रविवार, 27 मार्च 2011

सिरफिरा (लघुकथा )



"कौन हो ,क्या चाहिए ?"उसने दरवाज़े को थोडा सा खोलकर झिरी से झांकते हुए पूछा था .
"मुसाफिर हूँ ,रात भर ठहरना चाहता हूँ ."
"कौन हिंदू हो क्या ?"
 "नहीं "
"सिक्ख तो  दीखते नहीं. फिर तो जरूर ईसाई होंगे ,है ना ."
"मै ईसाई भी नहीं हूँ "
"तो मुसलमान ?"
"जी नहीं "
"क्या मतलब ? तो कौन हो तुम?" वह झल्लाया था.
" इंसान "
"क्या कहा इंसान ?"
तभी किचन से आवाज़ आई थी " कौन है जी ,दरवाज़े पर ?"
उसने भडाक से दरवाज़ा बंद करते हुए कहा था " कोई सिरफिरा पागल है , साला "

8 टिप्पणियाँ:

हरीश सिंह ने कहा…

तभी कोई इन्सान नहीं बन पाता, अच्छी पोस्ट, कृपया पूरी पोस्ट प्रकाशित किया करें. केवल लिंक छोड़ने से पाठकों को परेशानी होती है. इस बार मैंने कर दिया है उम्मीद है आप सहयोग करेंगे.

शालिनी कौशिक ने कहा…

aaj ke insan pagal hi hote hain kyonki sahi to galat hote hain.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज कल इंसान हैं ही कहाँ ? अच्छी लघुकथा

kirti hegde ने कहा…

अच्छी लघुकथा

नेहा भाटिया ने कहा…

kaha rah gaya insan....

गंगाधर ने कहा…

saty bolna pap hai. yah to kadva sach hai. kaha hai insan .

poonam singh ने कहा…

kaha rah gaya insan....

Anita ने कहा…

आज के मानव की सच्चाई को बताती बहुत अच्छी लघुकथा !

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