शनिवार, 2 अप्रैल 2011

चक्रव्यूह



हम सभी अभिमन्यु की कहनी से परिचित हैं। जिसे उसके पिता अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदना तो सिखाया था, परंतु उससे बाहर निकलना नहीं सिखाया था। परिणामस्वरूप वह चक्रव्यूह में प्रवेश तो कर गया परंतु कर्ण, जयद्रथ, द्रोणाचार्य एवं अश्वसथामा जैसे महारथियों से घिरने के बाद बाहर नहीं निकल सका और रणभूमि में ही शहीद हो गया।
यह कहानी आज के युग में एक सबक की तरह है। जहां हम अपने बच्चों को जीवन के चक्रव्यूह में घुसने का तो हरएक तरीका बताते है, पर उससे निकलने के तरीकों पर कभी बात नहीं करते। उल्टे ऐसी परिस्थितियों में जब उसे परिवार के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह अभिमन्यु की तरह जीवन के रणक्षेत्र में स्वयं को अकेला खड़ा पाता है। परोक्ष-अपरोक्ष तमाम प्रहारों को झेलता। जिधर भी सहायता के लिए नजर उठती है एक ही उत्तर मिलता है-बेटा सभी को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होती है, तुम भी लड़ो। पर कैसे? यह न उसे पता होता है और न ही उसे सिखाया गया गया होता है।
चक्रव्यूह से न निकल पाने की महाभारत के अभिमन्यु की पीड़ा कुछ घंटो की रही होगी, लेकिन आधुनिक अभिमन्यु तनाव, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, अवसाद जैसे अनेक रोगों से घिर कर यह पीड़ा ताउम्र झेलते हैं। उपचार केन्द्र यानी डॉक्टर भी एक चक्रव्यूह भेदते हुए ही उस स्थल तक पहुँचते है इसलिए इनके उपचार के लिए बेझिझक तगड़ी वसूली करते हैं और उपचार में जितना वक्त देना चाहिए उतना वक्त भी नहीं देते क्योंकि जानते हैं कि ज़िदगी के चक्रव्यूह में उलझे एक नहीं अनेक अभिमन्युओं की लंबी कतार उनके क्लीनिक के बाहर लगी हुई है। इनकी दवाइयां ज्यादातर अभिमन्युओं को नकारा बनाकर छोड़ देती है। जो दुनिया से तो नहीं लड़ पाते, पर खुद के साथ उनकी लड़ाई अनवरत चलती रहती है। यह जंग जीतने वालों की संख्या नगण्य होती है। लेकिन रणभूमि में ढेर होने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इनमें बच्चे भी है, जवान भी और वृद्ध भी।
आज मैं आप सबसे कहना चाहती हूं कि जो गलती महाभारत काल में अर्जुन ने की थी, वहीं गलती आप भी मत दोहराइए। अपने बच्चों को जीवन के चक्रव्यूह में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करने से पूर्व उसे उसमें प्रवेश करने, उसे जीतने और जीत कर बाहर निकलने की प्रत्येक तकनीकी से लैस करने के बाद ही इसमें प्रवेश करने की अनुमति दीजिए। ताकि उसके साथ-साथ आपके अपने सपने भी साकार हो सकें न कि समय पूर्व ही बिखर जाए। और आप खाली हाथ, सूनी आँखों से उसकी प्रतीक्षा ही न करते रह जाए।

-प्रतिभा वाजपेयी.

2 टिप्पणियाँ:

kase kahun?by kavita. ने कहा…

bilkul sahi kaha aapne ..aaj ke palak apne nounihalo ko itana surakshit mahoul dete hai ki unme jeevat shakti bahut kam hoti hai...aur jindagi ki jang me vo ashay khade rah jate hai...abhimanyu ki tarah sab se ghire fir bhi akele.....sarthak lekhan..

सारा सच ने कहा…

nice

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