शनिवार, 15 सितंबर 2012

हिन्दी दिवस पर ...ये कौन सी भाषा है , कैसी राय है ...हिन्दी के लिए ....डा श्याम गुप्त

हिन्दी दिवस पर ...ये कौन सी भाषा है, कैसी राय है ...हिन्दी के लिए ....
              कुछ आलेखों में हिन्दी के विषय में विविध मत प्रस्तुत किये गए हैं | देखिये ...अच्छी भावना होते हुए भी किस प्रकार  भाषा  की गहन भाव-समझ न होते हुए किस प्रकार के नकारात्मक भाव संप्रेषित होते हैं....
चिरत-समाचार-१-तुलसी बड़े या कबीर ?

१- चित्र समाचार -१.--नई रचनाशीलता --ज्ञानरंजन-..साहित्यकार......
--रचनाशीलता सदा ही नई होती है -ये नयी रचनाशीलता क्या होती है.......  -----जितने बड़े लोग हैं सब विफल हैं,कबीर और मुक्तिबोध नाकाम हैं|.......हिन्दू समाज तुलसी दास को ही मानता है कबीर को नहीं... .....अर्थात लेखक के अनुसार कबीर बड़े हैं ..मुक्तिबोध बड़े हैं ..तुलसी नहीं 
---और कबीर को कौन नहीं मानता  ??साहित्यकार जी .... इस भारत में ..हिन्दू-मुसलमान सब मानते हैं...कबीर साहित्य के अनूठेपन की विरुदावलियाँ गाई जाती हैं.. तुलसी, तुलसी हैं- कबीर, कबीर .......
--- अब आप ही सोचिये | कैसी हिन्दी की, साहित्य की सेवा है यह ...
समाचार चित्र-२-शुद्ध हिन्दी ,भुस व गिद्ध





चित्र-समाचार -२-.( आलेख-कांतिकुमार जैन , पूर्व-प्राध्यापक, लेखक )-.जाने कौन  मल्होत्रा साहब हैं जिनके  के लिए शुद्ध हिन्दी गिद्ध है वह भी भुस से भरा हुआ .....

---और उन्हीं महोदय को ..गुलेरी जी की हिन्दी कहानी ...में लाणी होरा ... के अर्थ के लिए जर्मन तक जाना पड़ा ..होरा से ...जर्मन हर का अर्थजोडने हेतु....
---- जबकि ऋग्वेद...अथर्व वेद में ...हारा शब्द ...आदि-शक्ति ..महामाया के लिए प्रयुक्त है ....... हारा ...राधा, सीता ,लक्ष्मी  अर्थात  आदि- शक्ति ....हरे ..हरी ..शीघ्रता से प्रसन्न होने वाले देव....इसीलिये हरे श्याम..हरे राम...कहाजाता है...अर्थातशक्ति से युक्त देवता ...श्याम या राम ....अतः होरा ..स्त्री के हेतु प्रयोग है...लाणी -होरा = लावनी, लोनी, सलोनी, सुन्दर, लाडली , प्रिय --- शक्ति-रूप , आदरणीय  स्त्री ...... हर . हरें ....
----हर हिटलर शब्द हिटलर ने हरे राम..हरे कृष्ण से लिया होगा  ...जर्मन लोग वैदिक साहित्य के ज्ञाता थे...
लाणी होरा और हर

----शुद्ध हिन्दी और अच्छी हिन्दी में क्या अंतर है....क्या शुद्ध वस्तु अच्छी नहीं होगी ...क्या अर्थ निकालेंगे आप इस कथन का.....
समाचार-चित्र -३- अब एक व्यंगकार की भाषा का हिन्दी पर व्यंग्य देखिये ....हिन्दी राजनीति के बंदरों के हाथ पड गया वह उस्तरा है .जिससे खेलता हुआ वह सारे राष्ट्र को लुहूलुहान कर रहा है....
----अर्थात लेखक के अनुसार हिन्दी एक उस्तरा है, धार वाला हथियार ....बाल बनाने हेतु एक अस्त्र....
---वाह! क्या उपाधि है हिन्दी की ...व्यर्थ के व्यंग्य-आलेख  लिखते लिखते उसी प्रकार की अनुपयुक्त भाषा भी होजाती है.....


---तभी तो कबीर ने कहा ....
"ह्रदय तराजू तौल कर तब मुख बाहर आनि |"...(..तब तू लिखना ठानि ....)......


