भोले भंडारी को प्रिय मास श्रावण क्यों है.... क्योंकि श्रावण श्रंगार का महीना है , श्रृंगार के पर्व का मास है ...और भोले -भंडारी हैं श्रृंगार के आदि देव ...वेदों में वे रूद्र देव हैं जो सृष्टि की नियमितता व क्रमिक स्वचालित प्रक्रिया हेतु चिंतित ब्रह्मा के उद्धार हित प्रकट हुए .....अर्ध-नारीश्वर रूप में ...और स्वयं को विभाजित करके नर व नारी के विभिन्न भावों में प्राकट्य होकर प्रत्येक जड़-जंगम -जीव में समाहित हुए ...और तभी से सृष्टि में नर-नारी भाव, योनि-लिंग रूप भाव से मैथुन सृष्टि का आविर्भाव हुआ ...सृष्टि की स्व-चालित उत्पादन-प्रजनन प्रक्रिया......| शायद वह यही सुन्दर-सुखद-सुहावन-सुसमय - मास रहा होगा जिसे बाद में श्रावण का नाम दिया गया होगा | ...... अर्धनारीश्वर ----------->
वेदों के पश्चात भोले भंडारी का ..पशुपति रूप ..सर्व प्रथम विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता-संस्कृति हरप्पा-मोहनजोदडो में मोहरों (सीलों --stamps) पर अंकित मिलता है , इसी के साथ लिंग-योनि के पाषाण रूप भी...
ऊपर चित्र ०१ --पशुपति नाथ (शिव अपने बैल नंदी सहित (शायद?)आदि-मात्र देवी ( जो शायद बाद में अम्बा , पार्वती , दुर्गा रूपा हुई )..के सम्मुख अर्चना करते हुए सर पर बैल या बृषभ का मुखौटा या हेड-गीयर जो पशुपति नाथ का प्रतीक होगा .....आदि-काल में मात्र-सत्तात्मक समाज रहा होगा ...चारों ओर सप्त -मातृकाएं या आदि-देवी की सहायिकाएं, अनुचारियाँ आदि....
मध्य में चित्र-२ .. आदि पशुपति शिव ..... समाधिष्ठ अवस्था में ...योग मुद्रा में ...जो योग की, ध्यान की आदि-मुद्रा है ....पद्मासन ....
नीचे के चित्र-३ में ...खुदाई में प्राप्त ...शिव लिंग व योनि- के प्रतीक पाषाण मूर्तियां ...जो शायद शिव-शक्ति व लिंग-योनि पूजा के आदि-तम रूप हैं .....
------------सभी चित्र ..साभार...
7/18/2011 05:14:00 pm
shyam gupta



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2 टिप्पणियाँ:
bahut achchi jaankaari dene ke liye dhanyawaad.bahut achcha lekh.badhaai aapko.
please visit my blog.thanks
श्याम जी बहुत अच्छी जानकारी प्रेषित की है आपने इस पोस्ट के माध्यम से .आभार
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