शनिवार, 28 मई 2011

महाभारत- 2 -- डॉ. श्याम गुप्ता प्रथम, आशुतोष द्वितीय एवं शालिनी तृतीय

सभी प्रतिभागियों को "BBLM " की तरफ से हार्दिक शुभकामना 
भारतीय ब्लॉग लेखक मंच द्वारा आयोजित लेखन प्रतियोगिता महाभारत द्वितीय में चयनित विषय "भ्रस्टाचार का वास्तविक दोषी कौन" में जिन बंधुओ ने सहभागिता निभाई, उनके लेख को निर्णय के लिए वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्लोगर महेंद्र श्रीवास्तव जी के समक्ष रखा गया. अपने स्वविवेक द्वारा उन्होंने यथोचित निर्णय लिया. निश्चित रूप से किसी भी जज के समक्ष यह विषम परिस्थिति  होती है. इस प्रतियोगिता में उन्होंने डॉ. श्याम गुप्ता जी को प्रथम, आशुतोष जी को द्वितीय एवं शालिनी जी को तृतीय स्थान दिया. 
उनके निर्णय का आधार क्या रहा वह आपके समक्ष उसी तरह रखा जा रहा है. जैसा उन्होंने हमें मेल भेजा है.   

मित्रों, महाभारत 2 का निर्णय मुझे देने को कहा गया। मैने हरीश जी से आग्रह भी किया कि मैं ब्लाग परिवार में बहुत ही जूनियर हूं, कृपया मुझे इस जिम्मेदारी से अलग रखें, लेकिन दोबारा उनके आग्रह को मैं ठुकरा नहीं पाया। ये बात सच है कि आज देश में अगर सबसे बड़ी कोई मुश्किल है तो वह है भ्रष्टाचार की। सच तो यह है कि आसान रास्ता तलाशने के लिए हमने आपने खुद इस छोटे रास्ते को प्रोत्साहित किया है। लोग हर छोटे बडे काम के लिए पैसा देने को तैयार  हैं। फिर 
सवाल उठता है कि जब लोग खुद पैसे देने को तैयार हैं तो गडबड़ी कहां हुई। क्यों इतना बड़ा आंदोलन सड़कों पर आ गया। मै बताता हूं,  गडबड़ी इसलिए हुई लोगों की बढ़ती लालच ने देश में भ्रष्ट्राचार को भी भ्रष्ट्र कर दिया। आप नहीं समझे, मैं समझाता हूं। उदाहरण के तौर पर हमने किसी काम के लिए नेता या नौकरशाह को पैसे दिए.. ये तो हुआ भ्रष्ट्राचार, लेकिन पैसे लेने के बाद भी उसने काम नहीं किया और पैसा भी डकार गया। ये हुआ भ्रष्ट्राचार को भ्रष्ट्र करना। मुझे लगता है कि अगर भ्रष्ट्राचार में ये नेता और नौकरशाह ईमानदारी बरतते तो उनकी चांदी कटती रहती, लेकिन बेईमानों सावधान हो जाओ..अब देश की जनता जाग गई है।
सरकारी तंत्र में जब ईमानदार की तलाश की जाती है तो बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि एक भी नहीं मिलता, जिसे दावे के साथ ईमानदार कहा जा सके। यहां तो सब चोर हैं,  फर्क महज बड़े और छोटे का रह गया है। कुछ ईमानदार आईएएस हैं भी तो वो सरकारी तंत्र से इतना उकता चुके होते हैं कि सरकारी नौकरी छोड़कर किसी मल्टीनेशनल में सीईओ बन जाते हैं। एक जमाना था की गांव में बड़े बुजुर्गों को जब आप प्रणाम करते थे तो आशीर्वाद मिलता था "बेटवा दरोगा बन जा "। ये आशीर्वाद अब क्यों नहीं ? क्योंकि खाकी वर्दी पर अब हमारा भरोसा  ही नहीं रहा। ये वर्दी डीजीपी की हो या फिर कांस्टेबिल की। सब जानते हैं कि ये वर्दी दागदार है जो बदमाशों को संरक्षण देती है।
आइये.. देश के  इंजीनियरों की भी बात कर लें, क्योंकि विकास के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन्ही की है। आसानी से समझाने के लिए एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं। भगवान श्री राम जब लंका पर चढ़ाई करने जा रहे थे, तो एक समय ऐसा आया जब भगवान राम भी फेल हो गए। ये मुश्किल घड़ी थी कि समुंद्र को कैसे पार किया जाए ?  भगवान राम की समझ में ये नहीं आ रहा था। फिर यहां उनकी मदद की नल और नील ने। वो अपने हाथ से पत्थर उठा कर भगवान श्रीराम को देते और भगवान उस पत्थर को फूंक मारकर समुंद्र में डालते तो वो पत्थर तैरने लगते थे और इस तरह समुंद्र पर पुल का निर्माण हुआ। जिससे भगवान राम की सेना समुद्र् पार कर पाई। कहते हैं उसी समय भगवान राम ने नल और नील को आशीर्वाद दिया कि जाओ कलयुग तुम दोनों जेई और एई बनकर राज करोगे, कैसा भी पुल बनाओगे, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। तब से इंजीनियर मस्त हैं। 

