शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

प्रेम काव्य-. षष्ठ सुमनान्जलि--रस श्रृंगार--भाग (ख)-ऋतु शृंगार गीत-६ --डा श्याम गुप्त



वृज में यमुना तट पर खंजन..राधारानी के नयनों का उपमान





                    प्रेम -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है ..षष्ठ -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के श्रृंगारिक भाव का वर्णन किया जायगा ...जो तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार तथा (ग)..वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है.....खंड ख -ऋतु शृंगार-- के इस खंड में विभिन्न ऋतुओं से सम्बंधित ..बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, कज़रारे बादल, हे घन !, शरद, हेमंत एवं शिशिर आदि ८ गीत प्रस्तुत किये जायेंगे | प्रस्तुत है  षष्ठ गीत ....शरद ....
 
"जानि शरद ऋतु खंजन आये "
मन  के दर्द उभर फिर आये  |
अंतर्मन  में खोजा, तुम हो,
क्यों  खोये खोये अलसाए ||
वर्षा  बीती शरद आगई,
तन-मन पीर पवन छलकाए |
मन  के दर्द उभर फिर आये,
जानि शरद ऋतु खंजन आये ||
निर्मल नीर सर कमल  फूले,
चंचरीक  गुंजन मन झूले |
चातक दुःख मन वर्षा जाए,
कैसे स्वाति-बूँद जल पाए ||

निर्मल गगन मध्य शशि सोहे,
पुलकित चित चकोर मन मोहे |
कुमोदिनी मन खिल खिल जाए,
जानि शरद ऋतु खंजन आये ||

खेतों की  मेड़ों पर  फूले,
धवल  काँस के पुष्प घनेरे |
धवल केश बन वृद्धा नागरि,
वर्षा  बैठी   माला   फेरे ||

धूल नहीं अब उड़े नगर में ,
पंक दिखे नहीं बीच डगर में |
सरिता सर निर्मलजल भाये ,
जानि शरद ऋतु खंजन आये ||

तुम अपने अंतर में खोये,
बैठे हो क्यों चुप चुप होकर |
अपने में क्यों आप समाये,
हम रह गए पराये होकर ||

अपने अंतर्मन को खोलो ,
प्रीति पगे मधुरिम स्वर बोलो |
शीत नेह प्रिय प्रीति जगाये,
जानि शरद ऋतु खंजन आये ||



                                                        ----- चित्र साभार







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