शनिवार, 11 जून 2011

मन की खिड़की,दिल का दरवाज़ा खुला रखता हूँ

मन की खिड़की
दिल का दरवाज़ा खुला
रखता हूँ
मेहमानों का निरंतर
इंतज़ार करता हूँ
सब्र नहीं खोता
किस जात,
किस रंग का होगा ?
कब आयेगा ?
नहीं सोचता
दिल के सौदे में कोई
मोल भाव नहीं करता
हर आने वाले का
इस्तकबाल करता
दिल मिले 
जब तक रखता हूँ
ना मिले तो प्यार से
विदा करता
हूँ
ना मलाल करता
ना रंज कोई रखता
हूँ
नए मेहमान से
मिलने का अरमान
कभी ख़त्म नहीं होता
उम्मीद में
वक़्त गुजारता हूँ
11-06-2011
1033-60-06-11

1 टिप्पणियाँ:

शालिनी कौशिक ने कहा…

bahut khoob rajendra ji.badhai.

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