बहरहाल मित्रों मैने आप सभी के लेख को गंभीरता से पढा है, और कोशिश की है कि मैं न्याय कर सकूं। यकीन मानिये मेरा इरादा किसी को आहत करने का कत्तई नहीं है। अगर मेरी टिप्पणी से किसी की भानवाओं को चोट पहुंचती है तो ये मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। मुझे लगता है कि आप मेरी भावनाओं का आदर करते हुए इसे सिर्फ एक प्रतियोगिता के तौर पर लीजिएगा। 
 आशुतोष जी ने लगभग सभी विषयों का बेहतर तरीके से उल्लेख किया है। कई बार लगा कि वो पटरी से उतर रहे हैं और विषय से हटकर गलत दिशा में जा रहे हैं, लेकिन अगले ही पल उन्होंने उसे बखूबी ठीक कर लिया है। भ्रष्टाचार की वजहों को वो बेहतर तरीके समझाने में कामयाब रहे हैं। मैं उनकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि चुनावी प्रक्रिया में जो समय के साथ खामिया जु़ड गई हैं, वो भ्रष्टाचार की एक वजह है, इसे दुरुस्त करने से देश का लोकतंत्र मजबूत होगा और लोकतंत्र मजबूत होगा तो जाहिर है देश मजबूत बनेगा। 
 मंगल जी ने संक्षेप में ही सही, लेकिन भ्रष्टाचार के बडे मामलों को उठाकर ये बताने की कोशिश की देश किस कदर इस बीमारी से जकड़ा हुआ है। लेकिन मुझे लगता है कि विषय पर वो ज्यादा प्रकाश नहीं डाल पाए। आपका सुझाव की भ्रष्टाचार के खिलाफ हर शहर को आगे आना होगा और हर शहर को अपना अपना एक अन्ना भी बनाना होगा, व्यावहारिक है। लेकिन देश का दुर्भाग्य ये है कि सब चाहते हैं कि देश में एक बार फिर भगत सिंह पैदा हों, लेकिन वो मेरे घर नहीं पड़ोसी के घर में पैदा हों। यहां जब तक लोग अपने घर में भगत सिंह को पैदा करने की नहीं सोचेंगे, कल्याण नहीं हो सकता। 
शालिनी जी के बारे में कुछ भी टिप्पणी करना मेरे लिए कठिन है। उनके लेख से कम से कम इतना तो साफ है कि वो बहुत ज्यादा पढ़ती हैं। जिस तरह से उन्होंने अपने लेख में दम भरने के लिए तमाम लोगों का हवाला दिया है, निश्चित ही लेख को मजबूत करता है। हो सकता है कि शालिनी जी मेरी बात से सहमत ना हों पर मैं उनकी इस बात से सहमत नहीं हूं कि भ्रष्टाचार के लिए जन समूह जिम्मेदार है। शालिनी ने कहा .आप ही बताइए कि वही सी.बी.आई.जिसने आरुशी केस बंद कर दिया था आखिर न्यायालय का आदेश आने पर कैसे क्लोज़र रिपोर्ट ले आयी। मैं आपको बताना चाहता हूं कि सीबीआई ने इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल की थी। इस पर कोर्ट ने आपत्ति की और क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया गया। इसके बाद आरुषि के माता-पिता के को चार्जशीट किया गया है। रही बात विषय की तो शालिनी भी विषय पर ज्यादा रोशनी नहीं डाल पाईं।
भ्रष्टाचार पर बहुत कारगर तरीके से अपनी बात कही है शिखा जी ने। ये लेख ज्ञानवर्धन भी कर रहा है. देश में भ्रष्टाचार के 10 बडे़ मामलों का जिक्र कर उन्होंने यह भी बताने की कोशिश की ये किसी एक दल की सरकार में नहीं सभी दलों की सरकार के दौरान ऐसे मामले सामने आए हैं। भ्रष्टाचार के खत्म करने के उनके सुझाव भी महत्वपूर्ण और व्यावहारिक हैं। पर यहां एक बार फिर उसी बात को दुहराना पड़ रहा है कि पूरे लेख में विषय पर बहुत ही कम जिक्र किया गया है।  
मुझे लगता है कि डा श्याम जी ने विषय को सही तरह से ना सिर्फ समझा है बल्कि भ्रष्टाचार के मूल वजहों यानि छोटे छोटे फायदों के लिए हम किस कदर घूस देने को तैयार हो गए। इसी वजह से लोगों के मुंह घूस का खून लग गया। लोग गैर जरूरी जरूरतों के लिए सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हो गए। और हमारे देखते देखते भ्रष्टाचार एक गंभीर बीमारी के रुप में समाज और देश में फैल गया। 
परिणाम