महंगाई से जनता त्राहिं-त्राहिं

दिल्ली- मजबूर सरकार के लाचार प्रधानमंत्री ने आम लोगों के सिर पर एक बार फिर महंगाई का बम फोड़ दिया है। डीजल के दामों में पांच रुपए बढ़ोतरी कर सरकार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आम आदमी से ज्यादा फिक्र तेल कंपनियों की है। सरकार यह भूल रही है कि इसी गरीब जनता की वजह से यूपीए सत्ता में है। और दिसबंर 2012 में कुछ राज्यों में चुनाव होने है। इसके बाद 2014 लोकसभा के लिए सरकार को इसी बेबस गरीब जनता के द्वार पर फिर जाना पड़ेगा, वोट मांगने। दिनों-दिनों एक-एक करके घोटाले सामने आ रहे हैं। सरकार में ईमानदार शख्स की पहचान रखने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आए दिन निकल रहे घोटालों और बढ़ती महंगाई के सामने बेबस और असहाय नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री की आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि पहले पेट्रोल, सीएनजी फिर डीजल के दामों में वृद्धि कर महंगाई में चार चांद लगा दिए। सवाल उठता है तेल कंपनियों का मुनाफा जरुरी है या फिर आम आदमी। अगर तेल कंपनियां आम आदमी से अधिक जरुरी हैं तो सरकार को आने वाले दिनों में गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। डीजल के दाम बढ़ने से सार्वजनिक क्षेत्र के परिवहन के भाड़े में इजाफा होना तय है। कपड़े, खाने-पीने की चीजों के दाम में आग लगेगी जिससे आम आदमी बहुत प्रभावित होगा। देश के कुछ हिस्सों में एक ओर जहां सूखा पड़ा है वहीं दूसरी तरफ बाढ़ से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। ऐसे समय में डीजल की मूल्य वृद्धि में बढ़ोतरी करना इंसाफी है। यह तो सरासर किसान, गरीब मजदूरों के साथ भद्दा मजाक है। हर महीने और प्रत्येक सप्ताह में महंगाई का बोलबाला रहा है। आइए अब आपको महंगाई दर का आकड़ा भी बताते हैं- जुलाई में महंगाई दर 6.8 प्रतिशत रही। अगस्त में महंगाई बढ़कर 7.55 प्रतिशत हो गई। इन आकड़ों से साबित होता है कि महंगाई से जनता में त्राहि-त्राहि मची हुई है। ना जाने कब जनता का गुस्सा फूट जाए कहा नही जा सकता। डीजल के दामों में बढ़ोतरी के बाद केंद्र सरकार ने एफडीआई का बम भी फोड़ दिया है। सरकार ने शुक्रवार को रिटेल में 51 फीसदी तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी प्रदान कर दी है। सरकार ने इसके साथ ही एकल ब्रांड रिटेल में भी सौ फीसदी एफडीआई को मंजूरी दे दी है। यूपीए सरकार ने एयरलाइंस में 49 प्रतिशत विदेशी निवेश को स्वीकृत कर लिया है। डीटीएच और केबल नेटवर्क में केंद्र सरकार ने 74 फीसदी तक विदेशी निवेश की मंजूरी दी है। कई राजनीतिक दलों ने सरकार के इस फैसले का भी विरोध किया है। दलों का कहना है कि इससे देश में भूखमरी फैल जाएगी। दुकान, व्यापारी बर्बाद हो जाएगे। इस फैसले से वालमार्ट और केयरफोर जैसी वैश्विक रिटेल कम्पनियां भारत में अपना स्टोर खोल हैं। कई वैश्विक कम्पनियों के भारत में पहले से स्टोर हैं, लेकिन उन्हें सीधे आम लोगों को उत्पाद बेचने का अधिकार अब तक नहीं था। वे दूसरे स्टोरों को माल बेच सकते थे। अब वे आम लोगों को भी माल बेच पाएंगे। इससे महंगाई में और इजाफा होगा। आने वाला समय बताएगा कि जनता 2जी स्पेक्ट्रम में 1.76 लाख करोड़ रुपयों और अब कोयला ब्लाक आवंटन मामले में उससे भी कहीं अधिक रकम के कथित भ्रष्टाचार का इतिहास बना चुकी इस सरकार को क्या जवाब देगी। कब तक जनता सहती रहेगी महंगाई का विष। जिसे सरकार पिलाते समय कहती है कि राजकोषीय घाटा कम करने के लिए मजबूरी में सरकार को कदम उठाया पड़ा। जाहिर सी बात है सूखों से किसानों की फसल बर्बाद हुई होगी, सरकार ने डीएपी खाद के दामों को पहले ही बढ़ा रखा है। ऐसे में किसानों की सुध लेने वाला कोई नही दिखता है। हां इतना जरुर है कि राजनीतिक पार्टियों को घर बैठा-बैठाया मुद्दा मिल गया है राजनीति करने का।

रविवार, 9 सितंबर 2012

आधा सच...: अन्ना मैं हूं और मैं ही रहूंगा ...

आधा सच...: अन्ना मैं हूं और मैं ही रहूंगा ...: जी हां, आज अन्ना ने बता दिया कि मैं अन्ना हूं और मैं ही अन्ना रहूंगा। अरविंद केजरीवाल आप कभी मेरी जगह लेनी की मत सोचिए। अगर मैं समर्थन देकर...

