शुक्रवार, 4 मार्च 2011

मंगल यादव, नोएडा
प्रेम नाम सुनते ही मेरे दिल में एक अजीब सी गुदगुदी होती है। कितना प्यारा नाम है प्रेम। प्रेम ऐसा कि जो ईश्वर को भी भक्त का दास बनना पड़ता है। प्रेम ऐसा कि जो खतरनाक जानवरों को भी आदमी का गुलाम बनना पड़ता है। प्रेम ऐसा कि तोता भी आदमी जैसा बोलने लगता है। और आदमी कुछ भी सिखा देता है। प्रेम ऐसा कि हमें भी आप को अपना भाई कहने पर मजबूर कर देता है। प्रेम में इतना दम है कि गैर भी अपने हो जाते हैं। मेरे विचार से प्रेम वही है जो किसी के दिल में अपनी जगह बनाने में महत्वपूर्ण होता है।
इसे हम बेशक देख नही सकते लेकिन किसी को किसी से मिलते हुए देकर जरुर महसूस कर सकते हैं। शख्स कोई भी हो सकता है आदमी या जानवर। सच्चे प्रेम के स्वरुप पर मेरा मानना है प्रेम का स्वरुप अथाह है। इसका वर्णन करना प्रेम शब्द को नीचा करना होगा। उदाहरण के तौर पर प्रकृति का हमारे प्रति प्रेम अथाह है इसको कौन माप सकता है। इसे तो सिर्फ सच्चा प्रकृति प्रेमी ही बता सकता है। एक मां अपने पुत्र को देखने के लिए आतुर रहती है सदा उसकी कुशल मंगल की कामना करती है। एक सच्चा प्रेमी अपनी प्रेमिका के बगैर रह नही सकता है। सिर्फ प्रेम के स्वरुप के बारे में मां, लैला-मजनूं जैसा प्रेमी और भगवान का प्रहलाद जैसा भक्त ही कुछ बता सकता है वरना प्रेम को किसने देखा है। यह तो साक्षात् भगवान होता है। जो हर प्राणी और हर जगह विराजमान है।
प्रेम का हमारे जीवन में उतना ही महत्व है जितना कि खाने के लिए अनाज, पीने के लिए जल और जीने के लिए सांस लेना। प्रेम का महत्व तभी समझ में आता है जब अपना कोई खास हमसे दूर चला जाता है। और यदि बात न हो पाये तो विल्कुल समझ में आता है कि प्रेम आखिर है क्या चीज। प्रेम के बारे में बहुत सारे साहित्य भी लिखे गये हैं। आये दिन कहीं न कहीं विचार गोष्ठियां भी होती हैं। इसलिए मैं ज्यादा इस पर कुछ कहना नही चाहता हूं। इतना जरुर अपने पूर्वजों की बात दोहराना चाहता हूं कि यदि किसी को जीतना हो तो युद्ध नही प्यार करो...सिर्फ अलौकिक प्यार। कहते हैं न सच्चा हो तो मीलों की दूरियां यूं ही खत्म हो जाती हैं।
प्रेम का वास्तविक महत्व के बारे में केवल इतना ही कहना चाहूंगा जहां प्रेम नही है वहां मानवता नही है। जहां मानवता नही है वहां इन्सानियत नही है। जहां इन्सानियत नही है वहां मानव और जानवर में भेद करना मुश्किल है। जब प्रेम नही होगा तो संसार नही होगा। जब संसार नही होगा तो हम आप नही होगें। कहने का मतलब प्रेम से ही सृष्टि टिकी हुई है।
जीना है तो प्रेम कर ले..
अमर होना तो प्यार कर ले...
दुनिया गायेगी गुणगान तेरा
जो भी करना हो आज कर ले...।।
प्रेम एक ऐसी विद्या है जो कहीं नही पढ़ाई जाती। प्रेम करना सीखना हो तो प्रकृति से सीखिए। जो निश्चल और निस्वार्थ भाव से हमसे लगातार प्रेम कर रहा है। सूर्य ऊर्जा दे रहा है, चन्द्रमा शीतल रोशनी दे रही है, बादल पीनी दे रहा है और फूल सुगंध दे रहे हैं। और हम आप बदले में क्या दे रहें हैं किसी से छिपा नही है। प्रेम तो प्रेम है प्रेम का मोल कहां....।।

4 टिप्पणियाँ:

saurabh dubey ने कहा…

बहुत अच्छा आपने प्रेम के बारे में लिखा हे

हरीश सिंह ने कहा…

sundar rachna

rubi sinha ने कहा…

प्रेम करना सीखना हो तो प्रकृति से सीखिए। vah kya bat hai. sunadar rachna.

Dr. shyam gupta ने कहा…

सुन्दर...

’ प्रेम न वाडी ऊपज़ै, प्रेम न हाट बिकाय"

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