1. डा. श्याम 
2. आशुतोष 
3. शालिनी कौशिक

शुक्रिया 
महेन्द्र श्रीवास्तव

आप सभी विजेताओ एवं प्रतिभागियों को हार्दिक शुभकामना

17 टिप्पणियाँ:

शालिनी कौशिक ने कहा…

apne vicharon ko itne vistrit roop se ham sabhi ke samne rakhne ke liye main mahendra ji ka hardik dhanyawad karti hoon aur janti hoon ki main poori tarh se vishay ke sath nyay nahi kar payee thi .pratiyogita me bhag lena mera bachpan se shauk raha hai isi vajah se main swayam ko alpgyani hote hue bhi bhag lene se nahi rok payee.
dr.shyam gupt ji v aashutosh ji ko bahut bahut badhai.

आशुतोष की कलम ने कहा…

महेंद्र जी आप का बहुत बहत आभार जो लेख को इस योग्य समझा..आपके विश्लेषण से कई बिन्दुओं पर सुन्दर ज्ञान भी प्राप्त हुआ..
आभार इस मंच के सदस्यों का जिनकी प्रेरणा के फलस्वरूप कुछ तार्किक लिख सका,...
धन्यवाद् आप सभी का..

योगेन्द्र पाल ने कहा…

आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं|

शिखा कौशिक ने कहा…

vijetaon ko hardik shubhkamnayen.

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद महेन्द्र जी--वास्तव में तो प्रथम विजेता आप ही हैं....क्योंकि आपने भ्रष्टाचार की मूल को अपने इस निर्णय आलेख में सटीक रूप से इन्गित किया है..यथा..
1--सच तो यह है कि आसान रास्ता तलाशने के लिए हमने /आपने खुद इस छोटे रास्ते को प्रोत्साहित किया है।
2-गडबड़ी इसलिए हुई लोगों की बढ़ती लालच ने देश में भ्रष्ट्राचार को भी भ्रष्ट्र कर दिया।
---वस्तुत: मूल में ये दो भाव ही भ्रष्टाचार ही नहीं सभी अनाचरण के जनक होते हैं।
---हां एक बात अवश्य कहूंगा कि आपका निम्न वक्तव्य...अनावश्यक है..
"..उसी समय भगवान राम ने नल और नील को आशीर्वाद दिया कि जाओ कलयुग तुम दोनों जेई और एई बनकर राज करोगे, कैसा भी पुल बनाओगे, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। तब से इंजीनियर मस्त हैं।"
.....क्योंकि चाहे बात व्यन्ग्य में/ या उदाहरण स्वरूप ही कही गयी हो तथापि आदर्शो के प्रति अवहेलना समान प्रतीत होती है तथा असाहित्यिक कोटि की होती है एवं भविष्य के लिये अश्रद्धा का वातावरण तैयार करती है।

Dr. shyam gupta ने कहा…

--धन्यवाद आशुतोष, शिखा जी व योगेन्द्र जी....
---धन्यवाद शालिनी---प्रतियोगिता में भाग लेना ही अत्यन्त महत्वपूर्ण बात है..अच्छा शौक है....अपनी बात कह सकना ही महत्वपूर्ण है--इस बहाने से हमें और अधिक ग्यान प्राप्त होता है...---बधाई व आभार...

rubi sinha ने कहा…

vijetaon ko hardik shubhkamnayen.

par vijeta to aap bhi hai shikhaji, mahendra ji ne aapki itni tareef ki hai.

