार...

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