शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

गुनगुनाती रही



मेरी खामोशियाँ  मुझे रुलाती रहीं
बिखरे हर अल्फ़ाज के हालातों 
में फंसी खुद को मनाती रही 
मैं हर वक़्त तुझे गुनगुनाती रही |

आँखों में सपने सजाती रही 
धडकनों को आस बंधाती रही 
मेरी हर धड़कन तेरे गीत गाती रही 
मैं हर वक़्त तुझे गुनगुनाती रही |

हाथ बढाया कभी तो छुड़ाया कभी 
यूँ ही तेरे ख्यालों में आती जाती रही 
याद कर हर लम्हा मुस्कुराती रही 
मैं हर वक़्त तुझे गुनगुनाती रही |

मैं खुद को न जाने क्यों सताती रही 
हर कदम पे यूँ ही खिलखिलाती रही 
खुद को कभी हंसती कभी रुलाती रही 
मैं हर वक़्त तुझे गुनगुनाती रही |
मेरी हर धड़कन तेरे गीत गाती रही |

- दीप्ति शर्मा 

4 टिप्पणियाँ:

Swarajya karun ने कहा…

दिल को छू गयी यह कविता .आभार.

शिखा कौशिक ने कहा…

BAHUT SUNDAR .BADHAI

Dr. shyam gupta ने कहा…

सुन्दर भावुक गीत....
-----हां व्याकरण की व काव्य-कला व्याकरण की अशुद्धियां हैं...

दीप्ति शर्मा ने कहा…

aap sabhi ka sukriya
mai galtiya sudharne ki kosis karugi aabhar

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