गुरुवार, 15 सितंबर 2011

राकापति.....कविता ...डा श्याम गुप्त ...




कितना शीतल कितना सुंदर,
राकापति तेरा अंतस्थल |
ये रजत रश्मियाँ तो चंचल,
हैं रहीं चूम जगती का तल ||

ये रजत वस्त्र से आच्छादित,

जगती का सुंदर, सित अंचल |
यूँ  निशा हुई  मानो  प्रबुद्ध ,
पाकर के प्रियतम का अंचल ||

हो गयी धरा यूं रजतमयी,

अलकों पर फ़ैली खुशहाली |
स्वप्नों में लोग बिचरते हैं,
ऊपर फ़ैली यह उजियाली ||

क्या नदी तीर का द्रश्य अहा!

अस्थिर लहरों की चंचलता |
हैं सोम-रश्मि भी थिरक रहीं,
पाकर जल दिव्य विभूति भरा ||

मैं इस नीरव में खडा हुआ,

हूँ रहा सोच जीवन क्या है |
लहरों की चंचलता बोलो,
जीवन क्या है, जीवन क्या है!!

क्या कहा सतत बहना जीवन,

हंसना मुस्काना है जीवन |
जीवन में विश्व समाया है,
कर्तव्य विश्व का है जीवन ||

दे ताल नृत्य की, थिरक रहीं,

किरणो ! तुम भी तो कुछ बोलो |
है पीड़ा की यह ग्रंथि बंधी ,
अंतस में तुम ही कुछ खोलो ||

पीड़ा ही जीवन , अहो क्या!

पीड़ा ही सच्चा जीवन है !
अनुराग भरी जो पीड़ा  हो,
वह मानव का नवजीवन है ||

कल कल कल  लहरें चलीं गयीं ,

सागर से मिलने को अधीर |
असफल सा करता था प्रयास ,
पर रोक सका कब उन्हें तीर ||

था महासत्य सा खुला हुआ,

झंकृत करता, मन नेत्र प्राण |
चंचल  लहरें वे  चली गईं ,
मैं भला मांगता क्या प्रमाण ||

सुंदरता  निर्जन पृथ्वी  की,

अपने विचार भी तो कुछ दो |
इस  महाशांति की  बेला  में,
बोलो तुम भी तो, चुप क्यों हो?

गंभीर घोष  सा  कानों में ,

अनहद का गूंजा नाद वहीं |
क्यों भटक रहे हो ख्यालों में,
सच्चा जीवन है यहीं कहीं ||

इस शांतिपूर्ण और नीरवमय,

बेला  की  सुंदरता   लेखो  |
साकार कल्पनाएँ कर लो,
जीवन को जी भर कर देखो ||
 

2 टिप्पणियाँ:

prerna argal ने कहा…

इस शांतिपूर्ण और नीरवमय,
बेला की सुंदरता लेखो |
साकार कल्पनाएँ कर लो,
जीवन को जी भर कर देखो ||
बहुत ही गहनाभिब्यक्ति /सुंदर शब्दों के साथ लिखी बेमिसाल रचना /बहुत बधाई आपको /
मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है /जरुर आइये /


www.prernaargal.blogspot.com

vandana ने कहा…

गंभीर घोष सा कानों में ,
अनहद का गूंजा नाद वहीं |
क्यों भटक रहे हो ख्यालों में,
सच्चा जीवन है यहीं कहीं ||

बहुत सुन्दर

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