रविवार, 9 सितंबर 2012

गुमराह हो रही पत्रकारिता

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया की आतंरिक हालत इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। आधुनिक पत्रकारिता के मायनों के साथ खबरों का नजरिया भी बदल गया है। आजकल हमारे युवा पीढ़ी के जो लोग मीडिया में महज शौक के वसीभूत होकर आ रहे हैं उनके कैरियर पर सवालिया निशान लग रहे हैं। इसकी वजह है इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया में बढ़ती प्रतिस्पर्धा। हर साल लाखों की संख्या में छात्र-छात्राएं जनर्लिजम करते हैं लेकिन नौकरी बहुत ही सौभाग्यशाली लोगों को ही मिलती है। बाकी के बचे लोग या तो सड़क पर घूमने को मजबूर हो जाते हैं या फिर नौकरी मिलने से पहले ही पत्रकारिता से संन्यास ले लेते हैं। चैनल और अखबार के दफ्तर में जिसकी नौकरी सिफारिश से या फिर खुद की काबियत से लग भी जाती है तो नौकरी कब तक रहेगी कोई गारंटी नही है। जैसे-जैसे सीनियर होते जाएगें वैसे-वैसे नौकरी का खतरा बढ़ता जाता है। खुद को पहले से ज्यादा काबिल बनाना होता है। खुद पर तनाव कितना होता है अंदाजा लगाना असान नही होता। ऑफिस हमेशा बदलाव के दौर से गुजरता है कहीं मैनेजमेंट चेंज हुआ तो फिर तो नौकरी की एक मिनट की गारंटी नही है। क्योंकि लोग अपने हिसाब से छटाई काम करते हैं। अगर नौकरी बरकरार रखनी है तो सीईओ और एडिटर एन चीफ की चापलूसी करना जरुरी है। लोग काम को लोग बाद में देखने हैं पहले सीनिर्यस ये सोचते हैं कि ये आदमी मेरा आदमी बनने के लायक है भी नहीं। छोटे-छोटे संस्थानों में डेस्क पर काम वाले पत्रकारों को सेलेरी कब मिलेगी ये तो भगवान ही जाने। अगर मिलती भी है तो महीने के अंत में जब आप कर्ज से डूब चुके हुए होते हैं। कभी भी तो दो-दो महीने सेलरी के लिए इंतजार करना पड़ता है। फील्ड में काम करने वाले पत्रकारों के सेलरी के बारे में तो पूछो मत। जल्दी रिपोर्टस को सेलरी नही मिलती। एक पत्रकार कई चैनलों के लिए खबर भेजता है फिर भी एक ईमानदार पत्रकार को अपना और खुद के परिवार का खर्च चलाने के लाले पड़ जाते हैं। न्यूज चैनलों और अखबार के इस रवैये से कुछ पत्रकार अपने पत्रकारिता के रास्ते से विचलित होकर दलाली का काम शुरु कर देते हैं। कहने का मतलब शरीफ इंसान को पत्रकारिता का कीड़ा इतना महंगा पड़ जाता है कि घर का खर्च चलाने के लिए दलाली जैसा घिनौना काम करना पड़ता है। ये कैसी पत्रकारिता है जो ईमानदार इंसान को बेइमान बनने पर मजबूर होना पड़ता है। अगर चैनल या अखबार का मालिक राजनेता है तो पूछिए मत——संबधिता नेता या उसकी पार्टी हमेशा हेडलाइनस में होगें। पीआर न्यूज करना पत्रकारों की मजबूरी हो जाती है। मना करने पर पत्रकार सड़क पर भी आ जाते है। क्योंकि लोगों को जल्दी नौकरी नहीं मिलती। जैसे-जैसी उम्र बढ़ती जाती है लोग तो परिपक्व तो होते जाते हैं मगर नौकरी पक्की नही हो पाती। हमने ऐसे कई लोगों को देखा है जो किसी विशेष संस्थान से निकाले जाने के बाद नौकरी के तलास में जिंदगी के बाकी दिन गुजार दिए। जरा सोचिए कहां जा रहा है आधुनिक मीडिया। विज्ञापन के नाम पर लोग अपनी नैतिकता खो दे रहे हैं। ऐसा सुनने में कई दफा आता है कि चैनल या अखबार के दफ्तर में काम करने वाली महिलाओं और लड़कियां खुद को कामयाब बनाने के लिए बॉसों से कंप्रोमाइज करने से भी नही चूकतीं। मीडिया में तो लोग बड़े शौक से आते हैं लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि घऱ फूंककर तमाशा देख की कहानी है तो बहुत सारे लोग खुद को पत्रकारिता से अलग कर लेते है। फील्ड में घूम रहे पत्रकारों से पूछिए कोई नही कहेगा जनर्लिज्म कर लो। केवल झूठी शान बनकर रह गई है पत्रकारिता।

1 टिप्पणियाँ:

HARSHVARDHAN SRIVASTAV ने कहा…

कल से मैंने अपना चौथा ब्लॉग "समाचार न्यूज़" शुरू किया है,आपसे निवेदन है की एक बार इसपे अवश्य पधारे और हो सके तो इसे फ़ॉलो भी कर ले ,ताकि हम आपकी खबर रख सके । धन्यवाद ।
हमारा ब्लॉग पता है - smacharnews.blogspot.com

Add to Google Reader or Homepage

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | cna certification