सोमवार, 18 जुलाई 2011

एक ही इच्छा मन में बसी


शैशव का प्रभात

सुन्दर था

मन निश्छल,निश्चिंत

दिल कांच सा स्वच्छ

चंचलता से भरा
नटखट

यौवन काल

मादकता का रूप

आँखों को आराम ना था

तन,मन में

हिम्मत और जोश

आशा और प्रकाश से

भरा था

अब जीवन का
संध्या काल है

चेहरे की

लालिमा कम
हो गयी

आशाएँ और आकांषाएँ

घट गयी

व्यवहार में नरमी
आ गयी

दिन शांती से
कट जाए

निरंतर सब से
निभ जाए
ना कोई दुर्भावना

ना कोई,भय मन में

इच्छा मन में बसी

 जीवन-सूर्य बिना बताए

चुपके से अस्त
हो जाए

18-07-2011

1201-81-07-11

2 टिप्पणियाँ:

prerna argal ने कहा…

alag dhang se likhi bahut sunder prastuti.badhaai aapko.




please visit my blog.thanks

Dr. shyam gupta ने कहा…

सुन्दर, सात्विक इच्छा है...

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