गुरुवार, 7 जुलाई 2011

प्रेम काव्य-. षष्ठ सुमनान्जलि--रस श्रृंगार--संयोग( क्रमश:)- गीत-६----डा श्याम गुप्त






4 टिप्पणियाँ:

veerubhai ने कहा…

बेहद लोक लुभावन मन भावन लयताल भाव बढ गीत .सुन्दर अति सुन्दर -पायल की झंकार ,पुरानी फिल्मों के विरह गीत याद आ गए .श्रृंगार का जादू सिर चढ़के बोलने लगा .

शालिनी कौशिक ने कहा…

मेरे मन की विरह पीर को ,
तेरी पायल कब समझेगी |
प्रीति भरे इस मन आँगन में ,
बैरिन पायल कब छनकेगी |
मैं तो हार गया हूँ सजनी !
कर कर के मनुहार |
bahut sundar likha hai .

rubi sinha ने कहा…

सुन्दर अति सुन्दर

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद वीरूजी, शालिनी व रूबी जी....

Add to Google Reader or Homepage

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | cna certification