गंगाधर ने कहा…

आप सभी को बधाई

Mangal Yadav ने कहा…

aap shabhi ko badai.

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

आप सभी को बधाई
कब हो गयी यह प्रतियोगिता पता ही नहीं चला भाई योगेन्द्र जी अगली बार जरूर सूचित करना !!!!

शिखा कौशिक ने कहा…

@Rubi ji -bahut achchha comment kiya hai .

शालिनी कौशिक ने कहा…

aashutosh ji,yogendra ji,dr.shyam gupt ji,shikha ji,rubi ji,gangadhar ji,darshan ji aur mangal ji aap sabhi ko hardik dhanyawad.
@dr.shyam ji utsah vardhan hetu nahut bahut dhanyawad.

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद रूबी जी, गन्गाधर जी, बवेजा जी,व मन्गल जी....

तीसरी आंख ने कहा…

निर्णय का अधिकार दिए जाने के बद किसी प्रकार का कोई सवाल ही नहीं उठता

आशुतोष की कलम ने कहा…

आप सभी सुधिजनो का आभार एवं धन्यवाद्

mahendra srivastava ने कहा…

मित्रों,
मैं देख रहा था कि मेरे निर्णय को लोगों ने सही मन से स्वीकार है या नहीं। पर ज्यादातर लोगों का जो कमेंट है, लगता है कि किसी को कोई खास शिकायत नहीं है। चूंकि मैं दो एक महीने से ही ब्लाग से जुडा हूं, इसलिए मैं इस बात का पूरा ध्यान रखता हूं कि कोई भी मेरी वजह से आहत न हो। शालिनी जी को मैं पढ़ता रहता हूं, उन्होंने अपने कमेंट में जिस तरह कहा है कि swayam ko alpgyani hote hue bhi bhag lene se nahi rok payee. मैं नहीं समझ पाया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा। मैं सच में अभी तक ये नहीं समझ पाया हूं।
डा श्याम गुप्ता जी ने मेरे निर्णय टिप्पणी के कुछ हिस्से को अनावश्यक बताया है। मेरा मानना है कि कई बार कुछ चीजों को आसान तरीके से समझाने का एक तरीका है। मेरा मानना है अगर देश का जेई और एई ईमानदार होता तो आज हम विकासशील देश के बजाए विकसित देशों की श्रेणी में होते। लेकिन दुर्भाग्य है कि इंजीनियरों ने ईमानदारी से बिल्कुल नाता तोड़ लिया है। मुझे लगता नहीं कि ये ऐसी बात थी कि आप उस पर इतनी गंभीर टिप्पणी करें। वैसे मैं यहां किसी खास विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करता हूं, इसलिए हो सकता है मेरी सोच अगल हो।
वैसे आपके लिए मैं वेद प्रकाश बटुक की एक रचना का उल्लेख करता हूं, जिसमें उन्होंने कहा कि

हर धर्म युद्ध में विजय राम की होती है
राज्य विभिषण को मिलता है
मोक्ष प्राप्त होता है रावण को,
और सत्य रूपी सीता को मिलता है
बनवास,अग्निपरीक्षा और जमीन में समा जाना।
मुझे लगता है कि आप मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगे।

भाई तीसरी आंख क्या कहना चाहते हैं, मैं समझ नहीं पाया। क्या उन्हें मेरे निर्णय पर आपत्ति है या फिर मुझे निर्णायक क्यों बनाया गया, इसके लिए हरीश जी से नाराजगी है।

Dr. shyam gupta ने कहा…

महेन्द्र जी आपने बहुत अच्छा उदाहरण दिया है....कविता से एसा लगता है कि धर्म-युद्ध में अनीतियां, अनाचार,असत्य व गलत बातें अधिक होती हैं...तो फ़िर वह धर्म-युद्ध कैसा...राम को नहीं करना चाहिये....
---मेरे टिप्पणी के उस संदर्भित भाग का यही अर्थ है, कि इस प्रकार की कवितायें, रचनायें,कथन, टिप्पणियां....अश्रद्धा का कारण बनती हैं..अत: नहीं होनी चाहिये ...प्रस्तुत कविता भी उसी श्रेणी की है... और सन्दर्भ के योग्य नहीं है...

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