गुरुवार, 21 जुलाई 2011

प्रेम काव्य-. षष्ठ सुमनान्जलि--रस श्रृंगार--संयोग( क्रमश:)- गीत-८ ----डा श्याम गुप्त

प्रेम -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है ..षष्ठ -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के श्रृंगारिक भाव का वर्णन किया जायगा ...जो तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार तथा (ग)..वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है...


2 टिप्पणियाँ:

veerubhai ने कहा…

रीति कालीन कवि रसलीन की याद ताज़ा करदी नख शिख वर्रण में .बहुत सुन्दर प्रेम सरोवर में डुबकी लगवाती रचना मुग्धा भाव लिए .

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद वीरूभाई ...आपने श्रृंगार शिरोमणि रसलीन का उल्लेख करके बड़ी हौसला अफजाई की है...आभार...

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