गुरुवार, 21 जुलाई 2011

''तेरहवीं'


''तेरहवीं''

''पापा''अब क्या करोगे ,दीदी की शादी को महीना भर ही रह गया है और ऐसे में दादाजी की मृत्यु, ये तो बहुत बड़ा खर्चा पड़ गया ,विजय ने परेशान होते हुए अपने पापा मनोज से कहा .मनोज बोला -''बेटा;क्यों परेशान होता है ,ये तो हमारे लिए बहुत आराम का समय है .वो कैसे पापा?
इसलिए न तो मैं पिताजी का वो ऐसे बेटा कीमैं तो तेरे चाचाओं  से  पहले ही कह दूंगा की मुझे तो अपनी बेटी की शादी की तैयारी करनी है इसलिए न तो मैं अंतिम संस्कार ही कर पाऊँगा और न ही इससे सम्बंधित कोई खर्चा ,वैसे भी हम वैश्य जातिऔर सभी जानते हैं की वैश्य जाति में शादी में  के हैं और सभी जानते हैं की वैश्य जाति में  शादी में कितना खर्चा होता है .पापा की बात सुन विजय के चेहरे पर भी चमक आ गयी ,तभी जैसे उसे कुछ याद आया और वह बोला ,''पर पापा चाचा तो बाबाजी के पैसे मांगेगे और कहेंगे कीहमें वे ही दे दो हम उनसे ही उनके अंतिम संस्कार  का खर्चा निकाल लेंगे ,अरे बेटा तू तो बहुत आगे की सोच रहा है ,पिताजी के पास अब कोई पैसा था ही कहाँ ,वो तो सारा ही बाँट चुके थे और रहा जो उनके बक्से में कुछ पैसा रखा है उसे उठा और अपने कमरे में ले चल ,वो कह देंगे की उनके खाने और इलाज में खर्च हो गया .''
इस तरह जब मनोज का बेटा विजय संतुष्ट हो गया और वह वो बक्सा अपने कमरे में ले गया तब मनोज ने भाइयों को फोन पर पिताजी के मरने की सूचना दी और भाइयों के आने पर उन्हें अपना फैसला सुना दिया .आपस की बातों से ये निश्चय हुआ की पिता का अंतिम संस्कार दूसरे नंबर का बेटा करेगा और मनोज की बेटी की शादी की बात कहकर कम से कम 
पैसे में तेरहवीं आदि कर दी जाएगी .
जैसे जैसे जो सोचा गया था सभी भाइयों ने मिलकर वह कर दिया और तेरहवीं के बाद जब मेहमान जाने लगे तो सभी के हाथ जोड़कर अपने बनाये हुए पिता के वाक्य सभी के सामने दोहरा दिए .मनोज ने कहा-''पिताजी ने ही कहा था की मेरे कारण पोती की शादी में कोई कमी न करना वर्ना मेरी आत्मा नरक में भटकती रहेगी .''मनोज के ये शब्द सभी मेहमानों के दिल में घर कर गए और सभी उसे सांत्वना दे अपने अपने घर चले गए .

शालिनी कौशिक
http://shalinikaushik2.blogspot.com

5 टिप्पणियाँ:

prerna argal ने कहा…

bahut hi saarthak lekh paisa rishte aur bhawanaon se bada ho gayaa aajkal ke jamaane main.dil dukh se bhar gayaa.saarthk prastuti shaliniji

योगेन्द्र पाल ने कहा…

शालिनी जी मैं कहानियों का बहुत शौक़ीन हूँ पर आप अपनी कहानी में सीधी-सीधी बात बोल देतीं हैं और कहानी का सारा मजा चला जाता है, कहानी में मजा तब आता है जब पारिस्थियां कहानी को बयान करतीं हैं, थोडा अलग तरीके से कहानी को प्रस्तुत करेंगीं तो मजा आ जायेगा

संध्या शर्मा ने कहा…

हकीक़त बयां करती कहानी... हमारे समाज का आईना...

शालिनी कौशिक ने कहा…

योगेन्द्र जी मैं वास्तव में कोई कहानी लेखिका नहीं हूँ और न मैं ऐसा कोई दावा करती हूँ.ये जो कुछ मैं यहाँ प्रस्तुत करती हूँ ये मात्र मेरे आस पास की सच्चाई है जो मुझे कुछ कहने को प्रेरित करती है मैं सच को ही अपने टूटे फूटे शब्दों में बयां करती हूँ इसके सिवाय कुछ नहीं मैं आपकी आभारी हूँ की आपने मुझे मेरी सच्चाई से परिचित कराया वैसे भी मुझे झूठी प्रशंसा सुनने का कोई शौक नहीं है.मैं क्या लिखती हूँ उसे अच्छी तरह जानती हूँ और अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी पाल कर नहीं रखती .मैं ह्रदय से आपका आभार व्यक्त करती हूँ.

शालिनी कौशिक ने कहा…

प्रेरणा जी और संध्या जी आपका भी बहुत बहुत शुक्रिया

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