गुमराह हो रही पत्रकारिता

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया की आतंरिक हालत इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। आधुनिक पत्रकारिता के मायनों के साथ खबरों का नजरिया भी बदल गया है। आजकल हमारे युवा पीढ़ी के जो लोग मीडिया में महज शौक के वसीभूत होकर आ रहे हैं उनके कैरियर पर सवालिया निशान लग रहे हैं। इसकी वजह है इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया में बढ़ती प्रतिस्पर्धा। हर साल लाखों की संख्या में छात्र-छात्राएं जनर्लिजम करते हैं लेकिन नौकरी बहुत ही सौभाग्यशाली लोगों को ही मिलती है। बाकी के बचे लोग या तो सड़क पर घूमने को मजबूर हो जाते हैं या फिर नौकरी मिलने से पहले ही पत्रकारिता से संन्यास ले लेते हैं। चैनल और अखबार के दफ्तर में जिसकी नौकरी सिफारिश से या फिर खुद की काबियत से लग भी जाती है तो नौकरी कब तक रहेगी कोई गारंटी नही है। जैसे-जैसे सीनियर होते जाएगें वैसे-वैसे नौकरी का खतरा बढ़ता जाता है। खुद को पहले से ज्यादा काबिल बनाना होता है। खुद पर तनाव कितना होता है अंदाजा लगाना असान नही होता। ऑफिस हमेशा बदलाव के दौर से गुजरता है कहीं मैनेजमेंट चेंज हुआ तो फिर तो नौकरी की एक मिनट की गारंटी नही है। क्योंकि लोग अपने हिसाब से छटाई काम करते हैं। अगर नौकरी बरकरार रखनी है तो सीईओ और एडिटर एन चीफ की चापलूसी करना जरुरी है। लोग काम को लोग बाद में देखने हैं पहले सीनिर्यस ये सोचते हैं कि ये आदमी मेरा आदमी बनने के लायक है भी नहीं। छोटे-छोटे संस्थानों में डेस्क पर काम वाले पत्रकारों को सेलेरी कब मिलेगी ये तो भगवान ही जाने। अगर मिलती भी है तो महीने के अंत में जब आप कर्ज से डूब चुके हुए होते हैं। कभी भी तो दो-दो महीने सेलरी के लिए इंतजार करना पड़ता है। फील्ड में काम करने वाले पत्रकारों के सेलरी के बारे में तो पूछो मत। जल्दी रिपोर्टस को सेलरी नही मिलती। एक पत्रकार कई चैनलों के लिए खबर भेजता है फिर भी एक ईमानदार पत्रकार को अपना और खुद के परिवार का खर्च चलाने के लाले पड़ जाते हैं। न्यूज चैनलों और अखबार के इस रवैये से कुछ पत्रकार अपने पत्रकारिता के रास्ते से विचलित होकर दलाली का काम शुरु कर देते हैं। कहने का मतलब शरीफ इंसान को पत्रकारिता का कीड़ा इतना महंगा पड़ जाता है कि घर का खर्च चलाने के लिए दलाली जैसा घिनौना काम करना पड़ता है। ये कैसी पत्रकारिता है जो ईमानदार इंसान को बेइमान बनने पर मजबूर होना पड़ता है। अगर चैनल या अखबार का मालिक राजनेता है तो पूछिए मत——संबधिता नेता या उसकी पार्टी हमेशा हेडलाइनस में होगें। पीआर न्यूज करना पत्रकारों की मजबूरी हो जाती है। मना करने पर पत्रकार सड़क पर भी आ जाते है। क्योंकि लोगों को जल्दी नौकरी नहीं मिलती। जैसे-जैसी उम्र बढ़ती जाती है लोग तो परिपक्व तो होते जाते हैं मगर नौकरी पक्की नही हो पाती। हमने ऐसे कई लोगों को देखा है जो किसी विशेष संस्थान से निकाले जाने के बाद नौकरी के तलास में जिंदगी के बाकी दिन गुजार दिए। जरा सोचिए कहां जा रहा है आधुनिक मीडिया। विज्ञापन के नाम पर लोग अपनी नैतिकता खो दे रहे हैं। ऐसा सुनने में कई दफा आता है कि चैनल या अखबार के दफ्तर में काम करने वाली महिलाओं और लड़कियां खुद को कामयाब बनाने के लिए बॉसों से कंप्रोमाइज करने से भी नही चूकतीं। मीडिया में तो लोग बड़े शौक से आते हैं लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि घऱ फूंककर तमाशा देख की कहानी है तो बहुत सारे लोग खुद को पत्रकारिता से अलग कर लेते है। फील्ड में घूम रहे पत्रकारों से पूछिए कोई नही कहेगा जनर्लिज्म कर लो। केवल झूठी शान बनकर रह गई है पत्रकारिता।

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